श्वास (ASTHMA) रोग में आहार-विहार

श्वास (ASTHMA) रोग में आहार-विहार

श्वास एक अत्यन्त कष्टकारी रोग है। इसे दमा के नाम से अधिकतर लोग पुकारते हैं। यह मनुष्य को शारीरिक एवं मानसिक रूप से अक्षम बना देता है। ऐसी मान्यता है कि दमा रोग का अन्त मृत्यु के साथ ही होता है। किंतु यदि रोगी अपने स्वास्थ्य के प्रति सजग है तथा विवेकपूर्वक आहार-विहार करता है

श्वास एक अत्यन्त कष्टकारी रोग है। इसे दमा के नाम से अधिकतर लोग पुकारते हैं। यह मनुष्य को शारीरिक एवं मानसिक रूप से अक्षम बना देता है। ऐसी मान्यता है कि दमा रोग का अन्त मृत्यु के साथ ही होता है। किंतु यदि रोगी अपने स्वास्थ्य के प्रति सजग है तथा विवेकपूर्वक आहार-विहार करता है तो इस रोग से होने वाले शारीरिक एवं मानसिक कष्टों से काफी कुछ मुक्ति मिल सकती है।

श्वास की सम्प्राप्ति- सामान्यतः वायुवेगों व श्वास नलिकाओं में सदैव कुछ तरल पदार्थ का स्राव होता रहता है। जब कभी फुफ्फुस (Lungs) या नलिकाओं में अधिकरक्तता (Congestion) शोथ (Inflamation) या (Irritation) आदि कारणों से यह स्राव अधिक अधिक मात्रा में होने लगता है तब मात्रानुसार एवं कारण एवं संबंध के अनुरूप थोड़ा या अधिक तरल, सान्द्र, घन, कफ के रूप में खांसी के साथ निकलता है। फेफड़ों एवं श्वास नलिकाओं में कफ होने से क्षोभ (Irritation) एवं श्वास वायु के लिये स्थान की कमी से प्रतिक्रिया स्वरूप प्राण वायु एवं उदान वायु का प्रकोप होकर कास एवं जल्दी-जल्दी श्वास लेने की प्रक्रिया प्रारम्भ होती है। इससे स्पष्ट है कि प्रथम कफ की दुष्टि होकर वात की भी दुष्टि होती है। यह दूषित वायु फेफड़ों में व्याप्त होकर श्वास रोग को उत्पन्न करती है। श्वास कार्य में बाधा होने से Oxygen की कमी से प्रत्येक धात्वाग्नियां दूषित होती हैं जिससे प्रत्येक धातु (रस, रक्त, मांस, मेद, मज्जा, अस्थि एवं शुक्र) इन सात धातुओं का पोषण ठीक नहीं होता है।

रोग विज्ञान में वर्णित श्वास शब्द का अर्थ श्वास कष्ट (Difficulty in Breathing) या श्वास कृच्छ (Dyspnoea) किया जाता है। उपर्युक्त का संबंध फेफड़ों से ही है। अतः श्वास रोग में विकृति पूरे फेफड़ों में रहती है। हृदय एवं वृक्कजन्य (Cardiac or renal) भी श्वास होते हैं किंतु अन्ततोगत्वा वह भी फेफड़ों के हो जाते हैं।

श्वास रोग में कुछ छोटी-छोटी ध्यान देने वाली बातें नीचे दी जा रही हैं:-

रोगी को प्रातः उठकर शौच जाने से पूर्व एक-डेढ़ लीटर पानी अवश्य पीना चाहिये। अगर ठण्डा पानी न पी सकें तो पानी गर्म करके पीना चाहिये। पानी अगर तांबे के बर्तन में रात भर रखा हो तो अच्छा है। शौच एवं दन्तमंजन के बाद कटि स्नान करें अथवा घुटनों से नीचे दोनों टांगों को पानी से पांच मिनट तक गीला करके रखें इसके लिये पानी की टोंटी के नीचे क्रमशः घुटनों को रखकर घुटने तथा पिंडलियों को पानी से तर करते रहें। अगर खड़े होने में परेशानी हो तो स्टूल में बैठकर पानी के पाइप से आराम से तर करते रहें उसके बाद बिना पैरों को पोंछे उठ जाएं तथा पैरों को अच्छी तरह से ढक दें। जाड़ा हो तो मोजे पहन लें जिससे रक्त संचार बढ़े। फेफड़ों से रक्त संचार पैरों की तरफ दौड़ता है जिससे श्वास लेने में आसानी होती है।

