महंगै अर माभारत

महंगै अर माभारत

महंगी एक इन्नु शब्द च जैकु असर शब्दभेदी बाण से बी ज्यादा च, म्यार ख्याल से त महंगी अर गरीबी कू साख्यूं कु बैर च। क्या पता महंगी अर गरीबी कू जलम जलामांतर कू प्रेम ह्वा या ह्वेय सकद वूंन्कि सौं करार करीं हो। खैर जू बी ह्वा यक्खम म्यारु मकसद आज अचाणचक्क से महंगी

महंगी एक इन्नु शब्द च जैकु असर शब्दभेदी बाण से बी ज्यादा च, म्यार ख्याल से त महंगी अर गरीबी कू साख्यूं कु बैर च। क्या पता महंगी अर गरीबी कू जलम जलामांतर कू प्रेम ह्वा या ह्वेय सकद वूंन्कि सौं करार करीं हो। खैर जू बी ह्वा यक्खम म्यारु मकसद आज अचाणचक्क से महंगी अर गरीब गुर्गों रिश्ता नाती कि ऐसी तैसी कन्ना कतै नी च उन बी महंगी अर हमरु रिश्ता कुई द्वी चार दिनौ रिश्ता नि च। सच बात या च कि हमर बुबा अर दद्दा बी महंगी से इन्नी डरदा-घबरान्दा छाई जत्गा आज हम घबराणा छी, हमर मुल्क मा महंगी थेय कू ल्याई? जब हम ई बाते छांट-छांट करण बैठो त पता चली कि भारत म गरीबी अर महंगी प्रेम कि या कथा पटकथा कुई नै नि च। पिक्चर बी च बस पिक्चर का कलाकार किरदार नै-नै छीं। महंगैक जनता सदनी त्राहि-त्राहि करद वा बात हैकि च कि सरकार थेय खाली चुनाव टैम फर महंगी से मुंडरु हूंन्द, महंगी कि मार से कणी सरकारी कि मौ धार लग्गी जान्द त कणी दा या विरोधी पार्टी थेय सत्ता सुख चखणा कु मौका बी दिन्द, वेका बाद सैद फिर ने सरकार अर महंगी मा घुंच-पींच ह्वेय जान्द, सरकार फिर अपडा राज काज मा मस्त ह्वेय जान्द अर महंगी अपडा काम मा।

महंगी फर दिमाग तचाणा बाद जब म्यारु द्वी घूट च्या पीणा कु ज्यू ब्वाल त साब मी भितर तक कौंपी ग्यौं अर सोच मा पोड़ी ग्यौं कि जे मुल्क मा चिन्नी कु जबरदस्त उत्पादन हूंणु च वक्ख च्या अज्काल इत्गा कढ़ी किले हूंणी च, आखिर क्या बात च कि अज्काल च्या कु नौ सुणिक ही बस लोगीं गिच्ची टटमिरी अर मिजाज खराब ह्वेय जान्द? खैर उन बी हम्वेय आज तक च्या पेकि क्या मिल? अरे भै मी त ब्वल्दु कि आखिर हम ईं च्या थेय पीणा किले छो? सवाल त यू बी च कि हम प्याज अर टिमाटर किले खन्दी? खैर सवाल ता और भी भोत छीं पर फिलहाल म्यार ज्यू च्या पीणा कु कन्नू च। च्या से एक बात दिमाग मा कबल्लान्द कि जे देश मा च्या फर चर्चा कैर कैरिक एक मजबूत सरकार खड़ी ह्वेय जान्द वे देश मा महंगै कि मार से टटमिरी हुयी बिचरि चिन्नी कि ई हालत फर शोक मनाणु क्या असल राष्ट्र-प्रेम अर लोकतांत्रिक परम्परा दल्ली बात नि च? खैर परम्परा कु क्या च? वू या त निभाणा खुण हुन्दी या फिर त्वडणा खुण? सैद ने सरकार बी महंगी फर पिछिल सरकार जन्न परम्परा निभाणी च।

च्या पिन्द-पिन्द परम्परा से मेरी खोपड़ी मा एक ख्याल आई कि अगर पुरण जमाना मा बी अगर इन्नी महंगी हूंन्दी त क्या हाल हुन्दा? जरा स्वाचा छी कि अगर द्वापर युग मा बी इन्नी महंगी हून्दी त तब क्या हालत हुन्दी? क्या पता से कुरुक्षेत्र मा श्रीकृष्ण कु गीता उपदेश ‘महंगी’ फर फोकस हून्दू?

