निद्रा स्वस्थ जीवन का आधार

निद्रा स्वस्थ जीवन का आधार

आयुर्वेद में आरोग्यता को ही सुख कहा गया है। जब शरीर के दोष (वात, पित्त, कफ) समान अवस्था में रहते है तो शरीरस्थ अग्नियां भी समभाव में रहती है जिसे रस रक्तादि धातुओं का निर्माण तथा पोषण भी सम्यक रूपेण चलता रहता है तथा मल निष्क्रमण की क्रियायें में भी यथावत् रूप से होती रहती

आयुर्वेद में आरोग्यता को ही सुख कहा गया है। जब शरीर के दोष (वात, पित्त, कफ) समान अवस्था में रहते है तो शरीरस्थ अग्नियां भी समभाव में रहती है जिसे रस रक्तादि धातुओं का निर्माण तथा पोषण भी सम्यक रूपेण चलता रहता है तथा मल निष्क्रमण की क्रियायें में भी यथावत् रूप से होती रहती है। इसके परिणाम स्वरूप इन्द्रियों में प्रसादत्व एवं मन की प्रसन्नता होती है जिसे स्वास्थ्य कहा जाता है। यह सुख का उपलक्षण है। आयुर्वेद में तीन उपस्तम्भ बताये गये हैं- आहार, निद्रा और ब्रह्मचर्य। जब इन तीनों उपस्तम्भों का युक्तिपूर्वक सेवन किया जाता है तो मनुष्य स्वस्थ रहता है। जब तक ये तीनों संस्कारित रहते है तब तक बल तथा वर्ण एवं उपचय द्वारा मनुष्य स्वस्थ रहता है। इन तीनों में आहार द्वारा शरीर का मुख्य रूप में पोषण होता है, तथा परिणामस्वरूप क्रमिक रूप (Systematic Way) में मन प्रभावित होता है। ब्रह्मचर्य के द्वारा मन में निर्मलता एवं सौमनस्यता आती है, तथा प्रतिलोमक्रम में शरीर की पुष्टि होती है। क्योंकि निद्रा का सम्बन्ध शरीर तथा मन इन दोनों से होता है-

यदान्तु मनसि क्लान्ते कर्मत्मानः क्लमान्विताः।

विषयेभ्यो निवर्तन्ते तदा स्वपिति मानवः।।

(चरक सूत्र 21/35)

अर्थात मन जब कार्य करते-करते थक जाता है और इन्द्रियां भी कार्य करने से थककर अपने-अपने विषयों से विकृत हो जाती है तब ही मनुष्य को निद्रा आती है। इस प्रकार आयुर्वेद के मतानुसार निद्रा वह अवस्था है जिसमें मन एवं इन्द्रियों ये दोनों अपने-अपने विषयों से मुक्त होने के कारण शरीर चेष्टारहित होता है। इस निद्रा को आचार्य सुश्रुत ने वैष्णवी भी कहा है क्योंकि जिस प्रकार विष्णु जगत का धारण-पोषण करते हैं, उसी प्रकार यह निद्रा शरीर का धारण पोषण करने वाली होती है।

निद्रा की उत्पत्ति तम से होती है। प्राणियों का जीवन व्यापार यथोचित रूप से चलता रहे इसके लिए मन, इन्द्रिय तथा शरीर को विश्राम की आवश्यकता होती है। विश्राम अवस्था विशेष को निद्रा कहा जाता है। इस निद्रा को रात्रि स्वभाव प्रभाव कहा गया है क्योंकि यह स्वभावतः रात्रिकाल में मनुष्यों को अपने वश में करती है। आयुर्वेद में रात्रि में आने वाली स्वाभाविक निद्रा के अलावा अन्य निद्राओं का भी उल्लेख किया गया है जो स्वाभाविक निद्रा न होकर अस्वाभाविक निद्रा होती है। अस्वाभाविक निद्राओं की संख्या चरक तथा सुश्रुत ने क्रमशः पांच एवं दो बताई है इस प्रकार आयुर्वेद के अनुसार निद्रा को निम्न रूपों में विभक्त किया जा सकता है।