कटि स्नान के लिये एक प्लास्टिक की बड़ी चिलमची लेकर उसे आधी से अधिक जल से भर लें और उसमें धोड़े वस्त्र सहित बैठ जाएं। यह ध्यान रखें कि टब इतना बड़ा हो कि पानी नाभि तक आ जाए। पैरों को टब से बाहर रखें। अच्छा हो पैर गीले न हों। दाहिने हाथ से नाभि से नीचे पेट को मलते रहें। यह क्रिया पहले एक मिनट से शुरू करके धीरे-धीरे तीन मिनट तक बढ़ा ले जाएं। इससे अधिक समय तक बैठने में नुकसान हो सकता है। इस क्रिया का भी पादस्नान जैसा ही महत्व है। कटि स्नान सप्ताह में तीन बार से अधिक न करें एक दिन या तो पादस्नान करें अथवा कटि स्नान करें या इन्हें एक-एक दिन अदल-बदल कर करें। जो लोग चाय या दूध के अभ्यस्त हैं वे इसे जल क्रिया के बाद ले सकते हैं साथ ही जो नियमित दवाइयां लेते हैं वे भी इस समय एक-दो बिस्कुट के साथ ले सकते हैं।

ध्यान का श्वास एवं हृदय में मुख्य स्थान है। जिस प्रकार का भी ध्यान कोई जानता हो अवश्य करें। ध्यान के लिये सुखासन पर पालथी मारकर बैठ जाएं जो घुटनों के दर्द के कारण पालथी न मार सके वे कुर्सी का इस्तेमाल कर सकते हैं। पहले दाहिने हाथ के अंगूठे से दाहिना नासाद्वार बन्द करके दस बार दीर्घ श्वास लें और बायें नासाद्वार से निकाल दें। फिर छोटी तथा दूसरी अनामिका अंगुली से बायां नासाद्वार बन्द करके दायें नासाद्वार से श्वास अन्दर भरकर दस बार दीर्घ श्वास लें। बायां नासाद्वार बन्द कर दायें नासाद्वार से श्वास बाहर निकालें तथा दायां नासाद्वार श्वास अन्दर भरकर बायां नासाद्वार अंगूठे से दोहरायें। दिन में जब भी समय मिले श्वास निश्वास की इस प्रक्रिया को दस-दस बार दोहरायें। ध्यान निरंतर अभ्यास से ही होता है। अतः ध्यान लगे या न लगे आसन पर जमकर बैठना चाहिये। शुरू में 15 मिनट की अवधि से लेकर बढ़ाकर धीरे-धीरे एक घंटा ले जायें।

ध्यान के बाद घूमना भी श्वास रोग में हितकर होता है। सुबह शाम अपने शरीर के सामर्थ्य के अनुसार नियमित रूप से घूमना चाहिये। इससे फेफड़ों को ताजी हवा मिलती है तथा रोगी का आत्मविश्वास भी बढ़ता है। घूमने के बाद स्नान करने से पूर्व रोगी को नाश्ता करना चाहिये। नाश्ता हमेशा हल्का करना चाहिये इससे श्वास का वेग कम रहता है। इसमें सबसे अच्छा मौसमी फलों का नाश्ता होता है। आम, पपीता, सेब, केला, संतरा, नासपाती, अमरूद जो भी मीठा फल उपलब्ध हो नाश्ते में लेना चाहिये। कभी-कभी अंकुरित मूंग तथा चने आदि ले सकते हैं। आवश्यकता पड़ने पर दूध भी ले सकते हैं इससे शरीर को शक्ति मिलती है।

सदैव श्वास के रोगियों के मन में यह डर बना रहता है कि दूध पीने से बलगम बनता है जबकि यह भ्रम मात्र है कारण दूध एक सुपाच्य वस्तु है। वह शरीर में बल की वृद्धि करता है तथा रोग प्रतिरोधक शक्ति को बढ़ाता है। अतः रोगी को सुबह शाम एक-एक पाव दूध अवश्य पीना चाहिये। अगर श्वास के रोगी को मधुमेह भी हो तो नाश्ते में खीरा, टमाटर, दही, अंकुरित मेथी अथवा मूंग ले सकते हैं। बादाम, काजू, किसमिस, मुनक्का श्वास रोग में लाभप्रद होते हैं। पांच मुनक्का, पांच बादाम, दो सफेद मिर्च की गोली बनाकर रख लें तथा सुबह-शाम मुंह में रखकर चूसे। इससे शरीर को ताकत तो मिलती ही है साथ में रोगी का बलगम भी आसानी से बाहर निकल जाता है।

