घाम अछे गे छौ। जनि-जनि दिन ढलदु गै अर ब्यखुनि कि कुरबुरि छाण बैठि, थकान से चूर जगदम्बा कि चिन्ता वि बढदु गै। अबि क्षणि कतगा दूर च थीं ढकरि सैंण? वेन चल्द-चलद कीसा परन रुमाल गाड़ी मुख परौ पसीना पूंजि फिर दूर तक नजर डालि अंध्यरू बि जाणु छौ। स्वचण बैठि, गल़्ति कीरि मिन
घाम अछे गे छौ। जनि-जनि दिन ढलदु गै अर ब्यखुनि कि कुरबुरि छाण बैठि, थकान से चूर जगदम्बा कि चिन्ता वि बढदु गै। अबि क्षणि कतगा दूर च थीं ढकरि सैंण? वेन चल्द-चलद कीसा परन रुमाल गाड़ी मुख परौ पसीना पूंजि फिर दूर तक नजर डालि अंध्यरू बि जाणु छौ। स्वचण बैठि, गल़्ति कीरि मिन आज रात पिछने कठुड़ गौं मा बासा रै जाणु छी, सुबेरि ऐ जांदु पर अब क्य हवे सकद, अब त भौत अग्वड़ि ऐ म्यों। जगदम्बान पिछने हेरि त कुछ दूर पिछने बटे एक मनिखौ सि साया आणु छौ। वेन टकटकी लगै दूयखणै कोशिश कौरि, हां आदमी इ चा शौद लाठि टेकी आणु च। लाठि कि ठक-ठक बि सुणेणी च। वे थैं ढाडस स्वेंगे, चलो क्वी दगडु त हवे जालु। उ खड़ू ह॒वेकि वेकि जग्वाल कन बैठिगे।
थ्वड़ि देर मा उ आदिम लाठि-ट्रयकद-ट्रयकद वखम पीँछि त एक उपरि आदिम ये खड़ु देखिक वेन अपड़ा समणि जमीन मा लाठि टेकी दिया हाथुकु वजन लाठि पर दींद पूछि ‘कख जाण तुमन?” अंध्यरामा ठीक से सूरत त नि दिखेणी च पर आवाज अर हाव-भाव से लगणु छी कि क्वी बुजर्ग छन मुंड मा एक टांदु सि बंध्यूं छौ। जगदम्बान ब्वैले ‘साब! जाण त मिन ठकरि सैंण च पर घमटाणु छी कि यख्ुलि कन मा जौलु, तंबि पिछने बटे आप आंद दिखेन त आप जग्वाल कन बैठि म्वों।’
हूं! बुजर्ग आदिमन सांस लींद बोलि ‘ढकरि सैंण त यख मुंगन चार मील पर च अर मिन मीलेक अग्वड़ि तकी आप दगड़ चलि सकण!
“चलो क्वी बात नी च। थ्वड़ि दूरी दगडु त हवे जालु”। जगदम्बान बोलि।
चलो त” बुजर्गन अगने बढ़द बोलि। द्विया हिटण बैठिन। चलद-चलद बुजर्गन पूछि ‘कख बटे ऐन आप अर ढकरि सैंण क्यांकु जाणा छां?’
