एक लड़की की लिखी कविता
- कविता/ग़ज़ल
- August 31, 2026

दे दो छूट जवानों को तुम, कारगिल के मस्तानों को। देश के इन दीवानों को, दुश्मन का नाम मिटाने को।। अब न सहेंगे अब न रुकेंगे, तुम भी रोक न लेना अब। रोज-रोज के जुल्म-सितम और, खतरे नहीं सहेंगे अब।। हानि उठा ली हद से ज्यादा, दुश्मन की करतूतों से। आज मिटा दो हस्ती उसकी,
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पत्थर से उपजा उसका बचपन विकटता को चीर पल्लवित हुआ जिसका यौवन, यौवन जो बिता न पाया अपने पल, अधेड़ हुआ मन पत्थर से उपजा उसका बचपन जिजीविषा की धूप से जीवन बसंत का पुष्प डाल पर ही मुरझाया, अदृश्य रूप में हुआ पतझड़ का आगमन पत्थर से उपजा उसका बचपन दिशा विहीन व्यवस्था की
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मेरा दिल डर रहा है, ये भयानक आवाजें न निकालो इस भयानक रात में, इस बरसात में, यूं झगड़कर, यूं रगड़कर किसे डरा रहे हो, शायद तुम दुखी हो, तभी तो रो रहे हो। क्या अधिक वेदना है, क्या अधिक दुःख है इतनी तेजी से, इतने जोरों से, कितना सारा आंसू यूं ही क्यों बहा
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ऐसा कुछ काम करो, अच्छा अंजाम हो,जीवन सफल बने जग में कुछ नाम हो।यहाँ लालच की होड़ पर उलझा इंसान है,स्वार्थों के दल-दल में डूबा ईमान है।लालच अरु स्वार्थ का तुम विधान खोल दो,क्यों बनते हैवान हो तुम तो इंसान हो।ऐसा कुछ………… जीवन की सरिता के तटबंध खोल दो,संतप्तता को ममता का धीर दो।बोयेगा तू
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पढ़ना-लिखना डिग्री डिप्लोमा सब कुछ है बेकार।कभी न दे पायेगा भैया ये तुझे रोजगार।। जूते चप्पल तो क्या एड़ियाँ भी घिस जायेगी।धोती-कुरता पैंट क्या लंगोट तक बिक जायेगी।। पीएचडी डिग्री घर में लटकती रह जायेगी।पर भैया कभी नौकरी तुझको न मिल पायेगी।। भरी जवानी में ही तू सड़िया जायेगा।।उमर बीस होगी तो भी साठ नजर
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नहीं फरक अब गांव शहर में दोनों का है बुरा हाल दरियादिल की बात नहीं अब गांव हुए कंगाल घर-घर हिंसा तू तू मैं मैं घृणा नफरत का छाता जाल मदिरा की तो बात न पूछो मन्दिर का भी नहीं ख्याल! हरियाली और तीज त्योहारों की अब नहीं बहार सावन रूठा, झूला भूले! गीतों का
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