तब क्या पता से श्रीकृष्ण ब्वल्दा: हे पार्थ “ना शस्त्र ईं थेय भेद सकदु ना आग ईं थेय फूक सकद, न औडल ईं थेय उड़ा सकदु ना पाणि ईं थेय बुगा सक्दु,

हे कौन्तेय! या महंगी अजर-अमर च।”

सैद अर्जुन सवाल करदू

आखिर ईं महंगी कु कारण क्या च माधव?

त क्या माधव ईं महंगी से बचणा कु कुई उपाय नि च?

क्या ईं महंगी से एक आम आदिम थेय कब्बि मुक्ति नि मिल सकदी माधव?

महंगी अर गरीबी मा क्या रिश्ता च माधवर?

येक बाद सैद अर्जुन ब्वल्दुः

हे कृष्ण मियै महंगी से भारी डैर लगद, ईं महंगी दगड़ मी लड़ै नि कैर सकदु!

फिर सैद श्रीकृष्ण ब्वल्दाः

हे पार्थ तुम समझदार आदिम ह्वेय कि बी वीं धाणी खुण शोक कन्ना छी ज्वा शोक करण लैक नि च, जू विद्वान आदिम हूंन्दी वू बर्ची या फिर म्वरी खुण शोक नि करदा, इन्नु कब्बि नि ल्हेय कि महंगी नि रै व्होलि, मी नि रै व्होलू अर तुम नि रै व्होला, अर ना भविष्य मा इन्नु व्हालू कि हम सब्बि नि रौला।

हे अर्जुन महंगी सुख-दुःख गरीबी सब झुंद अर रुडयूं जन्म हून्दी, जू आदिम महंगै से नी घबरान्दू वे थेय साक्षात मोझ प्राप्त हून्द, तत्वदर्शियों मतलब कि आधुनिक अर्थशास्त्रीयूंक हिसाबल असत (भौतिक शरीर) चिरस्थाई मतलब कि सदनी रैण वल्लु नि च पर सत (महंगी) चिरस्थाई मतलब कि सदनी रैण वल्ली च। वूंन अर्थशास्त्र का घोर गैरा सिद्धांत आधार फर या बात ब्वलीं च, इल्लै हे पार्थ ज्वा सरया दुनिया मा फैली च तुम वीं महंगी वेय अविनाशी जाणा, वीं कु नाश कन्ने सक्या कै फर बी नि च।

जू ईं महंगी थेय नी मरण वल्ली समझद वू परम ज्ञानी च अर जू इन्न समझद कि ईं महंगी थेय मरै जा सकदू वू परम अज्ञानी च किलैकि महंगी मार सकद पर महंगी थेय मरै नि जा सक्दु।

हे पार्थ जन्न मनखि पुराणा लारा लत्ता छोड़िक ने लारा पैरद उननी महंगी बी पुरणी सरकार थेय छोड़िक ने सरकार फर चिबट जान्द। ना महंगी थेय अर्थशास्त्री रोक सक्दा ना शिक्षा-स्वास्थ्य-रेल या वित्तमंत्री अर और त और ना ही देशक प्रधानमंत्री।

या महंगी ना टूटण वल्ली च अर ना माटम मिलण वलली ईं थेय ना त फुंड धौले जा सकदु अर ना ही ईं कु बाढ़ण रोके जा सकदु या शाश्वत, सब्बि जग्गाह एक जनन अर सदनी इन्नी रैण वल्ली चीज च।

