ॐ भूर्भुवः स्वः भोजकट देशाद्भव भार्गव गोत्रोत्पन्न भगवान शुक्र के अवतरण पर ब्रह्मचक्र त्वरित गति से विशिष्ट स्थिति में गतिशील था। तुला लग्न उदित था। धनभाव में स्वगृही मंगल आरूढ़ होकर शुक्र के वंश परिवार की निम्नता प्रकट करके उसकी बुद्धि को मलिन व निम्न वृत्ति का बनाकर संतान का कारक हो रहा था। सहज
ॐ भूर्भुवः स्वः भोजकट देशाद्भव भार्गव गोत्रोत्पन्न भगवान शुक्र के अवतरण पर ब्रह्मचक्र त्वरित गति से विशिष्ट स्थिति में गतिशील था। तुला लग्न उदित था। धनभाव में स्वगृही मंगल आरूढ़ होकर शुक्र के वंश परिवार की निम्नता प्रकट करके उसकी बुद्धि को मलिन व निम्न वृत्ति का बनाकर संतान का कारक हो रहा था। सहज भाव में उच्च का केतु शुक्र के पराक्रम में गोपनीय रूप से अतुल बल दे रहा था। पंचमस्थ स्वगृही शनि, शुक्र की बुद्धि व संतान की मलिन वृत्ति का कारण बन रहा था। षष्ठस्थ स्वगृही गुरु अरिष्टों का नाश करके शुक्र के राज्य-प्रभाव में वृद्धि देकर पारिवारिक सम्पन्नता, अक्षय कोष को बढ़ाने के प्रतीक रूप में था। भाग्यस्थ उच्च का राहु, शुक्र को दैत्यगुरु बनाने को उद्यत था। राज्यस्थ स्वगृही चन्द्र, गुरु से पूर्ण दृष्टि संबंध करके शुक्र को राज्य पर पूर्ण अधिकारी बनाते हुए राज्यगुरु बनने के कारण बन गये थे। लाभेश सूर्य स्वगृही होकर शुक्र की प्रखर बुद्धि पर पूर्ण दृष्टि देकर प्रकाण्डता को प्रदान कर उद्भट विद्वान बना रहा था। भाग्येश बुध व्ययेश होकर लाभ भाव में लाभेश सूर्य की संगति में था। इस स्थिति को आप भृगु संहिता पर देख सकते हैं। यह भृगु संहिता शुक्र के पितृवर द्वारा रचित है।

शुक्र महर्षि भृगु का पुत्र है अतः अत्यधिक क्रोधी व दैत्यों का आचार्य है। इसके २ पुत्र एवं २ पुत्रियां हैं। अर्भक व शंड नाम के पुत्र और देवयानी व अरजा नाम की २ पुत्रियां हैं। एक बार राजा इक्ष्वाकु के पुत्र दंड ने अपने राज्य के कुलगुरु पद से महर्षि वशिष्ठ को मुक्त करके शुक्र को इस पद पर नियुक्त किया था। इसी शिष्य दंड ने शुक्र की अनुपस्थिति में अरजा से बलात्कार किया। जब इसकी जानकारी हुई तो शुक्र ने क्रोधित होकर दंडस्वरूप दंड को शाप दिया कि समस्त राज्य सहित तू एक सप्ताह बाद भस्म हो जायेगा। सप्ताह भर में निर्दोष जन इधर-उधर चले गए और सारा राज्य दण्डकारण्य में बदल गया।
एक बार देवगुरु बृहस्पति ने अपने पुत्र कच को मृत संजीवनी विद्या सीखने के लिए शुक्र के आश्रम में भेजा। शुक्र के असुर साथियों, शिष्यों ने कई बार कच को वध करके समाप्त करने का प्रयत्न किया, किन्तु शुक्र की लाडली पुत्री देवयानी की अनुनय विनती से उन्हें कच को जीवनदान देना पड़ा। देवयानी ने कच से प्रणय निवेदन किया तो कच जैसे योग्यतम शिष्य ने देवयानी को गुरुपुत्री (बहिन) कहकर अस्वीकार किया।
एक शाप के कारण शुक्राचार्य को अपनी पुत्री देवयानी की शादी ऐसे युवक से करनी थी, जो उसकी सहेली शर्मिष्ठा (राजपुत्री) को दासी रूप में स्वीकार करे किन्तु पत्नीवत व्यवहार न करे।
क्षत्रिय युवक ययाति ने यह शर्त स्वीकार की थी। फलतः ब्राह्मण होकर भी शुक्र ने अपनी पुत्री देवयानी का विवाह राजा ययाति से कर दिया। राजा ययाति अपनी शर्त का पालन न कर सका। दासी शर्मिष्ठा से पत्नीवत व्यवहार करके सन्तान उत्पन्न कर दी। इस पर शुक्र ने क्रोधित होकर ययाति को शाप दे दिया कि भरी जवानी में वह वृद्ध हो जाय। शुक्र के दौहित्र पुरु ने अपने पितृवर की वृद्धता स्वयं ले ली और अपना यौवन उन्हें सौंप दिया।
कर्क में 30° से 60° तक का क्षेत्र वृष राशि को तथा 180° से 210° तक का क्षेत्र तुला राशि को मिला है। वृष और तुला ये दोनों शुक्र की स्वगृही राशियां हैं। वृष एक स्थिर जलाश्रयी, उत्तरस्थित, रजोगुणी, शांत, चतुष्पादी स्त्री प्रतिनिधि राशि है। तुला एक पश्चिम स्थित, कुज, चर, रजोगुणी, वायुतत्वयुक्त, क्रूर, विषम, शीर्षोदयी दिनवली भूमिचारी राशि है।