दोपहर तथा शाम को रोगी रोटी तथा हरी सब्जियां भोजन में ले, दालों का प्रयोग कम करे। अगर दाल लेनी ही हो तो मूंग-मसूर की दाल ले सकता है। सप्ताह में एक बार थोड़ा चावल भी ले सकता है। खटाई, तेल, मिर्च, तली हुई चीजें, मैदा से बने भोज्य पदार्थ, बर्फ अथवा फ्रिज की ठण्डी वस्तुओं का सेवन न करे, जो भी खाये परहेज से खायें। अगर रोगी का शरीर कृश है तो वह शुद्ध घी से बने भोजन का प्रयोग कर सकता है। डालडा अथवा रिफाइण्ड वाला भोजन नुकसानदायक होता है।

श्वास रोगी के लिये अनार अत्यन्त लाभदायक है। यह जहां रोगी को शक्ति प्रदान करता है वहीं बलगम को भी बाहर निकालता है। खीरा एवं फलों के प्रयोग से रोगी के पेट में तेजाब (Acid) की मात्रा नहीं बढ़ती है। श्वास के प्रत्येक रोगी में ऑक्सीजन की कमी तथा कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा बढ़ जाती है। फल क्षारीय होने के कारण शरीर में क्षार एवं अम्ल के संतुलन को बनाये रखने तथा शरीर से हानिकारक पदार्थों को बाहर निकालने में बहुत सहायक होते हैं। रोगी को रात्रि का भोजन जल्दी करना चाहिये। श्वास के रोगी को दिन में सोना वर्जित हैं। पानी कम से कम 5-6 लीटर दिन में अवश्य पीना चाहिये। गर्मियों में सादा तथा सर्दियों में गरम पानी पीना चाहिये। इसी प्रकार की सावधानी स्नान में भी करें। गर्म पानी से शरीर में रक्त संचार बढ़ता है जिससे पसीना आता है तथा यह सांस में सहायक होता है। स्नान अपने शरीर की शक्ति के अनुसार करें। शरीर में थकान तथा श्वास की गति न बढ़ने पाये चाहें तो आप किसी की सहायता भी ले सकते हैं।
अगर पेट में कब्ज हो तो त्रिफला, मुनक्का से पेट साफ करें। श्वास वाले रोगी के लिये कमोड वाली लैट्रिन इस्तेमाल करने में सुविधा रहती है। रोगी को अंग्रेजी, आयुर्वेदिक, होम्योपैथिक अथवा यूनानी दवाई अपने चिकित्सक की सलाह से लेनी चाहिये। जिन्हें अधिक श्वास होता है उन्हें नेबुलाइजर के प्रयोग से अत्यधिक लाभ होता है। नेबुलाइजर तथा पम्प के इस्तेमाल से खाने वाली दवाइयों के कुप्रभाव से भी बचा जा सकता है। शरीर में कोई भी हरकत करने से पूर्व यह सुनिश्चित कर लें कि इससे श्वास तो नहीं फूलेगा अगर ऐसा है- जैसे मल त्याग और स्नानादि के लिये जाने से पूर्व पम्प का अवश्य इस्तेमाल करें, ताकि श्वास कष्ट अधिक न हो सके।

शक्ति के अनुसार हल्का व्यायाम और प्राणायाम किसी अच्छे जानकार की निगरानी में करें। अगर वजन अधिक है तो अपने कद के अनुसार वजन को संतुलित आहार-विहार से कम करें। नाक-कान-गले के विशेषज्ञ से परामर्श तथा छाती का एक्स-रे, खून की जांच डॉक्टर की सलाह पर अवश्य करें। इस प्रकार श्वास रोगी को उपरोक्त बातों पर अवश्य ध्यान देना चाहिये तभी वह इस भयानक रोग का सामना कर सकता है तथा इस रोग से मुक्ति नहीं तो इसका सामना करने के लिये अपने आप को शासक्त कर सकता है।

Posts Carousel

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked with *

Latest Posts

Top Authors

Most Commented

Featured Videos