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  • लकीर पिटेणी

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    ‘लकीर-पिटेणी’ मात्र कहानी का ही शीर्षक नहीं बल्कि एक ऐसे व्यक्ति का उद्गार भी है, जो अपने समय का महान कर्मकाण्डी और ज्योतिषी था। बात बहुत पुरानी है। तब मैं एक “मिडिल स्कूल” में अध्यापक था। वेतन में मास्टरी मिली थी। तब मैं स्कूल में ही रहता था। रहना-बसना, खाना-पीना, सब स्कूल के एक कमरे

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  • बसंति

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    आज शाम गौं म बसंति कि बरात औंणी छै, फिर बि गौंम न क्वी चहल-पहल छ अर न लोगूं म उत्साह ही दिखेंणू छौ। सोहन लाल काका अपंण भद्दाड्या कुटल न धर्मू बोड़ा मुंगरयड़ म चुल्लु जरूर छी खणंनू। कहावत च कांणि क ब्योम सौ सो जोखन। बसंति कांणि त नि छै पंणि एक आंख

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  • उगदु सूरज

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    औंसि कि कालि रात वितद ही सुबेर कु सूरज फिर उगि औंद। वैकि सुनहरि किरण, हर एक क मुख पर एक चमक अर नयु उत्साह दे जौंद। तबि सब जीव फिर अपंण-अपंण काम पर जुटि जदीं। गौंकि बिन्द्रा कू जीवन बि अब तक, कै कालि रात से कम नि रै। माँ बाबु की इकलौति संतान

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  • गूंगकि बलि

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    आज पंडित ब्रह्मानंद क चौक म तिरपाल छौ तड्यूं। द्वी चार कुर्सि अर कुछ चारपायूं म दरि बिछै कि बैठक सजई छै। बैठक म कुछ लोग, जौंमु मीं बि सामिल छौ, छ्वीयूंम मस्त छा। पंडित बह्म्रानंद क घर म आज देवि पाठ कु समापन छौ। पंडित सदानंद जी, पिछला पांच दिन बटी पाठ मा छा

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