बसंति

बसंति

आज शाम गौं म बसंति कि बरात औंणी छै, फिर बि गौंम न क्वी चहल-पहल छ अर न लोगूं म उत्साह ही दिखेंणू छौ। सोहन लाल काका अपंण भद्दाड्या कुटल न धर्मू बोड़ा मुंगरयड़ म चुल्लु जरूर छी खणंनू। कहावत च कांणि क ब्योम सौ सो जोखन। बसंति कांणि त नि छै पंणि एक आंख

आज शाम गौं म बसंति कि बरात औंणी छै, फिर बि गौंम न क्वी चहल-पहल छ अर न लोगूं म उत्साह ही दिखेंणू छौ। सोहन लाल काका अपंण भद्दाड्या कुटल न धर्मू बोड़ा मुंगरयड़ म चुल्लु जरूर छी खणंनू।

कहावत च कांणि क ब्योम सौ सो जोखन। बसंति कांणि त नि छै पंणि एक आंख से सेड़ि जरूर छै। पर, छुटु बड़ु कनि बि हो, पर ही हूंद अर दोष ही, मनें जौंद वू लोगु ते टीका टिप्पणि करंण कू मौका अवश्य दे जौंद। बसंति जनि जनि ज्वन्नि कि सीढ़ी चढणी छै उनि वीं कु सेडु पन ब्यौं क बातचीत करंण म रूकावट छौ डलंणू।

बसंति, वे अभागि धर्मू बोडा कि नौनि जैन करीब द्वी साल पैलि ही अपंणि घरवक्रि दमयंति अर ज्वान नौनु वामदेव की चिता जले छै। यी दैविक विपदा से मर्यू धर्मू बोड़ा, अपंण आप म खुयूं-खुयूं सि रौंदु छौ। कैन कुछ पूछि दे त वेकु जवाब दींण तक ही बोड़ा कु बुलुंण बच्यौंण छी। सेड़ि बसंति ही वूंकि एक मात्र आधार छै। बसंति मू सुंदर रंग-रूप, चाल-ढाल, बुनुं बच्यौंणु म बड़ि मिठास छै। छुटु से प्यार अर बड़ुकु आदर करंणू वींक अपंणा गुण छा।

भाग्य कबि कतना निर्दयी हवे जौंद या कु प्रत्यक्ष प्रमाण धर्मू बोडा अर वूंकी सेड़ि बेटी बसंति कू दुखी जीवन छौ। बाब क समंणी छी बिना माँ कि परदार ज्वान बेटी कु दुख अर बेटी क समंणि खड़ु छौ वींकु दुर्भाग्य, जैन वीं से माँ कि ममता लूछि दे छ अर शुद्ध सून कि अंगुढि म तांबा कु टांकु सी सेड़ि आंखि देदे छै।

बाब-बेटी क दुखी दिन के न कै तरीं कटंणै छा कि एक दिन गौं कि दीपा काकि, धर्मू वोडा क घर पौंछिगी। धर्मू बोडा गुम-सुम, अपंण आप म खुयूं, छज्जा म बैठी अपंण दुर्भाग्य पर छौ सुचंणू। दीपा काकि न वेक नजदीक जैकि बोली, “अरे छुछ धर्म! यी हालत म कब तक रैलु? कुछ न कुछ त करंणु ही पोड़लु। अफु कु न सै, ज्वान बेटी त कडंली की सी डालि हूंद जु हर घड़ि झुर्र-झुर्र जिकुड़ि रौंद झुरौंणी। इनुं बौग मारि कब तक रैलु?”

बोली, ‘काकि मेरी अपणी गै की ये बैर क्वी कीमत नां। गै त चुकि हूंण बैद जौन छोड़ि माल ख्वैणां।

अपणत्व दिखौंद काकि न बोलि, ‘धर्मू, तु वे परिवार क बारा म सब कुछ जाणंदी। वू परिवार भी तेरी ही तरहि दुर्भाग्य की मार खे बैठूं। फिर बि रामेश्वर न मेरी बात मानी याल पाणी वू जल्द ही वौ करण कू बुलूंण। चार पांच आदमी आल अर बसंती कू डोला रई जाल। बेटा, भाग्य कैन नि देखी। बसंती क भाग म होलु त वा बी मां बणि कि रैलि।’

रामेश्वर, दीपा काकि क बड़ भाई कू नौन ऐ, जू ऋषिकेश म ‘मेल’ कम्पनी म उच्च ओहदा पर काम करद छ। घर म घरवाली माया अर द्वी बच्चा छ। पांच साल की रूपा अर तीन साल कू नौनु रूपम। घर खुस्यूं न छी भ्यूं। भैर बीच म हमेशा ‘एम्बैसिडर’ कार खड़ी छै। एक दिन दुर्भाग्य की काली छाया न, ये हंसद खिलखिल परिवार ऐं अपण बाहों क घेरा म लई की अपणु विकराल रूप दिखे दे माया जब सबेर नास्ता तैयार करणि छै तवि सिलिंडर फटिगी अर माया क कपड़ा आग की लपट म ऐगी। सिन्येटिक रेशूं क कपड़ा बीच गात पर चिपकिगी जब तक रामेश्वर बी तैं संभल्द या से पैलि ही बींक प्राण पखेरू उड़िगी। असहाय द्वी बच्चों की देख-रेख करण कू ये तैं सारु चैण छ। यी मजबूरी क कारण ही वू बसंती क दगड़ ब्यौ करण कू तैयार ह्वेगी छै।

आज वे रामेश्वर की बरात छै धर्मू बोडा क घर औणी। अर तबी सोहन लाल काका चुल्लु तैयार करणू छ। दीपा काकि की मेहनत सफल ह्वेगी अर परदार बसंती बावा तै इजुलि छोड़ी, रामेश्वर की ड्योली बणि कि ऋषिकेश चलिगी।

बसंती कू ब्यौ ह्यां अभी तीन चार साल ही ह्वे छ कि अपण एक मित्र क बुलावा पर मिलै ऋषिकेश जाँण कू मौका मिलिगी। ‘बस’ से उतरकि मिं पैदल ही जांणू छ कि तवि एक एम्बैसिडर कार मेरे समीण रुकिगी। कार से भैर ऐकि एक सजी धजी महिला न मेरे झुट्या म हाथ धरि प्रणाम कै। वा तुरंत भागणी कि मिं बी तै नि छी पछ्याणू। बीन मुख बटि निकलीगी, ‘भैजी, मिंते नि छी पछ्याणने, बसंती छी मिं; तुमारि भुलि।’

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