‘साब मि भा सर्वेक्षण विभाग बटे अयूं छौं। भोल्र सुबेर ढकरि सैंण मा विकास अधिकारि दगड़ कुछ हौर लोग बि वखम आणा छन’ जगदम्बान बतै।
बुजर्गन पूछि ‘क्यांकु थैं आणा छन उ लोग? त वैन बताइ कि एक सरकरि योजना च कि गौं-गौंउ मा जैकि व मिट्टी कि जांच करे जी अर गौं वलो थे बताये जौ कि वस्नै मिटटी मा क्या-क्या नाज या जड़ी-बूटी या फल उगाये सकेंदन। विभाग यांका वास्ता गौ वीं थें प्रशिक्षण बि ।’
हद ‘प्रशिक्षण क्या भूत-पिचासु यें देल्वा? मनिख नामान त सब पणसे गैन। महानगझुन घूलि यलिन सब।’ बुजर्ग कि आवाज मा पीड़ा अर क॒दाक्ष छी।
‘साब! अपड़ पहाडु से फ्लायन कि ईइ पिड़ा थैँ त सरकारन समझि च। तबी त या योजना चलै। बच्यां-खुच्यां जू वि अबि यख रयां छन ऊं से हि शुरूआत करला। हम थैं विश्वास च रोजगार बदलु त भैर जयां लोग बि यख वापिस आला’। जगदम्बान समझाणे कोशिस करद बोलि।
जौंन मैरा का रसीला बग्वानु कु सवाद चाख्यालि उ सच्चेई आला ये बियाबान मा लौटी वापिस?” बुजर्गन जगदम्बा कि बातु से असहमति जतांद बोलि।
‘क्यों नि आला? घ्वीड़ ये बि अपडु चांदु प्यार हूंद। जगदम्बान विश्वास जतांद बोलि। मी बित लखनऊ बटे यख अयूं ताकि अपड़ि पैत्रिक भूमि कि कुछ स्थवा कै सौकु। इनि हौर लोग वि जरूर स्वचदा होला।
‘हयां नि आणा क कतैग बहाना छन’। बुजर्गन तर्क देई। ‘शड़क मा नित नयु फैशन घुमणू थे मोटर-गाड़ी-रेल च, बजार मा एक से एक चीजि खाणू-लाणु-सजाणु अर दूयखणु थैं मिलि जंदन। यख रोजगार मिलि दि जालु पर इ सब चीज कख बटे आलि ज्यांका उ आदि सवे गैन। वे सुख- सुविधा छोड़ी क्योक आला उ लोग?
जगदम्बान वि तर्क देइ ‘साब इ सब चीज त जख लोग रैण बैठि जंदन त व्योपरि वखि पौछै दिंदग। असलि जरूरत त बिजली, पाणि, सड़क, अस्पताल अर अच्छा स्कूलु कि च ज़ु मढु-मठु सरकार पूरि कनी च।’ भौत जन्दि …।
बुजर्गन जगदम्बा कि बात ये बीच मा रोकी अपड़ि बात पर जोर दीं बोलि “माना कि यख वि इ सब सुख-सुविधा पौँछि जालि पर अब पैलिका ऊं जीवन मनख्यूं थैं कख बटे लैल्या जु मेहनति छाया। जिमदरु कै सकदा छा, जौ वैं यीं भूमि से प्यार छौ। उ लोग यूं ढुगड़ौं मा बि पेट भोर अन्न पैदा कै सकदा झा। सुण ब्यटा! पुराणा लोग संयुक्त परिवार मा दरगड़ि रौंदा छाया। क्वी बेटि-ब्वारि घौराकु भैर-भितरकि देखभाल करदि ऐै अर क्वी बैखु दगड़ बोण-मैरौ खेति-पाति अर घास-लखडुकु काम करदि 8। हर चौक गुद्यार मा गीड़ि-मैंस्यू कि खर्क अर बल्दु कि जोड़ि बंधी रौंदि है। धी-दूबैं कमि न हूंदि छै। मोटु लाणु-खाणु छौ फिर बि उ आजा मनख्यूं से भीति सुखि छाया। गांवा का सबि लोग मिलि-जुलिक एक दुसरा का सुख-दुख मा हाथ बटांदा छाया। सबुका बीच आप प्रेम कु रिश्ता छौ। अर अब का स्वार्थि-खुदगर्ज लोग यकुल्सि रौण गीजि गैन। सिर्फ अफू थैं सुख ख्वज्यंदन, हैंका से क्वी मतलब नी च। मेहनत कन छोड़यलि सबन। खुटा पसारी खाणे आदत घड़िगे सबु यैं। क्या बदलि सकल्या तुम ऊंकु ढब, जगै सकवां ऊंमा का भाव?!