जातस्य कि ध्रुवो कि व्याख्या सैद तब्ब इन्न हूंन्दि- ‘जैल जलम धार वे थेय म्वरद-म्वरद या महंगी त भुगतण हि प्वाड़लि, यक्ख तक कि स्वन्ना बाद फिर दुबारा जलम व्हालू अर फिर या महंगी दुबर भुगतण प्वाड़लि इल्ले हे पार्थ! ईं महंगी से ना डैर वीं खुण शोक नि कैर।’

‘आश्चर्यत्पश्यति कश्चिदेन…’ कि व्याख्या सैद तब्ब इन्न हून्दि- हे पार्थ! कुई महंगी देय अचरज कैरिक दयख्द, बुई ई वेय अचरज कैरिक बतान्द अर कुई ईं देव अचरज कैरिक सुणद पर बुई-कुई महंगी बारम सुणिक बी ईंका बारम कुछ नि समझ सक्दा क्षत्रिय हूंणा नाता से अपणा धर्मक हिसाबल

महंगी से लड़ करण से बड़म कुई और कर्म तुम खुणि नि च, इल्लै संकोच नि कैर। “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचनः” मा श्रीकृष्ण कु पैली ब्वल्यूं च कि हे अर्जुन तू बस कर्म कैर फल कि इच्छा बिलकुल नि कैर!

फिर सैद अर्जुन सवाल करदू: केशव महंगी का क्या-क्या लक्षण हून्दि? महंगै कु मरियूं आदिम कन्न बच्यांद, कन्न बैठद अर कन्न कैरिक चलद?

खैर या त छाई महंगी का नौ फर मनोरंजन या टैम पास कन्ना बात पर असल बात क्या च?

सच अर उल्टी बात या च अज्काल अर्थशास्त्री मतलब बोलण्या अर्थशास्त्री सरया दिन सूचकांक फर आंखा लगौकि महंगी खुण रुणा रैन्दी, अखबार, टी.वी. फल जणगुरु लोग अर विपक्षी नेता महंगी कु महामात्य सुणाकि सुबेर भटेय राति का रूदन कैरिक हम थेय इनन समझाणा रैंदीन कि मै सरकारकु महंगी बढ़ा याहु निर्भगी इन्न बी नि स्वचदा कि जे फर बितणी होलि वू कन्न नि जाणकू या बात?

या बात ता हम बी जणदी कि हम फर महंगी कु रोग लग्युं च हल्ला क्यों कन्ना छी भई सुद्दी-मुद्दी, कुछ दवै-दारु च ता ब्वाला नथिर।

मै म्यार विचार से त महंगी एक गल्या बल्द सी च, वे थेय कत्गा हि सोटूगी मारा वेल अपड़ गल्यापनन नि छब्डणु, पर किलैकि सरकार ब्वलद कि हमल महंगी फर लगाम लगाण ता यान्कू मतलब क्या व्हाई?

मतलब यू व्हाई कि महंगी गल्या बल्द नि च घ्वाड़ा च, अरे भै लगाम त आखिर घ्वाड़ा फर हि लगन ना बल्द फर थोड़ी लगद, वे फर त म्वाल्म लग्दीं, पर यक्ख ता उलटा काम हूंणा छीं सरकार महंगी फर त लगाम लगा नि सकणी च उल्दू जनतौ गिच्चौं फर म्वाला लगाणी च।