निद्रा:- सामान्य निद्रा, असामान्य निद्रा

असामान्य निद्रा:- वैकारिकी निद्रा, तामसी निद्रा

वैकारिकी निद्रा:- चार प्रकार की होती है

(1) श्लेष्मसमुद्भव निद्रा

(2) मनःशरीर श्रम सम्भवा निद्रा

(3) आगन्तुकी निद्रा

(4) व्याध्यनुवर्तिनी निद्रा

सामान्य निद्रा:- रात्रि में स्वाभाविक रूप से आने वाली निद्रा को ही सामान्य निद्रा कहा गया है। क्योंकि आयुर्वेद में स्पष्ट कहा गया कि ‘रात्रौ जागरणरुक्ष स्निग्धं प्रस्वप्नदिवा’ अर्थात रात्री जागरण रुक्षता उत्पन्न करने वाला होता है तथा दिन में सोने से स्निग्धता बढ़ती है। अतः रात्रिकाल में स्वाभाविक रूप से आने वाली निद्रा को ही सामान्य निद्रा समझना चाहिये। इस प्रकार कतिपय विशिष्ट अवस्थायें भी होती हैं जिसमें दिन में सेवन की जाने वाली निद्रा को भी सामान्य निद्रा समझना चाहिये। अथवा निम्न अवस्थाओं में दिन में भी निद्रा का सेवन किया जा सकता है:-

(1) जिस व्यक्ति का शरीर अत्यधिक अध्ययन करने अति मात्रा में मानसिक कार्य करने के कारण क्षीण हो गया है।

(2) जिसे उल्टी एवं अतिसार हुआ हो तथा जिसके शरीर का तरल अंश निकल गया हो।

(3) जो व्यक्ति शारीरिक श्रम करता हो अथवा पैदल यात्रा करता हो।

(4) जिसे चोट लगी हो अथवा पागल हो।

(5) जो व्यक्ति इस प्रकार का कार्य करता हो जिसमें रात्रि जागरण करना पड़ता हो।

इसके अलावा वृद्ध एवं बालक आदि को भी दिन में सोना निषेध नहीं है। इन अवस्था प्राप्त व्यक्तियों को दिवास्वापन अवश्य करना चाहिए।

इसके अतिरिक्त ग्रीष्म ऋतु में प्रत्येक व्यक्ति को दिन में निद्रा सेवन करना चाहिये, क्योंकि ग्रीष्म ऋतु में सूर्य की प्रखर किरणें शरीर से जलीयांश का शोषण करती है। परिणामस्वरूप शरीर में रुक्षता के कारण वायु का संचय होने लगता है जब मनुष्य दिन में सोता है तो कफ की वृद्धि होती है जिससे शरीर में संचित वायु शमन होता है।

निम्न अवस्थाओं में व्यक्तियों को दिन में कदापि नहीं सोना चाहिये:-

(1) जो अधिक वजन वाला या मोटा हो।

(2) जो व्यक्ति अधिक कफ वर्द्धक वस्तुओं का सेवन करता हो।

(3) जो व्यक्ति कफ प्रकृति का हो।

(4) जो व्यक्ति कफ व्याधियों से ग्रस्त हो।

(5) जो जीर्ण विष से पीड़ित हो या अन्य विष से पीड़ित हो।

(6) जो गले के रोगों से पीड़ित हो।

सामान्यतः एक वयस्क व्यक्ति को चौबीस घन्टे के चतुर्थांश अर्थात छः घन्टे सोना चाहिये रात्रि के प्रथम एवं अन्तिम भाग को छोड़कर मध्य भाग का समय छः घन्टे का होता है उसी समय में मनुष्य को सोना चाहिये।