चन्द्रमा से लगभग पांच लाख योजन ऊपर शुक्र ग्रह का अस्तित्व है। सूर्य से लगभग पौने सात करोड़ मील दूर, पृथ्वी से सोलह सौ दस लाख मील दूर है। शुक्र भी पूर्व में उदय और पश्चिम में अस्त होता है। पूर्व में अस्त होने के 75 दिन बाद उदय, उदय के 240 दिन बाद वक्री, वक्री के 23 दिनों बाद पश्चिम में अस्त, पश्चिम में अस्त के 9 दिन बाद मार्गी, मार्गी के 240 दिन बाद पूर्व में अस्त होता है। यह शुक्र ग्रह की अष्टवंगी गति का रहस्यात्मक तथ्य है।
शुक्र अपनी धुरी पर सवा तेईस घंटों में एक चक्र पूरा कर लेता है। एक मास तक एक राशि में गतिशील रहता है। बाईस मील प्रति सेकेंड की गति से लगभग दो सौ चौबीस दिनों में शुक्र अपना परिक्रमा पथ पूरा कर लेता है।
विंशोत्तरी दशा में शुक्र को 20 वर्ष मिले हैं। शुक्र के दीप्तांश 7 एवं कलांश 9 हैं। 6 की संख्या पर प्रभावी होने से 6, 15, 24 तारीखों एवं जून महीने पर प्रभाव रखता है। भरणी, पूर्वा फाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा, शुक्र के नक्षत्र हैं। मीन में उच्च एवं कन्या में नीच होता है। तुला के 15° तक शुक्र का मूल त्रिकोण होता है। बुध, शनि, राहु, शुक्र के मित्र हैं। चन्द्र, सूर्य का शत्रु है। 45° से अधिक दूर सूर्य को छोड़कर कभी भी नहीं जाता। शुक्र की दृष्टि कटाक्षपूर्ण है। अपनी स्थिति से सातवें भाव पर पूर्ण दृष्टि से देखता है। 25-28 वर्ष की आयु तक पूर्ण फलदाता होता है।
शुक्र के 2 प्रारूप हैं। जब सूर्य से आगे के अंशों पर होता है तो पूर्व में सूर्योदय से पहले प्रातःकालीन तारे (मॉर्निंग स्टार) के रूप में चमकता है। जब सूर्य से पीछे के अंशों पर होता है तो पश्चिम में सूर्यास्त के बाद सांयकालीन तारे (ईवनिंग स्टार) के रूप में चमकता है।
कालपुरुष के कान, कण्ठ, ठोड़ी, ध्वनि, अवयव, टान्सिल, बीजकोष, गुदेन्द्रिय, गुर्दा, अण्डाशय, स्त्री अंतरंग, मासिक स्राव पर शुक्र ग्रह प्रभावी रहता है। लोगों ने शुक्र को विभिन्न नाम दिए हैं- भृगु सुत, भार्गव सूनु, काव्य, सित, दैत्यगुरु, काण, उशना, आस्फुनित, दानवेज्य आदि। शुक्र को रोहिणी रमण कहते हैं। चन्द्रमा के लिए शुक्र का स्वगृह वृष सर्वदा उच्च स्थान होता है। विवाह, प्यार, परिणय में शुक्र की प्रमुखता होती है। शुक्र के अस्त होने पर कोई भी विवाहादि शुभ कर्म नहीं होते। गुड फ्राइडे शुक्र का प्रतिनिधि दिन है। आंखों की पुतलियों में शुक्र का निवास है। प्राणी मात्र में कामरूप में व्याप्त है। काव्य ग्रन्थों में शृंगार रस की महिमा का वर्णन शुक्र का ही गुणगान है।
शुक्र विभिन्न राशियों में अलग-अलग प्रभाव देता है; मीन राशि में उच्च का होने पर जातक को विद्वान, राज्य सम्मानित, संगीतज्ञ, सुशिक्षित कवि, विलासी, शांत, लोकप्रिय और एकाधिक स्त्रीभोगी बनाता है, जबकि कन्या राशि में नीच का होकर यह निर्बल, कामी, अपमानित और अनैतिक कार्यों में दुःखी कर सकता है। मित्र और स्वक्षेत्री होने पर यह शुभ व अनुकूल फल देता है, जैसे निर्भय, उद्यमी, संगीत प्रेमी और मिलनसार बनाना, वहीं शत्रु क्षेत्री होने पर अशुभ फलदाता होता है; वृष राशि में यह व्यापार का कारक और तुला राशि में नौकरी कराता है।
शुक्र ग्रह को सिंह पुच्छ का जड़, हाथ के अंगूठे के नीचे के क्षेत्र में स्थान प्राप्त है। यह कला, सौन्दर्य, चतुराई का प्रतीक ग्रह है। ज्योतिष का प्रधान अधिकारी है। नीतिशास्त्र, धर्मशास्त्र, स्मृति एवं न्यायशास्त्र का अधिष्ठाता ग्रह है। यही शुक्र नाड़ी का रचयिता है।
।ॐ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय नमः।। शुभम्।।
















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