जीवेम शरदः शतम्

जीवेम शरदः शतम्

इस धरा पर अवतार धारण कर आयुर्वेद शास्त्र का अनुशासन करने वाले स्वनाम धन्य भगवान धन्वन्तरी के नाम का स्मरण करने से ही रोगियों के बड़े-बड़े रोग भी नष्ट हो जाते हैं। यह कोई कोरी कल्पना नहीं है कारण “विश्वासः फलदायकः” हमारे धर्मशास्त्र विश्वास की धुरी पर टिके हुए हैं, वे कहते हैं :- मन्त्रे

इस धरा पर अवतार धारण कर आयुर्वेद शास्त्र का अनुशासन करने वाले स्वनाम धन्य भगवान धन्वन्तरी के नाम का स्मरण करने से ही रोगियों के बड़े-बड़े रोग भी नष्ट हो जाते हैं। यह कोई कोरी कल्पना नहीं है कारण “विश्वासः फलदायकः” हमारे धर्मशास्त्र विश्वास की धुरी पर टिके हुए हैं, वे कहते हैं :-

मन्त्रे तीर्थे द्विजे देवे दैवज्ञे भेषजे गुरौ।
यादृशी भावना यस्य सिद्धिर्भवति तादृशी।।

अर्थात् मंत्र में, तीर्थ में, ब्राह्मण में, देवता में, औषधि में तथा गुरु में जो जैसी भावना/निष्ठा रखता है उसे फल भी उसी रूप में मिलता है।

चिकित्सा शास्त्र हो या ज्योतिष शास्त्र तथा तंत्र-मंत्र शास्त्र ये प्रत्यक्ष शास्त्रों में आते हैं, क्योंकि चिकित्साशास्त्र में वर्णित औषधियों का रोगानुसार सेवन करते ही रोग का नष्ट होना उसकी सत्यता का प्रत्यक्ष प्रमाण है। इसी प्रकार ज्योतिष शास्त्र के अनुसार वर्षों पूर्व यह घोषणा की जाती है कि अमुक समय पर सूर्य एवं चन्द्र ग्रहण लगेगा और ठीक उसी समय ग्रहण दिखाई देता है। यह हमारी प्राचीन भारतीय विद्या के लिये गौरव की बात है अन्यथा विज्ञान के लिये तो आज भी यह चुनौती का विषय है। तंत्र-मंत्र की प्रत्यक्षता तो सर्वविदित ही है। आये दिन सर्प विष एवं बिच्छू के विष को मंत्रों से शांत किया जाता है।

इसके अतिरिक्त अन्य चिकित्सा पद्धतियों की तुलना में आयुर्वेदीय चिकित्सा शास्त्र की विशेषता यह है कि “मितभाषी च वचोऽष्टि वाग्मिता” के अनुसार बड़ी बात को संक्षिप्त सूत्र में कह देना उसकी अपनी विशेषता है जैसे-

वमनं कफनाशाय वातनाशाय मर्दनम्।
शयनं पित्तनाशाय ज्वरनाशाय लंघनम्।।

वमन से कफ का नाश, तेल मालिश से वात का नाश, सोने से पित्त का नाश तथा लंघन से ज्वर का नाश होता है।

रात्रि को शयन से पूर्व दूध, प्रातःकाल उठकर जल, और भोजन के बाद तक्र (मट्ठा) पियें तो जीवन में वैद्य डॉक्टर की आवश्यकता ही न पड़े। इस प्रकार के सूक्ष्म सूत्रों के आधार पर ग्रामीण जीवन में बारह महीनों के उपयोगी खाद्यों का सुन्दर वर्णन इस प्रकार दिया गया है :-

सावन हरे भादों चीत, क्वार मास गुड़ खाये मीत।
कार्तिक मूली अगहन तेल, पूषों करें दूध से मेल।
माघे घी चीड़ खाय, फागुन उठके प्रातः नहाय।
चैत मासे नीम बसनी, पर बैशाख जाये अगहनी।
जेठ मास दुपहरिया सोवे, ताकर दुख आषाढ़ में रोवे।।

बारह महीनों के इन विविध खाद्यों के अतिरिक्त ऐसे खाद्य पदार्थ भी हैं जिनका खाने में निषेध किया गया है।

चैते गुड़ बैशाखे तेल, जेठे पंथ आषाढ़े बेल।
सावन साग न भादों दही, क्वार करेला कातिक नहीं।
अगहन जीरा न पूषे घना, माघे मिश्री फागुन चना।
इन बारह से बचे जो भाई, ता घर कबहुँ वैद्य न जाई।।

आयुर्वेद का सिद्धान्त है कि “भुक्त्वा शतपदं गच्छेत् छायायाम् शनैः शनैः” भोजन करने के बाद छाया में सौ कदम धीरे-धीरे चलना चाहिये। सोने से कम से कम 2-3 घण्टे पहले भोजन करना चाहिये, नहीं तो मलविबन्ध की शिकायत हो जाती है।

