कारण- विबन्ध (कब्ज) हमेशा पित्त की विकृति के कारण होता है। पित्त की उत्पत्ति की मात्रा कम होने से भोजन का पाचन सही प्रकार से नहीं हो पाता है तथा भोजन के न पचने पर भोजन में आम (अपक्वता) दोष की उत्पत्ति होती है। अपच भोजन का सही रूप से शोषण नहीं होता तथा अशोषित
कारण- विबन्ध (कब्ज) हमेशा पित्त की विकृति के कारण होता है। पित्त की उत्पत्ति की मात्रा कम होने से भोजन का पाचन सही प्रकार से नहीं हो पाता है तथा भोजन के न पचने पर भोजन में आम (अपक्वता) दोष की उत्पत्ति होती है। अपच भोजन का सही रूप से शोषण नहीं होता तथा अशोषित भोजन आंतों पर चिपक जाता है तथा ग्रहणी की शक्ति कमजोर कर देता है, आंतों की सामान्य गति के अवरुद्ध हो जाने से विबन्ध की शक्ति उत्पन्न हो जाती है।
आलस्य या आराम तलबी के कारण शरीर में पित्त की मात्रा कम हो जाती है। मनुष्य जितना शारीरिक परिश्रम करेगा उसी अनुपात से शरीर में पित्त की उत्पत्ति होगी। इसलिये ऐसा परिश्रम करना चाहिये जिससे शरीर में खूब पसीना आ जाये। इससे श्वास-प्रश्वास तेज हो जाता है। इस क्रिया से रक्तकणों में टूटन होती है। ये रक्त कण यकृत में छनकर पित्त का निर्माण करते हैं। यकृत में पित्त की मात्रा अधिक होने पर यह स्वाभाविक रूप से यकृत से बाहर आकर भोजन को सही रूप से पचाता है। बचपन में बच्चों की कब्ज बहुत कम होती है इसका मुख्य कारण यह है कि बच्चे बचपन में खूब उछलते-कूदते हैं। जिससे उनका अच्छा शारीरिक परिश्रम हो जाता है, इससे शरीर में पित्त की मात्रा अधिक होने से बच्चे जो खाते हैं वह भली भांति पच जाता है। युवावस्था में परिश्रम की मात्रा कुछ कम हो जाती है तो कब्ज की अक्सर शिकायत रहती है, और वृद्धावस्था में परिश्रम बहुत कम होता है जिस कारण कब्ज बहुत ज्यादा होती है।
अतः सदैव अपनी सामर्थ्य के अनुसार जो व्यक्ति परिश्रम करता है वह सदैव सुखी जीवन व्यतीत करता है। कब्ज के अन्य भी कई कारण होते हैं। ज्वर की अवस्था में पाचन क्रिया क्षीण हो जाती है। अतः आंतों में स्थित भोजन सूखकर कब्ज पैदा कर देता है। पित्ताशय, पित्त वाहिनी शोथ, पाण्डु, कामला, आन्त्रकृमि, रक्तचाप वृद्धि में भी अक्सर कब्ज होती है।
कब्ज के लक्षण- यदि एक दिन व एक रात बीतने पर भी मल त्याग का वेग न हो तो उसे विबन्ध (कब्ज) कहा जाता है। इसके अतिरिक्त भोजन में अरुचि, पेट में भारीपन, बार-बार अपान वायु का निकलना, बार-बार मूत्र त्याग आदि कब्ज के लक्षण हैं। कब्ज के कारण मन में मलिनता बनी रहती है, साहस एवं उत्साह में कमी रहती है और आलस्य बना रहता है।
निवारण-
- सर्वप्रथम पाचन संस्थान के प्रत्येक अंगों पर ध्यान देना चाहिये।
यदि मुख में दांत स्वस्थ हों और भोजन की चर्वण क्रिया सामान्य हो तो भोजन के उचित चर्वण से भोजन में लार स्राव के पर्याप्त मिश्रण होने से भोजन में लार स्राव की क्षारीयता भोजन को जलीय घोल में परिणित कर देती है और भोजन पके फल के रस के समान स्वादिष्ट एवं सुपाच्य हो जाता है। उसके पश्चात आमाशय पर ध्यान देना चाहिये। भोजन आमाशय में पांच या छः घण्टे में पचता है। इस अवधि में यदि प्यास लगे तो पानी गुनगुना कर पीना चाहिये। रात्रि में भोजन करने के बाद प्रायः 2-3 घंटे तक सोना नहीं चाहिये। इस बीच कुछ अच्छी पुस्तकों का अध्ययन करना चाहिये। रात्रि को 6-7 घंटे ही सोना श्रेयस्कर होता है। प्रातः काल शौचादि क्रिया से निवृत्त होकर शुद्ध वायु वाले खुले स्थान में टहलना चाहिये।
- प्रातः काल ताम्रपात्र में रखा हुआ रात्रिकाल का जल पीने से भी कब्ज दूर होती है।
- मलविबन्ध का मुख्य कारण अजीर्ण होता है इसलिये भोजन तभी करना चाहिये जब खूब जोर की भूख लग जाय। पेट भरने से पूर्व ही भोजन समाप्त करना चाहिये।
- रात को सोने से पहले उबला हुआ गर्म पानी पीने से भी कब्ज दूर होती है।
- सूखे मेवे, किसमिस, मुनक्का, खजूर, छुहारा आदि के सेवन से भी कब्ज नहीं होती है।
- सभी ऋतु फल, ऋतुओं में मिलने वाली साग-सब्जियों का प्रयोग भी विबन्ध नाशक होता है।
- कई घंटों तक बैठकर लगातार काम करने पर भी विबन्ध हो जाता है इसलिये एक घंटा काम करने के बाद पांच मिनट तक टहलना चाहिये। इससे मानसिक शक्ति बढ़ती है।
- किसी योग्य आसनों का ज्ञान रखने वाले से योगासनों का प्रयोग करने से भी विबन्ध से मुक्ति मिलती है। मानसिक तनाव में किया गया भोजन पोषण के बजाय कुपोषण एवं विषाक्तता उत्पन्न करता है।
कब्ज की उत्पत्ति का मुख्य कारण उदर में रूक्षता (खुश्की) है। अगर ऐसी स्थिति में दस्तावर दवा का सेवन किया जायेगा तो पेट की रूक्षता बढ़ेगी, इसलिये दस्तावर देने से पूर्व पेट को चिकना करना उचित है। इस दृष्टि से कब्ज के रोगी को दो-तीन दिन तक रात्रि में एक बड़ी चम्मच उत्तम एरण्ड का तेल थोड़े गर्म दूध में मिलाकर सोने से पूर्व देना चाहिये। जब कोष्ठ स्नेह युक्त हो जाय तब विरेचन देना चाहिये। आजकल कई दस्तावर दवाइयों का प्रचार-प्रसार हो रहा है। किंतु बिना समझे किसी विद्वान एवं अनुभवी चिकित्सक के परामर्श से ही इन दस्तावर औषधियों का प्रयोग करना चाहिये। कुछ निरापद द्रव्यों में, ईसबगोल की भूसी, गुलाब की पत्ती, अमलतास के फूल, आंवले का मथुर पाक (मुरब्बा), घीक्वार (घृतकुमारी) का गूदा, घी में तली छोटी हरड़ या एरण्डी के तेल में तली छोटी हरड़, मुनक्का, गरम पानी आदि के सेवन से विबन्ध (कब्ज) से मुक्ति मिल सकती है।
















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