सा ‘हम कोशिश त कै सकदा छां।” जगदम्बान विश्वास जतांद बोलि, कुछ लोगु पर बि फर्क पोड़लु त उ हौक थे कि ढब सिकाला।
इनि छव्हीं-बात लगांद द्विवा आदिम मथि धार मा पीछि गैन। बुजर्ग आदिम धार मा ऐक एक दुंगा कि आड़ लेकि बैंठिगे। जगदम्बा बि खड़ु ह्वेंगि। बुजर्गन थीं खांद बोलि’ बस साव मि यखमी तक आपी दगडु के सकदु। अब हमारा बाठा अलग छन।
मिन ये सीध वाख जाण। स्यु पोरम मेरु गौं च। ढकरि सैंणी रस्ता यु मुलि तरफां चलिगे। मुड़ि गदनु पार कै आप गदना किनारा-किनारा जैल्या त वखम बटे डी मील पर ढकरी सैंण पौंछि जैल्या।’
जगदम्बा धन्यवाद जतांद बोलि ‘ठीक च, साब काफि च यखम तकी त दगडु मिलिगे। पर साब इतरु बादु हमुन छुयूं मा कांदि दे अर एक दुसरी परिचय तक नि पूछि। मेरा नौ जगदम्बा च अर मेरु गौं येई ब्लॉक मा थमाणा च। आपी शुभनाम क्या च?’
“नरोत्तम” बुजर्गन अपडु नौ बतौकि पूछि’ थमाणा कैका नौना छन आप?
“मेरा पिताजि कु नौ पुरुषोत्तम जुगड़ाण च जगदम्बा बतै। बुचौ नौ सूणी यें बुजर्ग कि जिज्ञासा बढ़गे त वेन जगदम्बा से पूछि क्या तेरा दादी नौ भैरव दत्त छी?”
हां साब! जगदम्बा हामि भरि।
अर तेरा बूढ़ा दादाजि नारैण दत्त जुगड़ाण झया? बुजर्गन फिर पूछि।
हां साब! यांकु मतलब आप मेरा पुरखी तक जणदन।
‘फिर त नाति तू अपड॒ई खून 8।’ बुद्॒याजिन खुशि जतांद बोलि। हे नाती अब तु मी दगड़ हमारा घौर चल। ढकरि सैंण भोल सुबेर चलि गै। गायत्री त्वे देखी भौत खुश होलि।’
गायत्री? कु गायत्री? अब जगदम्बा कि बि जिज्ञास बढ़िगे।
मेरि धर्मपत्नी च गायत्री अर तेरि दादी च। बुइ्या बिन अपडु ठंदु मुंड मा धौरि अर खड़ा ह॒वे गैन।
आप ये रिश्ता का बारा मा जरा विस्तार से बतैल्या’ जगदम्बा जणणु यैं उत्सुक छौ।
घौर जैकि त्वे थैं सब मालूम हवे जालु। अंबि तु मी दगड़ हमारा घौर चल। बुजर्गन अफु दगड़ चलणै जिद कै त जगदम्बा बि ना नि बोलि सौकि। वे थे वि ये नया रिस्ता का बारा मरा जणणै कि जल्दि । जरासि देर मा द्विया जना गौं मा पींछि गैन। पूरब दिशा मा जून ऐ गे छै। जूनि का उज्याल मा जगदम्बान गौं कु अंदाज लेई। वेन देखि गौं मा सन्नाथा पसर्रयूं छी। कै बि घर मा दूयू-बत्ति कु वि उज्यल्लु नि दिखेणु छौ। दिया जना जनि कूड़ौं क्र बीच बटे अगनै बढिन त जगदम्बान देखि अधिकांश कूड़ि त खंडहर हुईं छन अर बक्यूं का द्वार-मोर बंद छन। गुठ़यार उजडूयां अर घास जमी। झाड़-झंकारा बीच बाठीं कु तक पता नि लगणु छी। जगदम्बा स्वचण बैंठि कि कना लोग छन ये गांवा का जौंन सरु गौ बंजायूं च। आखिर गौं पार कै एक उच्च चब्वा कि सीड़ि चौढ़ी द्विवा आदिम एक लम्बा चौड़ा पठयलिदार चौकम पौंछि गैन। जूनि का उज्वला मा समणि पर एक भव्य तिबरि चमकणी छ। इतगा बड़ि तिबरे, इन लगणु छौ बुलेंद पुराणा जमाना का राजी कु महल होलु। बृड़या जिन चौक मा पीچھदिइ थे लगैव “गायत्री! मेहमान अयां छन’। जरसि देर मा एक बुड़ड़ि झु्की कमर हाथ मा छिल््ला बाली भैर आइ।