असामान्य निद्रा (Abnormal Sleep):- रात्रि में सेवन की जाने वाली निद्रा के अतिरिक्त अन्य निद्रा को असामान्य (वैकारिकी) निद्रा कहा गया है जैसे- श्लेष्म समुद्भवा, मनः शरीरश्रम सम्भवा आगन्तुकी व्याध्यनुवर्तिनी तथा तामसिक निद्रा गम्भीरावस्था की सूचक है जो मृत्युकाल में आती है। आजकल नींद लाने वाली औषधियों के सेवन का प्रचलन बढ़ता जा रहा है, औषधिसेवनोपरान्त आयी निद्रा को भी असामान्य निद्रा समझना चाहिये। इसके अनेक दुष्परिणाम भी सामने आते हैं। विभिन्न उपायों द्वारा स्वाभाविक नींद लाने का प्रयत्न करना चाहिये जिसका विशद वर्णन आयुर्वेद के ग्रन्थों में किया गया है।

निद्रा का महत्व:- यदि निद्रा सेवन उचित समय पर किया जाए तो वह निद्रा शरीर को आयु और सुख से युक्त करती है जिस प्रकार सत्य बुद्धि जब योगी पुरुष के पास आ जाती है तो उसे सिद्धि युक्त करती है। इसी प्रकार आजीवन स्वास्थ्य हेतु निद्रा एक आवश्यक एवं महत्वपूर्ण घटक है। सम्यक रूप से सेवन की गई निद्रा से मानसिक आरोग्यता की भी प्राप्ति होती है।

सामान्य एवं असामान्य निद्रा का शरीर पर प्रभाव-

‘निद्रायत्तं सुखं पुष्टिः कार्यं बलाबलम्।

वृषता क्लीवता ज्ञानमज्ञानं जीवितं न च।

अकालेऽति प्रसङ्गाच्च न च निद्रा निषेविता।’

सुखायुषी पराकुर्यात् कालरात्रि रिवापरा।।’

-चरक सूत्र 21/26/37

इस प्रकार सम्यक और असम्यक रूप से सेवन की गई निद्रा का प्रभाव जीवन पर निम्न रूप में पड़ता है

1. सुख-दुख:- सम्यक् एवं यथोचित रूप में सेवन की गई निद्रा सुख प्रदान करती है। स्वाभाविक निद्रा मनुष्य के सुखी होने की सूचना भी देती है। इसके विपरीत असमय या अनुचित रूप से सेवन की गई निद्रा अनेक प्रकार के दुखों का कारण बनती है।

कई लोग अत्यधिक निद्रा सेवन को सुख मानते हैं, परन्तु वास्तव में यह दुखों को देने वाली होती है, इससे मनुष्य अनेक शारीरिक एवं मानसिक व्याधियों का शिकार हो जाता है।

2. पुष्टि कार्यं:- पुष्टि कार्य का मतलब यहां शरीर के पुष्ट होने तथा दुबला-पतला होने से है। जब उचित रूप से निद्रा का सेवन किया जाता है तो शरीर में आहार का पाचन सम्यक् रूप से होता है जिससे शरीर में रस, रक्तादि धातुओं की पुष्टि निर्वाध रूप से निरन्तर होती रहती है जिसके कारण शरीर के समस्त अंग प्रत्यंग पुष्ट होते हैं। असम्यक् या अनुचित रूप में निद्रा सेवन करने से शरीरस्थ धातुओं का क्षय होता है, जिससे मनुष्य दुबला-पतला हो जाता है। यदि अतिनिद्रा या दिन में निद्रा सेवन किया जाता है तो शरीरस्थ मार्ग कफ वृद्धि के कारण अवरुद्ध हो जाता है जिससे धातुओं का पोषण यथोचित रूप में नहीं हो पाता। कफ वृद्धि के कारण अग्निमान्य हो जाता है परिणामस्वरूप आम रूप कफ की निरंतर वृद्धि होती रहती है। इन कारणों से जब धातुओं की पुष्टि नहीं होती तो शरीर में बल का क्षय हो जाता है। यदि रात्रिकाल में निद्रा का कामना नहीं किया जाता है तो शरीर में रुक्षता बढ़ती है जिस कारण शरीरस्थ धातुओं का शोषण हो जाता है और मनुष्य कृशकाय हो जाता है।

