लकीर पिटेणी

लकीर पिटेणी

‘लकीर-पिटेणी’ मात्र कहानी का ही शीर्षक नहीं बल्कि एक ऐसे व्यक्ति का उद्गार भी है, जो अपने समय का महान कर्मकाण्डी और ज्योतिषी था। बात बहुत पुरानी है। तब मैं एक “मिडिल स्कूल” में अध्यापक था। वेतन में मास्टरी मिली थी। तब मैं स्कूल में ही रहता था। रहना-बसना, खाना-पीना, सब स्कूल के एक कमरे

‘लकीर-पिटेणी’ मात्र कहानी का ही शीर्षक नहीं बल्कि एक ऐसे व्यक्ति का उद्गार भी है, जो अपने समय का महान कर्मकाण्डी और ज्योतिषी था।

बात बहुत पुरानी है। तब मैं एक “मिडिल स्कूल” में अध्यापक था। वेतन में मास्टरी मिली थी। तब मैं स्कूल में ही रहता था। रहना-बसना, खाना-पीना, सब स्कूल के एक कमरे में था। उत्तर प्रदेश में, आगरा विश्वविद्यालय ही एक मात्र विश्वविद्यालय था, जो शैक्षणिक कार्य से जुड़े लोगों को व्यक्तिगत रूप से अपनी शैक्षणिक योग्यता बढ़ाने का मौका देता था।

एक अध्यापक के नाते मेरी बी.ए. की परीक्षा हुई। ‘नेशनल हेराल्ड’ दैनिक पत्रिका में परीक्षा फल भी आ गया था। मेरा ‘रोल नम्बर’ भी आ चुका था।

किसी भी पत्रिका में “परीक्षा फल” का छपना और उसमें “रोल नम्बर” का होना या न होना, ठोस प्रमाण तब तक नहीं माना जाता जब तक विश्वविद्यालय की प्रमाणिक “मार्कशीट” नहीं मिलती।

मेरी अपनी भी यही समस्या थी। ‘अखबार’ में परीक्षा फल छप कर आ गया, मेरा रोल नम्बर भी आ चुका था, लेकिन कुछ दिन तक ‘मार्कशीट’ न मिलने से मन बेचैन था। इन दिनों मेरा अपना भी मुझ पर शक करने लगा। कुछ न कुछ प्रचार शुरू कर दिया कि वह ‘फेल हो गया’ और अब हमसे ढंग से नहीं मिलना चाहता।

इसी झेंप के कारण मैं गाँव के अपने दादा जी के घर भी नहीं जा सका, जबकि मेरे खास अटूट संबंध थे। यानी महान कर्मकाण्डी और ज्योतिषी, पंडित ब्रह्मानंद जी।

स्वार्थ भावना मनुष्य को बुरे से बुरे काम करने को मजबूर कर देती है। मनुष्य अपनी मनुष्यता और मान-मर्यादा तक त्याग देता है। मैं भी स्वार्थ के ही वश में था। कई दिन से दादा जी से भेंट नहीं हुई थी। आज जब मदद की जरूरत पड़ी तो मुझे उनकी शरण लेनी पड़ी।

दादा जी दरी बिछाकर, आसन बिछाकर, सामने कलम लेकर कुछ लिख रहे थे। मुझे दिखते ही उन्होंने कलम रख दी। कलम रखकर उन्होंने प्रश्न किया, “और बेटा, बड़ी दिनों में दिखे हो, कहाँ से आए हो?”

उनके इस सवाल का जवाब ही मेरी परेशानी और लाचारी था। मैं अपनी समस्या उन्हें कैसे बतलाऊँ, जिसके निवारण हेतु मैं इतने दिनों में उनके घर आया था। आखिर सही-सही अपने दादा जी से अपनी सारी परेशानी सुनानी ही पड़ी।

मेरी उलझन उन्हें तुरन्त समझ आ गई। उन्होंने एकदम अपनी ‘स्लेट’ निकाली और लकीर खींचकर मार पड़ी।

छल-कपट का प्रतीक बन गई। वास्तव में दोष विद्या का नहीं, दोष ज्ञान की कमी का है।

दादा जी और मेरे बीच बातचीत चल रही थी कि अचानक मुझे एक पुरानी घटना याद आ गई। घटना का जिक्र करते हुए मैंने दादा जी से बोला, “दादा जी, ‘काली रात्रि’ की पूजा और उसकी भोजन व्यवस्था तो आपसे छिपी नहीं है, लेकिन मेरे मन में काली रात्रि से सम्बन्धित एक प्रश्न बहुत दिनों से उछल-कूद मचा रहा है।

दादा जी, शुरू-शुरू में मुझे दूर के एक स्कूल में मास्टरी मिल गई थी। तब मैं स्कूल में ही रहता था। रहने-बसने, खाने-पीने सब स्कूल के एक कमरे में था। स्कूल के पास ही एक गाँव था। गाँव वालों से खूब जान-पहचान हो गई थी। यहाँ का कारण अपना घर से दूर रहना ज्यादा अखरता नहीं था।

एक शाम गाँव के श्याम लाल जी के घर पर काली रात्रि की पूजा थी। वहाँ मुझे भी बुलाया गया। वहाँ की पूजा पद्धति, भोजन व्यवस्था और कार्यशैली के बारे में आप खुद ही जानकार हैं। हाँ, एक प्रश्न जो हर घड़ी मेरे दिमाग में उछल-कूद मचा रहा था, मैं आपसे पूछना चाहता हूँ।

प्रश्न यह है कि भोजन करने के बाद, खंडेरू के मुँह में जो जूठा भोजन की पूजा की जाती है, उसका उद्देश्य क्या है?”