दीर्घायु के लिये भी एक सुन्दर युक्ति का वर्णन किया गया है।

वामशायी द्विभुञ्जानः षण्मूत्री द्विपुरीषकः।
स्वल्पमैथुनकारी च शतवर्षाणि जीवति।।

अर्थात् बायीं करवट सोने वाला, दिन में दो बार भोजन करने वाला, दिन में कम से कम छः बार लघुशंका जाने वाला और दिन में दो बार शौच करने वाला, गृहस्थ में आवश्यक होने पर कम मैथुन करने वाला व्यक्ति शतायु सौ वर्ष तक जीवित रहता है।

इसीलिए अथर्ववेद में लिखा है-

“कृण्वन्तु विश्वे देवा आयुष्ये शरदः शतम्”

अर्थात् सभी देवता तुम्हारी आयु सौ वर्ष करें। इसके पश्चात् एक बात और भी कही है-

“प्रत्यक् सेवस्य भेषजं जरदष्टि कृणोमित्वा”

अर्थात् बीमार पड़ने पर औषधि का सेवन अवश्य करना चाहिये। इसमें कभी भी आलस्य नहीं करना चाहिये क्योंकि “शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्” स्वस्थ शरीर ही धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष का माध्यम होता है। महात्मा एवं संतों का कथन है कि-

पहले सुख निरोग काया, दूजा सुख घर में हो माया।
तीजा सुख सुत दारा वश में, चौथा सुख जस खूब कमाया।

आयुर्वेद में नारायण तेल के उपयोग को बताते समय यह भी संकेत कर देता है कि सब रोगों का उपशमन नारायण (भगवान) के हाथों में है-

नारायण भजत रे जठरेण युक्त, नारायण भजत रे पवनेन युक्त।
नारायण भजत रे पित्तेन युक्त, नारायण भजत रे पवनेन युक्त।

अर्थात् हे जठराग्नि (पाचक करने वाली अग्नि) से पीड़ित मनुष्यो तुम नारायण का भजन करो, हे वात रोगों से पीड़ित मनुष्यो तुम नारायण का भजन करो, हे संसार रूपी महामारी से डरे हुए मनुष्यो तुम भगवान नारायण का भजन करो क्योंकि इन कष्टों से छुटकारा देने वाला नारायण से अतिरिक्त कोई दूसरा नहीं है।

इस प्रकार के असंख्य संकेत सूत्र हमारे शास्त्रों में भरे पड़े हैं। विभिन्न रोगों पर अनुसंधान करने से एक बात सामने आती है कि जिन लोगों का जन्म शीतकाल में होता है उनमें शीत बीमारियाँ अधिक होती हैं तथा उन्हें गर्मी भी असह्य होती है।

चिकित्सा में वर्तमान स्थिति में यह अवश्य सोचनीय बात है कि आज तथाकथित चिकित्सक अनुसंधान तथा स्वाध्याय के अभाव में रोगी पर खिलौनों की तरह चिकित्सा की आड़ में मात्र प्रयोग करता जाता है :-

यस्य कस्य तरोर्मूलं येन केनापि पेषितम्।
यस्य कस्य प्रदत्तव्यं यथा तथा भविष्यति।।

अर्थात् जिस किसी जड़ी को जिस किसी भी प्रकार पीस कर जिस किसी भी रोगी को दो कुछ न कुछ तो प्रतिक्रिया होगी ही और होता वही है कि अन्त में प्रयोग करते-करते रोगी स्वयं सिखार जाता है। ऐसे चिकित्सकों के बारे में ठीक ही लिखा है कि इस प्रमाद में चिकित्सकों की धन कमाने वाली बुद्धि भी कम कारण नहीं है। क्योंकि जिसकी बुद्धि अर्थ में लगी हो वह धर्माचरण नहीं कर सकता। जो चिकित्सक मरणासन्न रोगी से भी कुछ न कुछ धन कमाने की कामना करते हैं वे चिकित्सा सेवा कैसे कर पायेंगे? इसमें कोई संदेह नहीं कि आयुर्वेद शास्त्र में औषधि से भी अधिक महत्व पथ्य को दिया गया है।

बिनापि भेषजैः व्याधिः पथ्यादेव निवर्तते।
न तु पथ्यविहीनस्य भेषजानां शतैरपि।।

रोगी पथ्य सेवन से बिना औषधि के भी आरोग्य प्राप्त कर सकता है। परन्तु जो पथ्य सेवन नहीं करता उचित आहार व्यवहार नहीं रखता वह चाहे कितनी भी औषधि ले ले रोग से मुक्त नहीं रह सकता है। इसलिए आरोग्य प्राप्ति के लिये मिथ्या आहार विहार से बचते हुए संयमित जीवन जीकर ही मनुष्य जीवेम शरदः शतम् की युक्ति चरितार्थ कर सकता है।

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