3. बल-अबल:- आयुर्वेद में बल को दो अर्थों में ग्रहण किया गया है। पहला शक्तिग्रहण तथा दूसरा विशिष्ट व्याधि-क्षमत्व एवं ओज प्रधान। सम्यक् निद्रा सेवन करने से शरीर एवं मन में रोगों के प्रति लड़ने की क्षमता बढ़ती है, जिससे मनुष्य स्वस्थ रहता है यदि निद्रा का कामना सम्यक् रूप से नहीं किया जाता है तो शरीर तथा मन में रोगों के प्रतिरक्षण शक्ति कम हो जाती है पारिणामतः मनुष्य सदैव शारीरिक एवं मानसिक व्याधियों से ग्रसित रहता है।

4. वृषता-क्लीवता:- वृषता का सामान्य अर्थ है वीर्य वृद्धि और क्लीवता का अर्थ है नपुंसकता। सम्यक निद्रा सेवन करने से शरीरस्थ धातुओं की पुष्टि होती है जिससे शुक्रधातु की वृद्धि होती है एवं मनुष्य में पौरुष शक्ति विद्यमान रहती है। सम्यक निद्रा से मानसिक प्रसन्नता भी होती है, जिससे मन में संकल्प शक्ति की भी वृद्धि होती है जो कि सर्वोत्तम वृष्यभाव माना जाता है। इसके विपरीत अनुचित रूप में असम्यक् रूप में ली गई निद्रा से धातुओं का क्षरण होता है जिससे शुक्रधातु एवं ओज की पुष्टि नहीं होती है बल्कि इनका क्षय हो जाता है और मनुष्य के अन्दर दौर्मनस्यता आ जाती है। आचार्य चरक ने इसी अवस्था को सर्वाधिक क्लीव कारक अर्थात् नपुंसकता कहा है।

5. ज्ञान-अज्ञान:- ज्ञान भी निद्रा पर निर्भर करता है, विषय, इन्द्रिय, मन और आत्मा इन चारों के संयोग को ज्ञान कहते हैं। जब इन्द्रियां एवं मन ये दोनों कार्य करते-करते थक जाते हैं तो निद्रा आती है विश्राम के बाद वे पुनः अपने-अपने विषयों को ग्रहण करने में समर्थ हो जाते हैं। इस प्रकार सम्यक् रूप से निद्रा सेवन करने से ज्ञान ग्रहण की प्रक्रिया निर्वाध रूप से निरन्तर रूप से चलती रहती है परन्तु जब सम्यक् रूप से निद्रा का सेवन नहीं किया जाता तो मन एवं इन्द्रियां दोनों ज्ञान ग्रहण करने में असमर्थ हो जाते हैं। यदि अत्यधिक मात्रा में दिवाशयन किया जाता है तो शरीर के स्रोत कफ से परिपूर्ण हो जाते हैं जिससे विषय का सम्यक् ज्ञान नहीं हो पाता है। इसी प्रकार अल्प निद्रा या अनिद्रा की स्थिति में भी इन्द्रियों को विश्राम नहीं मिल पाता। अतः ज्ञान ग्रहण प्रक्रिया सम्यक् रूप से नहीं हो पाती है। यदि अनुचित रूप से या अकाल निद्रा का सेवन किया जाता है तो ऐसी निद्रा कालरात्रि की तरह सुख तथा आयु का नाश करती है।

इस प्रकार निद्रा का सम्यक् रूप से सेवन स्वास्थ्य के लिये हितकर तथा असम्यक् रूप से सेवन रोगों का बुलावा है।

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