जनि बुडंड़े नजीक ऐ त छिल्लौं का उज्यल्ा मा जगदम्बान द्विया बुजर्गुकि तरफा देखि त वेका पेट मा कंपकॉपे सि छुटिगे। जीर्ण-श्षीर्ण काया, मुख पर झुर्यूं का मुच्यड़ा, सिर्फ ढी-दी बटन सि आंखि चमकणी ऐ। सूखि खाल से ढक्यूं शरीर, शरीर कम नरकंकाल सि लगणा झया। बदन परा कपड़ा बुलेंद कटी पर ढंग्या होवन। जगदम्बा स्वचण बैठि, इ विचित्र लोग बच्यां कन मा छन? कखम च यूंकि सांस अटकी। यूं हडगौंकि धुपड़ि लेकि इ चलना-फिरना कनै छन? इबरि यूं ये कै सहारा कि जरूरत छ। यु कन दुर्भाग्य च हमरु जु हमुन जन्म दीण वला ब्वे-बुबों थैं इन असहाय छुट्टयूं च।
तबि बुड्टयाजिन बुडड़ी तरफां देखी बोलि ‘यु नौनु थमाणा भैरवदत्ती नाति च’। इन सुणदई बुडड़ि कि आंख्यूं मा एक तेज चमक सि ऐगि। वींन छिल्लौं कु उज्यलु जगदम्बा का मुख अगने कीरि कि यक टक वे यैं स्नेह से दूयखण बैठिगे।
जगदम्बान बुडड़ि का खुटा छुवनी अर खड्डु हवेगि। बुड़ड़िन दैणा हाथन जगदम्बा कि चौंठि कि भुक्कि पेह अर मुंड मलासण बैठिगे। बुडंड़ि का लाड मा अथाह ममता कि अनुभूति हूणी छ जगदम्बा यैं। फिर बुड़ड़िन जगदम्बा कु बौफर पकड़ी बोलि ‘औ भितर औ’”। तिन््या माबत भितर चलि गैन।
भिरत खिड़क्यूं बटे जूनि कु उज्यलु आणू छीं। बुड़ड़िन फिर जगदम्बा कि भुक्ति पींद बोलि “म्यरा दैं भूक लगी होलि मि झट खाणु बण्णांदु'”। इन बोली बुड़ड़े भितर चलिगे। बुडया जिन एक आसण मा जगदम्बा ये बिठाइ अर अफु बि बैठि गैन।
जगदम्बान अंध्यरु देखी बोलि ‘ये गौ मा सैद बिजलि नी च पर दिया-बत्ति कु बि क्वी इंतजाम नी च क्या”
‘इंतजाम कन नी च नाति हम दैं त अब अंध्यरी मा रौणे आदत सिम्बड़िगे।’ बुड्या जि अपड़ा उदगार बताण लगिन, “उज्यलीं देखी अब डौर लगदा यूं उज्यलों नीत हमारा पौर अंध्यरा कैन। यूं उज्यलौॉन ईं धरति कु भविष्य उजाडयालि। बस अब त हमरि ईइ स्वची च कि जब क्वी अपड़ा ईं कूड़ि पर आलू तबी वेका हाथुन दूयू जगवोला तबी हम यैं बि मुक्ति मिल सकलि।’ जगदम्बान बुड्या जिका मन कि पिड़ा हम थे समझद बोलि “आप मी थें अपडु नाति समझदन त जु आप यें ऐतराज न हो त मि दूयू बालि दींदु।’
‘चिरंजीव रै बाबा तु” बुडया जि गदगद हृवे गैन। वो अफ़ार जलोटा पर च एक बडडु सि दयू। तेल वि वखिमु च।’
जगदम्बा उठि, वेन कीसा परन माचिस गाडि कि तिल्लि का उज्यला मा बोतल परी तेलन, दरयू भोरि दे अर बत्ति जी दे। फिछने बटे द्विया बूड-बुडया बि खड़ा हवे गैन।
अब दिवा का उज्यला मा जगदम्बा न कमरा कु जायजा ले। काफि बड़ि बैठक, पुराणा जमाना का तरस्यां पत्थर का सिंधाड़, नक््कासि दार लकंड़ि कु काम, अपड़ा जमाना का रहीसि ठाट बयां कना छ।
जगदम्बा आसण मा बैठद पूछि ‘इतगा बाड़ि तिबरि अर रौण वला तुम डी प्राणि? बकि लोग क्या भैर रंदन’?