महंगी से सरकार अर जनता जथ्गा परेशान छीं विपक्षी दल उत्गा हि खुश कि बेटूटीं अब ब्वाला? भोत हल्ला मचाणा छाई ना तुम हमर टैम मा? इतिहास बी गवाह च कि महंगी सदनी सरकार कि सौत अर विपक्ष कि प्रेमिका बणिक रैन्द, महंगै विपक्ष खुणि खाली एक मुद्दा नि च यू सरकार फर चलाणा कु एक अचूक ब्रह्मास्त्र च, या रियलीटी शो मा विपक्ष कि बौड़ई खुण एक ‘वाईल्ड कार्ड एंट्री’ जन्न च, हां महंगी का बारामा एक खास बात या च कि महंगी संवैधानिक रूप से पूरी ‘सेकुलर’ हूंन्द किलैकि या सब्बि धर्म अर जाति का लोगों फर एक ही जन्न चिबटद, हां वा बात हैंकि च की असर या आदिम देखिक करद। उनन अगर देखेय जाव ता या एकदम बेशरम अर नानसेंस टैप कि चीज हूंन्द मैं फर शरम लिहाज या मन्खियात जन्न कुई गुण नि हून्दू, यत एक खबेश जन्न हूंन्द, एक बार चिबटी ग्याई त समझा चिबटी ग्याई सदनी खुण।

महंगी कि एक और खासियत या बी च कि या भेष बदल्लण मा नम्बर एक हून्द, कब्बि चिन्नी कब्बि तेल, कब्बि पिट्रोल, कब्बि प्याज कब्बि टिमाटर त कब्बि दाल जक्ख मौका मिलद वक्खी चिबट जान्द। या महंगी कुण्डली मा लग्युं कालसर्प दोष से बी खतरनाक च, महंगी कि दशा शनि-राहू या केतु दशा से बी भारी हून्द, वू दिन बी दूर नी छीं जब लोग ज्योतिष-बामणु या पुछयर मा शनि-राहू या कालसर्प दोष निवारणौ जग्गाह “महंगी” रोग से मुक्ति कु बाटू खुज्याणा कु जाला।

मी स्वच्णु छों कि महंगी फर एक “महंगी पुराण” या फिर “महंगी कि विकास जात्रा, एक शोधपरक अध्ययन” नौ से किताब ल्यखुं, पैली मी स्वच्णु छाई कि यां से पैल्ली कै ‘अर्थशास्त्री’ से ई सलाह कैर ल्यूं पर जब भटेय कुछ अर्थशास्त्री महंगी वेय कंट्रोल कन्न मा फ्लाफ हुईं मिदेय सब्बि अर्थशास्त्री अब सिरफ गिच्चा लाल शास्त्री जन्न लग्दी अर मी वूं से दूर रैणु ही पसंद करदु वुन्थेय बिलकुल बी मुख नि लगांदु, फिर मी स्वचदू कि “महंगी से बचणक 400 उपाय” किताब ल्यखणु आर्थिक हिसाब से जादा बढ़िया रालु।

पर एक बात च या महंगी बी क्या बक्की बातै चीज च तत्बा? अब याखी जू नेता-मंत्री कुछ बग्त पैली ई महंगी फर खामोश बैठयां छाई, जींका गिच्चीं फर म्वाला लम्पां छाई वू आज सुबेर शाम महंगी नौ फर गिच्चा चिरफाडिक रुणा छीं, सरकार देय गालि दिण फर लम्पां हीं अर जनता फर बी चुनगी दिणा छीं कि अब खावा माछा बेट्रटीं।

कनन अन्दीन बेटूटों अब तुम्हरा अच्छा दिन?

अर जू विपक्षी नेता ब्याल्ली तक पिछली सरकार देय महंगी का नौ फर बदनाम कन्ना छाई वूंन्का पितृ पूजणा छाई, आज दूंन्का सरकरी गिच्चीं फर म्वाला लग्यां छीं।

इन्नमा सवाल यु खडू हूं कि आखिर सरकार अर ई महंगी कु रिश्ता क्या च? अगर महंगी आज तलक सरकारों देय डूबाणि च त भें सरकार ईं महंगी कु क्या कन्नी च? भैज्जी बल सुणणा मा आणु च कि सरकार जनता देय कड़ी दवै पिलाणै त्यारी कन्नी च।

त फिर भै रे अब च्या छवाड़ा अर कड़ी दवै पिणा खुण व्हेय जाव सब तयार।

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