कन्या-धन
- व्यंग्य
- August 19, 2026

महंगी एक इन्नु शब्द च जैकु असर शब्दभेदी बाण से बी ज्यादा च, म्यार ख्याल से त महंगी अर गरीबी कू साख्यूं कु बैर च। क्या पता महंगी अर गरीबी कू जलम जलामांतर कू प्रेम ह्वा या ह्वेय सकद वूंन्कि सौं करार करीं हो। खैर जू बी ह्वा यक्खम म्यारु मकसद आज अचाणचक्क से महंगी
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घाम अछे गे छौ। जनि-जनि दिन ढलदु गै अर ब्यखुनि कि कुरबुरि छाण बैठि, थकान से चूर जगदम्बा कि चिन्ता वि बढदु गै। अबि क्षणि कतगा दूर च थीं ढकरि सैंण? वेन चल्द-चलद कीसा परन रुमाल गाड़ी मुख परौ पसीना पूंजि फिर दूर तक नजर डालि अंध्यरू बि जाणु छौ। स्वचण बैठि, गल़्ति कीरि मिन
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अपनी सरकारों की चुस्त कार्यप्रणाली को देख कर एक विज्ञापन की याद आ जाती है, जिसमें बिस्किट के स्वाद में तल्लीन एक कम्पनी मालिक के पास भागा-भागा कोई व्यक्ति आकर सूचना देता है कि ‘फैक्ट्री में आग लग गई है’ मालिक प्यार से बिस्कुट चबाते हुये लापरवाही से कहता है, ‘मुझे क्या?’ वह व्यक्ति स्पष्ट
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मानव जन्म हीरे-सा अनमोल है, जिसे स्थायी व्यक्ति भौतिक प्रगति की सीढ़ियाँ चढ़ने में व्यर्थ गंवाता है। इसे तलाश कर चमकाने का काम गुरु ही कर सकता है। ऐसे ही नहीं संत कबीर गुरु को भी गोविन्द से बड़ा बताये गये हैं। ईश्वर की कृपा से आज हमारे भाग्य में गुरु रूपी धरोहर मिलते हैं।
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