‘क्या बताण नाति, जौंका बाना बणै है या तिबरि ऊंनी मुख फेर्यानि’। लम्बी सांस लींद बुडया जि ब्वन लगिन ‘कतगा सुपण्या देखि छा हमुन ईं तिबरे बणांदि दां। हमुन सोचि छी कि हमरि आण वलि कई पीडूयूं तक ईं धरति कि रस्थाण कबि कम न पोड़ अर या धरति ऊंका वास्ता इनि रसवन्ति बर्णी रौ तबी त उ ईं धरति से जुड्या राला। ये वास्ता हमुन ऊंकु थैं इतगा जगा-जमीन अर या आठ बासा तिबरि बणै 8 ईं तिबरि पर आठ परिवार कदूठा आराम से रै सकदा छाया पर “… बुडया जिन ठंडि सांस ल्ींद बोलि “हमारि स्वर्ची हमुमै रेगि। नि यै ऊंधैं या तिबरे या जगा जमीन रास’।
‘फिर इन क्या ह॒वेगि कि आज ई तिबरि पर आप द्विया यखुलि रैग्यां?’ जगदम्बान जिज्ञासा वश पूछि।
बुहया जि बताण लगिन “हम तीन भयूं का संयुक्त परिवार कट्ठा रौंदा छा। परिवार मा दुबरणि-जिठाष्पूं या सासु-ब्वार॒यूं कि ठिसामिसि त हूणीइ रंदन पर जब सबुका बच्चा सयाणा हूण बैठिन त हमुन बच्चौं यै भेर पढ़णु भेजिदे। कुछ का ब्वे-बाबु वि दगड़ि भ्यजिन। कै ये कुछ दिन
वास्ता भैरी अनुभव लीणू ये भेजि? हमुन सोचि हमरीं ये बोण-भैरौ वि ज्ञान हृण चयेंद। इन न हो कि उ भैरै दुनिया से अलग-थलग हवे जावन पर ….।
‘पर क्या? जगदम्बान पूछि।
“’निदुरा खुदगर्जी भैरकि चकाचौंध मा इन हरचिन कि आज तक पता नि चलि’। बुड्या जि कि आवाज मा अथाह पिड़ा 8 “आज एक गै, भोज हैंकु गे, हौर त हौर अपड़ा बाल-बच्चौं अर ब्वे-बुवीं थै वि दगढड़ि ली गैन। हम इकै-इके कै सबु थैं जांदु दुयखद रै ग्यां। सब घरू कि ईइ कथा छन। ऊंका पिछने हमारा दूयवर्तीं का थान, हमरि संस्कृति कि विरासत सबि कुछ लोप हुवे गैन। अब न कै पौरम संग्राद बजद न चैल्वलि अर बग्वान मनायेंद, न पंडी नचदन। पुराण दिनु वैं याद करद बुह्याणि व्वन लगिन’ कबि येई चौकम पंचमि बटे गीतु का झमका लगदा छाथा। आधि रात तक बेटि-ब्वार॒यूं कु खिकच्याट मच्यूं रौंदु छी। ई बैठक मा मर्दु कु जमघट लगदु छो। अरबि हुक््का पींदा छा अरबि गीं बोण-भैराकि छवी लगदि ठ॥ अब सब खतम हवेगि। सब ऊंई दगड़ उद्द बौगिये। बस! हम यूं दुर्गों पकड़ी वैदया झं। न हो के दिन इ ढुंगा वि उदृद सरकि जावन’। ब्वलद-ब्वलद बुड्ूया जि शोक संतष्त हवे गैन।