दादा जी ने एक नजर मेरी ओर देखने के बाद मेरी पीठ थपथपाते हुए बोले, “बेटा, तेरा यह प्रश्न अति उत्तम और लाभप्रद है। तूने ऐसा प्रश्न पूछने की मुझसे जरा भी उम्मीद नहीं थी। खैर… जब तूने यह प्रश्न कर ही दिया है तो ध्यान से उत्तर भी सुन ले।

हमारे देश में आदि काल के शुरू से ही बलि प्रथा का चलन है। खाद्य वस्तुओं के अभाव के कारण ‘जीवो जीवस्य भोजनम्’ ही पेट भरने का साधन था। और यही साधन बलि प्रथा को जन्म देता है। अपने देवी-देवताओं को भोग लगाकर उन्हें प्रसन्न करने की यह प्रथा एक मुख्य साधन है।

पुराणों में यज्ञ, अष्टबलि, अश्वमेघ यज्ञ यहाँ तक कि ‘नरबलि’ तक का प्रमाण मिलता है। मेरा विचार है बलि प्रथा का मुख्य उद्देश्य देवी-देवताओं को प्रसन्न करके उनका आशीर्वाद हासिल करना ही रहा होगा।

उस समय में बलि प्रथा एक सामान्य क्रिया थी। संजीवनी विद्या के विद्वानों की कमी नहीं थी। संजीवनी विद्या के माध्यम से बलि दिए पशु को फिर से जीवनदान मिल जाता था। साथ ही वह पशु सम्मान का प्रतीक होता था।

आज न तो वह विद्वान ही रहे और न वह विद्या ही। यही कारण है कि प्रथा विवाद का विषय बन गई और वास्तविकता के स्थान पर अब मात्र ‘लकीर-पिटेणी’ रह गई।

बेटा, तेरे प्रश्न का उत्तर यही है। जूठे भोजन की पूजा संजीवनी विद्या द्वारा होती थी, जिसके बल से मरा हुआ पशु फिर जीवित हो जाता था।”

गुरु दुलुंग लुकिगे लकीर पर मार पड़ी।

जानकारी नहीं।

“प्रधान जी न बतै कि वे कि ‘बारहवीं’ की परीक्षा में फेल हुए या क्या बात सही है?”

यह दूसरा प्रश्न था पटवारी का। धर्मानंद ने मुँडु हिलाते हुए बोला, “हाँ जी हाँ, यह बात सही है और यह अच्छे नम्बर से पास भी हुए थे।”

पटवारी जी कुछ और गहराई में डूबकर सोचने लगे। उनका प्रश्न था, “परीक्षा फल के बारे में तुमने उनसे कुछ तो नहीं बोला?”

“ना, पटवारी जी ना। यह नौबत तो तभी आ सकती है जब वह फेल होते या उनके नम्बर कम होते। हाँ, वे दिन से वह कुछ परेशान-से लगते थे।” यह था धर्मानंद का उत्तर।

पटवारी जी ने इधर-उधर नजर डालकर प्रधान और कुछ बुजुर्गों की राय से लाश को नीचे उतार दिया। उनकी सोच थी कि प्रशान्त ने आत्महत्या की होगी तो हो सकता है कि उसने कोई लिखित सबूत छोड़ दिया हो।

तलाशी में पटवारी की सोच सोलह आना सही निकली। उन्हें एक लिखित सबूत मिल गया। उसमें लिखा था—

“मैं खुद ही अपना हत्यारा हूँ। मेरी मौत के लिए न कोई दोषी है, न अपराधी। कारणवश मैंने ही यह कठोर कदम उठाया। ‘रिजल्ट’ खुलने से कुछ दिन पहले मेरे बाबा और मेरे चचा परमानंद में जरा-सी बात पर तू-तू, मैं-मैं हो गई थी।

दो भाइयों की आपसी तकरार में मैं और चचेरा भाई उदय भी फँस गए। चचा ने मेरे बारे में कुछ ऐसा बोल दिया कि मेरे बाबा का गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ गया।

उन्होंने जरा तमतमाकर कहा, ‘अरे परमा, तू झूठ-मूठ बड़ी बात न बोल। अपने उदय की तू तारीफ करते-करते थकता नहीं है। वह प्रशान्त की बराबरी नहीं कर सकता। रिजल्ट आने पर खुद ही दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा।

प्रशान्त ने पहला नम्बर लाया तो तेरा उदय का पास होना भी मुश्किल है।’”

उसने आगे लिखा था कि उसे इस बात का बहुत दुख था कि वह अपने बाबा के शब्दों को मान नहीं रख सका। बात उलट गई। उदय ही प्रथम श्रेणी में पास हुआ और उसे दूसरी श्रेणी ही मिल सकी। यह असहनीय पीड़ा थी, जिसे वह सह नहीं सका और इस कठोर कदम को उठाने के लिए मजबूर हो गया।

अंत में लिखा था—

“आपका अभागा प्रशान्त।”

प्रशान्त के ये शब्द जब पढ़े या सुने गए, उसी वक्त उसकी आँखों से आँसुओं की नदी बहने लगी। यहाँ तक कि उसका चचा परमा भी अपने आपको नहीं रोक सका। वह भी अपने आँसू पोंछने लगा।

धर्मानंद तो होश-हवास में ही नहीं था। कुछ देर के बाद जब वह होश में आया तब उसकी आँखों के सामने, सिनेमा की रील-सी, वह तस्वीर आ गई जिसका जिक्र प्रशान्त ने…

Posts Carousel

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked with *

Latest Posts

Top Authors

Most Commented

Featured Videos