नतमस्तक
- व्यंग्य
- September 1, 2026

सरकार नई नेता नये, उनके सचिव सहयोगी सब नये। काम के तरीके और सिद्धान्त भी नये। पर हम तो वही हैं। हाथ पर हाथ रख अलसाने वाले, हर तमाशे को उचक-उचक कर देखने वाले, इधर- उधर भरपूर गपियाने और अपनी हर समस्या पर सरकार को कोसने वाले। हम वो हैं जो रात के अंधरे में
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अपनी सरकारों की चुस्त कार्यप्रणाली को देख कर एक विज्ञापन की याद आ जाती है, जिसमें बिस्किट के स्वाद में तल्लीन एक कम्पनी मालिक के पास भागा-भागा कोई व्यक्ति आकर सूचना देता है कि ‘फैक्ट्री में आग लग गई है’ मालिक प्यार से बिस्कुट चबाते हुये लापरवाही से कहता है, ‘मुझे क्या?’ वह व्यक्ति स्पष्ट
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मानव जन्म हीरे-सा अनमोल है, जिसे स्थायी व्यक्ति भौतिक प्रगति की सीढ़ियाँ चढ़ने में व्यर्थ गंवाता है। इसे तलाश कर चमकाने का काम गुरु ही कर सकता है। ऐसे ही नहीं संत कबीर गुरु को भी गोविन्द से बड़ा बताये गये हैं। ईश्वर की कृपा से आज हमारे भाग्य में गुरु रूपी धरोहर मिलते हैं।
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अष्टमी के दिन चार नन्हीं परियों को इधर से उधर दौड़ते-भागते देखा तो मन अतीत में लौट गया। उस समय हम भी इसी तरह इस घर से उस घर में जाकर गृहस्वामिनी से पूजे जाते। फिर हलवा-पूरी की दावतें उड़ाते और दक्षिणा के पैसे बार-बार गिनकर प्रसन्न होते, पर हम तो गिनती में बहुत होती
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ओ भारत के राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों …. उठो जागो और दौड़ो। दौड़ौ अपना-अपना अस्तित्व बचाने के लिये। कुछ देशद्रोही टाइप के लोग देशभक्त का चोला ओढ़ेआप सबकी नैया बीच भंवर में डुबोने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। वे बहुत चालाक हैं। उनकी आंख जनता की आंखों पर रहती है, जो कि सदा दूरदर्शन
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कितने भाग्यशाली हैं हम कि हमारे नये-नये राज्य में दो राजधानियां झेलने की सामर्थ्य है। अंग्रेजों ने हमें इतनी सारी अच्छी-अच्छी बातें सिखाई तो दो अलग-अलग राजधानियों का प्रशिक्षण भी हमें लेना ही चाहिये था। सो हमारे माई बापों ने उनका अनुसरण कर ही लिया। परिणाम स्वरूप हम सब दो राजधानियों का सुख लेने वाले
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