स्मरण-शक्ति की दुर्बलता एवं चिकित्सा

स्मरण-शक्ति की दुर्बलता एवं चिकित्सा

स्मरण-शक्ति मस्तिष्क की एक प्रमुख शक्ति है। देखने-सुनने में जो ज्ञान मिलता है, उसको सुरक्षित रखना एवं पुनः समय पर प्रकट करना स्मृति का कार्य है। ग्रहण करने की इस शक्ति को ‘मेधा’ एवं ‘बुद्धि’ भी कहते हैं। जिस आहार को हम लेते हैं उससे पचकर रस, रक्त, मांस, मज्जा, अस्थि एवं वीर्य का निर्माण

स्मरण-शक्ति मस्तिष्क की एक प्रमुख शक्ति है। देखने-सुनने में जो ज्ञान मिलता है, उसको सुरक्षित रखना एवं पुनः समय पर प्रकट करना स्मृति का कार्य है। ग्रहण करने की इस शक्ति को ‘मेधा’ एवं ‘बुद्धि’ भी कहते हैं।

जिस आहार को हम लेते हैं उससे पचकर रस, रक्त, मांस, मज्जा, अस्थि एवं वीर्य का निर्माण होता है। इन्हीं को हम सप्त धातु भी कहते हैं। इनके अनुलोमधाय अर्थात् उत्तरोत्तर धातुओं का ह्रास रोग का कारण बनता है। इन धातुओं में वीर्य की मात्रा अल्प होती है। इन धातुओं का जो सार होता है उसे ओज कहते हैं। इसका परिमाण हृदयली पर रखे जल बिन्दु के बराबर होता है। इस ओज से ही शरीर तेजवान बनता है। चेहरे पर जो चमक दिखाई देती है वही ओज की उपस्थिति कराता है। यह ओज मस्तिष्क को पुष्ट करने के साथ ही स्मरण-शक्ति को भी ठीक रखता है।

वीर्य की सुरक्षा एवं धारण ब्रह्मचर्य से होता है। ब्रह्मचर्य के अभाव में वीर्य के साथ ही ओज का भी क्षय हो जाता है। ओज के क्षय से स्मरण-शक्ति कमजोर पड़ जाती है। इसलिए तीव्र स्मरणशक्ति के लिये प्रथम आवश्यकता है नियम-संयमपूर्वक ब्रह्मचर्य का पालन करना। ब्रह्मचर्य की रक्षा के लिये मन की एकाग्रता महत्वपूर्ण उपाय है। मन एवं चित्त की चंचलता एकाग्रता में बाधक होती है। तनावपूर्ण दिनचर्या, राग-द्वेष, प्रतिस्पर्धा आदि के कारण चित्त उद्विग्न रहता है। दैनिक जीवन के तनाव का मस्तिष्क पर अत्यन्त बुरा प्रभाव पड़ता है। मस्तिष्क के थक जाने पर स्मरण-शक्ति धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगती है। प्रखर स्मृति के लिये आवश्यक है स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन। जिस प्रकार एक स्थान पर एकत्र की हुई संकेन्द्रित सूर्य की किरणें किसी वस्तु को जला देती हैं तथा बिखरी हुई किरणों में यह क्षमता नहीं होती, उसी प्रकार मन भी है। एकाग्रमन में अपार शक्ति निहित होती है।

उम्र बढ़ने से भी मस्तिष्क पर प्रभाव पड़ने लगता है। स्मरण-शक्ति कमजोर होने लगती है। इसमें भी मूल कारण यह है कि उम्र बढ़ने पर शरीर में रस, रक्त, वीर्य एवं ओज का समुचित मात्रा में निर्माण नहीं हो पाता है। शाने-शाने कम होता जाता है जिससे मस्तिष्क और तंत्रिकीय क्रियाकलाप भी क्षीण होने लगते हैं। अधिक उम्र में रक्तचाप-वृद्धि तथा धमनियों खींची के रोग को रोकने के उपाय से स्मृति ठीक रहती है। स्मरण-शक्ति बढ़ाने के लिए सामान्य रूप से निम्नलिखित उपाय करने चाहिए :-

(1) प्रातःकाल योगासन, प्राणायाम, ध्यान आदि नियमित रूप से करें। योगासन में सर्वांगासन, शीर्षासन, धनुरासन, मत्स्यासन, पश्चिमोत्तानासन, मयूरासन तथा हलासन का अभ्यास करें। लेकिन इन आसनों को किसी योग्य योगासन विशेषज्ञ से भली-भाँति सीखकर तब धीरे-धीरे अभ्यास करके करें। इनका अतियोग भी नुकसान पहुंचा सकता है।