विषय बदलणै गरज से जदगम्बान याद दिलांद पूछि “आपन मी थे अपडु खून बते छौ जरा ये रिस्ता का बारा मा बतैल्या’।
बुदयाजिन जगदम्बा का आंखों मा देखी बोलि “तेरा बूढ़ा दादाजि नारैण दत्त जुगड़ाण नि मेरा जेदु छा। गायत्री का खास बड़ा भैजि।
‘क्या? मेरा बूढ़ा दादा आपका जेदु? ईं दादि का खास बड़ा भै? आपौ जन्म कबचौ च? जगदम्बा थे यकीन नि हृवे त वेन पूछि दे।
“’मेरु जन्म सोला गति मंगसीर सन् अद्ृठारा सौ सतासिकु च।’ बृइया जिन जगदम्बा थैं धुरद बोलि।
जगदम्बान अंदाजन हिसाब लगांद बोलि ‘फिर त आपै उमर इचरि लगभग एक सौ बीस-पच्चीस हृण चर्येंद ।’
‘एक सौ सत्ताइस साल च मेरि उमर इबरि’ बुड्या जिन हैंसद बोलि।
जगदम्बा यैं यकीन नि हवे। अबि उ कुछ हौर पुछदु तबि बुढ़िया जि द्वी थाल्यूं पर खाणू समजैकि लैन अर जगदम्बा से बोलि ‘हे बाबा! स्यां जन वि बण्यूं होलु काचु-पाकु दादि का हाथी बोली खैलि स्व’।
भूख त भारि लगीं ऐै। जगदम्बान मनीमन मा सोचि जन बि होलु भूख त मिटि जाली, पर जनि वेन खाणु मुख मा धीरि त बुड़िया जि का हाथु क चमत्कार देखी दंग रैगि। इतगा बन्यू अर इतगा स्वादिष्ट खाणु कि जगदम्बान खाण का अलावा कुछ हौर स्वचण बंद कै दे। बोण-मैर रौण वलु नौनु जगदम्बा वेन कतगै बगत पंचतारा होटलु कु खाणू खै होलु, कतगै व्यो-बरात्यूं कि पीणे स्रै होलि पर जन स्वाद आज ये खाणू पर छौ इन वेन कवि नि चाखि। पेट भोरी खाणा बाद तृष्त स्वेकि वेन हाथ ध्वेन, कुल्ला कौरि अर फिर बैठिगे। ये बीच बुड़िया जिन वखमी एक पलंग मा गदगदु बिस्तर लगैंकि जगदम्बा से बोलि ‘हे बाबा तु रस्तौ थक्यूं छै औ ये बिस्तर मा आराम कीर। जगदम्बा उठे अर विस्तर मा ऐकि पसरिगे। बुड़िया जि वेका सिरवृणा पर बैठी वेकी मुडि मलासण बैठिगे। झणि कतगा स्नेह छौ ऊं हाथु मा। ममता कु इन सुखद स्पर्श वेन पैलि बार महसूस करि। सीण से पैलि बुढ़िया से हि पूछि ‘दादी तु अगर मेरा बूढ़ा दादाजि कि छवटि बैण त फिर मि तुमरु खून कन मा छौ?”
