• वीं रात

    वीं रात0

    घाम अछे गे छौ। जनि-जनि दिन ढलदु गै अर ब्यखुनि कि कुरबुरि छाण बैठि, थकान से चूर जगदम्बा कि चिन्ता वि बढदु गै। अबि क्षणि कतगा दूर च थीं ढकरि सैंण? वेन चल्द-चलद कीसा परन रुमाल गाड़ी मुख परौ पसीना पूंजि फिर दूर तक नजर डालि अंध्यरू बि जाणु छौ। स्वचण बैठि, गल़्ति कीरि मिन

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