(2) किसी शांत स्थान में पद्मासन लगाकर बैठ जायें। चित्त को स्थिर करते हुए प्राणायाम करें। तत्पश्चात् आँखें बन्द करके श्वास, प्रश्वास पर ध्यान लगायें। आँखें खोलें और कुछ सेकण्ड तक नाक की नोक को देखते रहें। पुनः आँख बन्दकर श्वास, प्रश्वास पर ध्यान लगायें। थोड़ी देर बाद आँख खोलकर पुनः नाक की नोक कुछ सेकण्ड तक एकटक देखें और आँखें खोलकर दोनों भौं के बीच में ध्यान केन्द्रित करें। इस क्रिया को बार-बार दुहरायें।

(3) संतुलित आहार का सेवन करें। भोजन में पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन, विटामिन, खनिज लवण, वसा आदि होने चाहिये। मौसमी फल, साग, हरी सब्जी, चोकर युक्त आटे की बनी रोटी से शरीर को रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। स्वस्थ कंठें भी रोग आक्रमण नहीं कर सकता है।

(4) श्वास, प्रश्वास धीमा, गहरा एवं लयबद्ध होना चाहिये। इससे फेफड़ों के द्वारा समुचित मात्रा में रक्त को ऑक्सीजन प्राप्त होती है।

(5) अपने विचारों को सकारात्मक बनायें। निर्माण की तरफ मन को लगायें, विध्वंस की ओर नहीं। अपने को आशावादी रखें, निराशावादी नहीं। सकारात्मक विचार ही मनुष्य को आशावादी बनाते हैं। इससे तनाव से मुक्ति मिलती है जिससे उच्च रक्तचाप एवं हृदय रोगों से मुक्ति मिलती है।

(6) हमेशा व्यस्त न रहें। समय पर यथोचित विश्राम करें। अत्यधिक व्यस्ततापूर्ण दिनचर्या के बाद मस्तिष्क को आराम की नितान्त आवश्यकता होती है। बिना आराम के मनुष्य तनाव में आ जाता है एवं रोगों का शिकार बन जाता है।

(7) गरिष्ठ एवं गर्म पदार्थों का सेवन न करें। शोक, क्रोध, भय एवं चिन्ता से दूर रहें। अत्यधिक मानसिक चिन्तन न करें।

चिकित्सा-आयुर्वेदिक योग :-

(1) दिन में दो बार ब्राह्मी रसायन 2-2 चम्मच दूध के साथ लें।

(2) अश्वगंधा चूर्ण 10 ग्राम प्रतिदिन दूध के साथ लें। यह मस्तिष्क के लिए बलकारक है।

(3) रात्रि को सोते समय 10 ग्राम त्रिफला चूर्ण पानी के साथ लें।

(4) ब्राह्मी, शंखपुष्पी, जटामांसी, आंवला एवं गिलोय का समान मात्रा में चूर्ण तैयार करें। लगभग 5 ग्राम प्रतिदिन दो बार गर्म दूध के साथ लें।

(5) विद्यार्थियों को घी, दूध आदि पौष्टिक पदार्थ अधिक मात्रा में लेने चाहिये। ब्राह्मी वटी 2 गोली तथा सारस्वतारिष्ट 2 चम्मच भोजन के बाद दिन में दो बार तथा प्रातःकाल एक अण्डे का मुर्गी विद्यार्थियों के लिए अत्यंत लाभप्रद है।

(6) मस्तिष्क के पोषण के लिए शंखपुष्पी, दूध, घी, बादाम, अखरोट आदि उपयोगी हैं।

(7) ब्राह्मी घृत का नियमित सेवन करें। ब्राह्मी घृत बनाने के लिये ब्राह्मी की पत्ती का रस 4 किलो, देशी घी 1 किलो, इन्द्री, कूट, हरड़, त्रिफला, चमेली का फल 50 ग्राम, बड़, सौंफ, खांड प्रत्येक 15 ग्राम लें। घी एवं ब्राह्मी की पत्ती के रस के अतिरिक्त सबका कषायण चूर्ण करें। घी को आग पर चढ़ाकर गर्म करें। उसमें ब्राह्मी की पत्ती का रस और चूर्ण डालकर उबालें। जब केवल घी शेष रह जाये तो उतारकर ले लें। यही ब्राह्मी घृत कहलाता है।

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