कैंसर और होम्योपैथी
- स्वास्थ्य/चिकित्सा
- August 20, 2026

यह सर्वदा सत्य है कि जिसका मन बिगड़ जाता है उसका स्वास्थ्य भी बिगड़ जाता है। संयमहीनता, असत्य, अभिमान, ईर्ष्या, दम्भ, क्रोध, हिंसा, कपट आदि दुर्गुण बिगड़े मानसिक स्वभाव के लक्षण हैं। अगर सत्य कहा जाय तो इन्हें हम सूक्ष्म मानसिक रोग भी कह सकते हैं। दुष्टस्वभाव वाला मनुष्य अपनी इन्द्रियों की प्रखरता को गंवा
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आयुर्वेद में आरोग्यता को ही सुख कहा गया है। जब शरीर के दोष (वात, पित्त, कफ) समान अवस्था में रहते है तो शरीरस्थ अग्नियां भी समभाव में रहती है जिसे रस रक्तादि धातुओं का निर्माण तथा पोषण भी सम्यक रूपेण चलता रहता है तथा मल निष्क्रमण की क्रियायें में भी यथावत् रूप से होती रहती
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स्मरण-शक्ति मस्तिष्क की एक प्रमुख शक्ति है। देखने-सुनने में जो ज्ञान मिलता है, उसको सुरक्षित रखना एवं पुनः समय पर प्रकट करना स्मृति का कार्य है। ग्रहण करने की इस शक्ति को ‘मेधा’ एवं ‘बुद्धि’ भी कहते हैं। जिस आहार को हम लेते हैं उससे पचकर रस, रक्त, मांस, मज्जा, अस्थि एवं वीर्य का निर्माण
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श्वास एक अत्यन्त कष्टकारी रोग है। इसे दमा के नाम से अधिकतर लोग पुकारते हैं। यह मनुष्य को शारीरिक एवं मानसिक रूप से अक्षम बना देता है। ऐसी मान्यता है कि दमा रोग का अन्त मृत्यु के साथ ही होता है। किंतु यदि रोगी अपने स्वास्थ्य के प्रति सजग है तथा विवेकपूर्वक आहार-विहार करता है
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इस धरा पर अवतार धारण कर आयुर्वेद शास्त्र का अनुशासन करने वाले स्वनाम धन्य भगवान धन्वन्तरी के नाम का स्मरण करने से ही रोगियों के बड़े-बड़े रोग भी नष्ट हो जाते हैं। यह कोई कोरी कल्पना नहीं है कारण “विश्वासः फलदायकः” हमारे धर्मशास्त्र विश्वास की धुरी पर टिके हुए हैं, वे कहते हैं :- मन्त्रे
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यह एक अत्यंत कष्टप्रद रोग है। ‘अरिवत् प्राणान् श्रृणाति हिनस्ति’, जो शत्रु के समान प्राणों को कष्ट में डाले उसे अर्श कहते हैं। इस विग्रह में हि सार्थक शु धातु से अर्श शब्द की सिद्धि होती है। जिन्दगी को दूभर करने वाले इस रोग से ग्रसित व्यक्ति के कष्ट का वर्णन करना कठिन कार्य है।
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