भोजन विवेक

भोजन विवेक

ईश्वर ने प्राणिमात्र को आहार का विवेक दिया है पर मनुष्य को यह विवेक विशेष रूप में प्रदान किया है। भोजन का केवल स्वास्थ्य की दृष्टि से ही नहीं अपितु अनेक दृष्टिकोण से विचार करना चाहिये। हमें कितना खाना आवश्यक है और हमारा संतुलित भोजन कैसा होना चाहिये इस पर हमें विचार करना चाहिये। जो

ईश्वर ने प्राणिमात्र को आहार का विवेक दिया है पर मनुष्य को यह विवेक विशेष रूप में प्रदान किया है। भोजन का केवल स्वास्थ्य की दृष्टि से ही नहीं अपितु अनेक दृष्टिकोण से विचार करना चाहिये। हमें कितना खाना आवश्यक है और हमारा संतुलित भोजन कैसा होना चाहिये इस पर हमें विचार करना चाहिये। जो लोग बुद्धिजीवी होते हैं वे अधिक श्रम करते हुए नहीं दिखाई देते जैसे कार्यालय में काम करने वाले, सेवानिवृत्त लोग। इन्हें अधिक भोजन की आवश्यकता नहीं होती है पर आदत से विवश होकर वे आवश्यकता से अधिक भोजन कर लेते हैं जिससे उनका मोटापा बढ़ जाता है। इनकी पाचन शक्ति उचित रूप से कार्य नहीं करती और वे पेट के अनेक रोगों से ग्रसित हो जाते हैं पर जो लोग कारखानों में खेतों में तथा अधिक शारीरिक श्रम करते हैं उनकी भोजन की मात्रा अधिक होनी चाहिये। लेकिन प्रायः विपरीत अवस्था ही देखी जाती है। इसीलिये धनी लोगों में मोटापा विशेष पाया जाता है। हमारी पाचन क्रिया की क्षमता भी सीमित है इसलिये प्रायः कब्ज, गैस और अफरा की बीमारी हो जाया करती है।

हम उचित रूप से भोजन करना और श्वास लेना भी नहीं जानते। जो व्यक्ति प्राणायाम करता है उसकी खुराक भी कम होती है। जो खूब चबा-चबा कर भोजन करता है उसकी पाचन शक्ति भी ठीक रहती है। बहुत गरम मसाले वाला भोजन अथवा बहुत ठंडा भोजन आंतों पर घाव कर देता है तथा अनेक प्रकार के रोगों का कारण बनता है। ठीक समय पर ठीक स्थान पर बैठकर चिन्तारहित होकर शांत वातावरण में धीरे-धीरे चबाकर भोजन करना स्वास्थ्यवर्धक है। भोजन सदैव सात्विक होना चाहिये। मसाले वाला, तला हुआ, गरिष्ठ वस्तुयें, मिठाई, खटाई, चटपटा भोजन स्वास्थ्य के लिये अत्यधिक हानिकारक होता है।

भोजन में स्वाद को अधिक महत्व दिया जाता है। स्वाद में प्रियता अस्वाद में अप्रियता का भाव हमने जोड़ रखा है। चीनी, नमक और चिकनाई ये तीनों भोजन के अनिवार्य अंग बन गये हैं। अधिक चीनी के प्रयोग से मोटापा एवं कृमि रोग हो जाता है, अधिक चिकनाई खाने से मनुष्य लीवर, हृदयरोग एवं मोटापे से ग्रसित हो जाता है। अधिक नमक खाने से हृदय रोग, गुर्दे के रोग, रक्तचाप तथा चर्मरोग हो जाते हैं। नमक में जो खनिज है वह कृत्रिम है और जो नमक, शाक, भाजी एवं फलों में मिलता है वह प्राकृतिक लवण है अतः लाभदायक है। शरीर की आवश्यकता के लिये यह नमक काफी है। भोजन में नमक कम हो तो बीमारियां कम होती हैं। नमक छोड़ना केवल स्वास्थ्य के लिये ही नहीं साधना के लिये भी उपयोगी है।

जैसे शरीर के लिये कृत्रिम नमक उपयोगी नहीं है वैसे ही चीनी भी उपयोगी नहीं है। चीनी तो सहज ही चावल, रोटी, दूध आदि में होती है। जो दूध में चीनी डालकर पीते हैं उन्हें दूध का स्वाद क्या होता है पता नहीं लगता। चीनी के अत्यधिक सेवन से अनेक बीमारियां लग जाती हैं और दांत तो प्रायः कीड़े से ग्रसित हो जाते हैं। अधिकांश लोग अनियमित आहार करते हैं। भोजन न तो अधिक मात्रा में होना चाहिये और न कम मात्रा में। अध्यशन आहार का महत्वपूर्ण दोष है। पहले खाया हुआ पचा नहीं और पुनः भोजन कर लेना अध्यशन है। सामान्यतः चार पांच घंटा पहले फिर भोजन न किया जाय। जल भी खाना खाने के एक दो घंटे बाद पीना चाहिये। भोजन का ऋतुओं से भी सम्बन्ध है। ग्रीष्म ऋतु एवं वर्षा ऋतु में पेट की जठराग्नि मंद रहती है इसीलिये इन ऋतुओं में हल्का भोजन करना चाहिये। शीतकाल में गरिष्ठ भोजन किया जा सकता है उस वक्त पेट की पाचन शक्ति तीक्ष्ण होती है। बार-बार चाय पीना, धूम्रपान, पान मसाला, सुपारी, तम्बाकू आदि का सेवन शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य के लिये हानिकारक होता है।

मादक वस्तुओं के प्रयोग से मस्तिष्क का नियन्त्रण शिथिल पड़ जाता है। आधुनिक युग में मदिरा भी एक प्रकार का आहार गिना जाने लगा है और इसका प्रचलन सम्पन्न एवं सभ्य समाज में जोरों से बढ़ रहा है। कुछ लोग भूख बढ़ाने के लिये भांग आदि का सेवन भी करते हैं। मादक द्रव्यों का परिणाम भयंकर होता है और मनुष्य इनका आदी हो जाता है। धीरे-धीरे मस्तिष्क कोशिकायें (Cells) विकृत हो जाते हैं, लीवर की शक्ति का नाश हो जाता है और मनुष्य जलोदर पीलिया आदि रोगों का शिकार हो जाता है। आधुनिक सभ्य समाज में मांसाहार का प्रचलन भी काफी बढ़ गया है। आधुनिक शरीर शास्त्री भी अन्वेषणों के आधार पर मांसाहार को शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य के लिये दोषपूर्ण बताते हैं। स्थूल दृष्टि से मांसाहार में हिंसा और अधर्म का दोष तो विद्यमान रहता ही है।

आहार का एक पहलू है निराहार। हमारे लिये खाना जितना आवश्यक है उतना नहीं खाना भी स्वास्थ्य के लिये उपवास भी आवश्यक है। हमारे शास्त्रों में उपवास का महत्व शारीरिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से भी ढूँढाया गया है। जो लोग केवल भोजन करने का ही महत्व समझते हैं वे भोजन छोड़ने का याने उपवास का महत्व नहीं समझते। वे न केवल मोटापे की बीमारी को अपितु अनेक बीमारियों को भी भोगते रहते हैं। अधिक भोजन करने वाले कमजोर देखे जाते हैं कारण उनको अपने अधिक वजन का भार रात-दिन ढोना पड़ता है। इसलिये विवेकपूर्ण आहार से ही शांत, सुखी, स्वस्थ तथा आध्यात्मिक जीवन पूर्ण रूप से व्यतीत किया जा सकता है।

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