‘त सूष!’ बुढ़िया जि अरबि मुंड मलासणी अर अरबि बताण चैठि’ यु सच च कि तेरा बूढ़ा दादा नारैण दत्त जि कि मि खास पीढि कि बैण छीं। मेरा भैणि का ब्यो हुपां बारा साल हुवे गे छाया पर ऊ्रेके क्दी औल्लाद नि ठै। जब अगने कि बि क्वी उम्मीद नि रै त बुबाजिन भैजि थें हैंकु ब्यो कनू थै बोलि पर भैजिन स्राफ इनकार के दे। भैजि बौजि यैं भौत चांदा छा पर बुबा जिन भैजिकु हैकु ब्यों कनै जिद पकड़ी ठै। यां से अक्सर बौनि भैत दुखि रीदि है। ऊंड दिनू मेरू चौथु नौनु पर छी। मी से वौणिकि दुखि हालत नि दिखे ग्या त एक दिन हम द्विया झणा खुचलिका बच्चा थैं ले कन मेरा मैत थमाणा गयां अर मिन भैरव यें बौजि कि खुचाले मा थौरि दे। बौजि थें त जन बुलेंद मूं मंगी मुराद मिलि गै 8 भैजि बि भीत खुश छाया। बस द्विया झण भैरव पर अपंड़ि सरि खुशि निछावर के देकि परवरिस कन बैंठि गैन। दुयखदी-दुयखद भैरव जवान बि हवेगि त मैजिन बड़ि धूम-ध्षाम से भैरवी व्यो हि मतोलि का दौलतराम खंडूड़ि कि नौनि राजमति दगड़ कै दे। व्यवा का द्वी साल बाद तेरा बुद्या पुरषु कु जन्म होय। ‘द बस अब बकि हौर बात भोली छोड़े दे अर सेजा’ दादिन मुंडि दबांद बोलि। जगदम्बा रस्तौ दक्यूं त छंई छौ फिर दादि कु मधुर स्पर्श पैकि वे ये कब धोर निंद ऐगि फ्ता निलंगि।
सुबेरि जनि धाम कि झौल चम्प मुख पर पोड़ि त जगदम्बा कि निंद खुलिगे। वेन आंखा ख्वलिन त भींचक दयखदुड्ट रेगि। वेन अपड़ा चौतर्फि देखि। ए एक दुट्यां खंद्यारा आधा उजइयां कृणा पर पुराणा पराना ऐंछ प्वड़यूं छौ। रातकि वा बैठक उ बूड-बुड्या कख गैन? हैरान-परेशान ठग्यूं सि उ खड्डु हवे समणि पर पड़यू अपडु झवला उठे इना-उना दूयखण चैंछि उ दादि-दादा क्वी नि छा। एक टुट्॒यां जलोटा पर वेकु बल्यूं दूधू अबि बि जगणु छो। उ हड़बड़ैकि भर निकलि वेन खंद्वारै तरफां देखि एक पुराणु तिबरि नुमा मकान झणि कतगा वर्षु बटे खंदार बणी बांजा प्वड्यूं छी। टुट्॒या सिंधाड़ ऐंछ लगी एक लम्बि पत्थरै शैतीर पर तरासी लिख्यूं छौ “गायत्री भवन सन् उन्नीस सौ पच्चीस’। मति भ्रम कि सि स्थिति मा जदगम्बा गौं से भैर सड़कि मा आई। व्यालि राति का सब घटना क्रम वेका दिमाग मा रिटणा छा। दुबटूटा मा ऐकि उ कपाल पर हाथ रखी बैठिगे।
तबि मुड़ि बटे वेके स्टाफ तीन-चार आदिम वे थै ख्वजद-ख्वजद वखम पौँछि गैन। ऊंन बताई कि ब्यालि आप नि पींछ्या त हम ये फिकर ह॒वेंगि। फोन पर सब जगा खबर के मालूम हवे कि आप कठुड़ से अगनै ऐग्यां पर आपी फोन हि नि लगणु छौ।
जगदम्बान बताई कि मेरा फोन बेट्री खतम हवे गे 9 ये वास्ता आप यें सूचित नि करि सकयूं। येका बाद वेन व्यालि रातै सरि घटना विस्तार से ऊं थे बताई। ऊं लोग मा वे इलाकी प्रधान वि छी। वेन बोलि “जुगड़ाण जी! मेरि पचपन सालै उमर ह॒वेंगि मिन त बचपन बटेकी इ यु गौ अर या तिबरि इन्नि उजड़ी देखि। मेरा फिताजि बतांदा छाया कि कै जमाना मा यखा नरोत्तम जिन या तिबरि अपड़ि घरवलि गायत्री का नौ पर बणै ह। वे वक्त यु गौं सेठकू गैं चले जांदु छी। उ द्विया बूड-बुड़या जरूर क्यी प्रेतात्मा 8ै। भगवान कु बनन््यवाद कौरा कि आप सुरक्षित छन।
जगदम्बान गीं कि तरफां दूयखद बोलि ‘उ प्रेताम्मा नि छै बल्कि उ ई धरतिकि आत्मा 9ै॥ हम अपड़ा कामकि शुरूआत येई गौं से करला। चलो आगै बैठक मा यखि बटे शुरूआती प्रस्ताव पास करांदा।
















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