यह एक अत्यंत कष्टप्रद रोग है। ‘अरिवत् प्राणान् श्रृणाति हिनस्ति’, जो शत्रु के समान प्राणों को कष्ट में डाले उसे अर्श कहते हैं। इस विग्रह में हि सार्थक शु धातु से अर्श शब्द की सिद्धि होती है। जिन्दगी को दूभर करने वाले इस रोग से ग्रसित व्यक्ति के कष्ट का वर्णन करना कठिन कार्य है।
यह एक अत्यंत कष्टप्रद रोग है। ‘अरिवत् प्राणान् श्रृणाति हिनस्ति’, जो शत्रु के समान प्राणों को कष्ट में डाले उसे अर्श कहते हैं। इस विग्रह में हि सार्थक शु धातु से अर्श शब्द की सिद्धि होती है। जिन्दगी को दूभर करने वाले इस रोग से ग्रसित व्यक्ति के कष्ट का वर्णन करना कठिन कार्य है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञानी स्थान संश्रय की दृष्टि से इसे बाह्य (External) और आभ्यन्तर (Internal) दो ही प्रकार का मानते हैं। किन्तु आयुर्वेद के प्राचीन आचार्य निदान, सम्प्राप्ति, लक्षण एवं चिकित्सा की भिन्नता के कारण इसे छः प्रकार का मानते हैं। कुछ व्यक्तियों में जन्म से ही अर्श की प्रवृत्ति पाई जाती है। इसका कारण गुदावली का निर्माण करने वाले गर्भोत्पादक बीज के एक देश (क्षेत्र) की विकृति को कहा जा सकता है।
मल द्वार के अन्दर तीन वलि (आवर्त) होते हैं। इनकी शिरायें जो श्लेष्मकला के भीतर रहती हैं प्रक्षुभित हो जाने से यह रोग होता है। गुदा की तीन वलियों में अर्श की स्थिति मानी गई है। बृहदान्त्र (Large Intestine) के अंतिम भाग को गुद (Rectum) कहते हैं। इसकी लम्बाई साढ़े चार अंगुल होती है। इसमें ऊपर से नीचे की ओर क्रमशः प्रवाहणी डेढ़ अंगुल, संवरणी एक अंगुल ये तीन वलियां होती हैं। पतली शिराओं (Veins) का एक जाल मलाशय को भीतर चारों ओर से घेरे रहता है। इन शिराओं में रक्त का संचय होकर फूलने से यह मस्से का रूप ले लेता है। मलाशय के दीवार की सिरायें लम्बाई में फैली रहती हैं। कब्ज से पीड़ित व्यक्ति शौच जाते वक्त शीघ्रता के लिये जब नीचे की ओर अधिक जोर लगाते हैं, तो इन शिराओं में खून उतर आता है। बार-बार यह प्रक्रिया जारी रहने पर उतरा हुआ रक्त वापस नहीं जा पाता। इस प्रकार दूषित रक्त के संचय होने से मांसांकुर या मस्से उत्पन्न हो जाते हैं। मलद्वार की तीनों वलियों में ये मस्से हो सकते हैं। अंतिम वलि संवरणी में होने वाले मस्से बाहर की ओर दो-तीन संख्याओं में या गुच्छे के रूप में बाहर निकल आते हैं, जो कि शौच जाते समय अत्यन्त कष्ट प्रदान करते हैं।
बवासीर के लक्षणः-
बवासीर के मस्सों के प्रदीप्त (Irritate) हो जाने पर शौच के वक्त अत्यंत कष्ट होता है। यहां तक कि बैठने में भी दर्द होता है। कभी-कभी तो शौच के समय 100 से 200 ग्राम तक रक्त निकल आता है। अधिक चलने से मस्सों में रगड़ होने से रक्त स्राव होने लगता है। रोग की तीव्र अवस्था में किसी भी समय रक्त स्राव हो सकता है। मस्सों में सूजन एवं जलन लगातार होती रहती है। वादी बवासीर में रक्त नहीं निकलता पर सूजन के कारण शौच के समय तथा अपान वायु निकलने में चलने-फिरने और बैठने में बहुत कष्ट होता है।
बवासीर के कारणः-
अनियमित रहन-सहन, कड़वा-कसैला, नमकीन खाना, चाय, काफी, मिर्च-मसाले युक्त बासी एवं गरिष्ठ भोजन, मद्यपान, अजीर्ण तथा कब्ज बने रहना, शौच के समय खूब जोर लगाना, काफी देर तक एक स्थान पर बैठे रहने का कार्य करना, दिन में सोना, वात-पित्त एवं कफ का कुपित होना आदि बवासीर के प्रमुख कारण हैं। महर्षि चरक ने गर्भपात, गर्भावस्था तथा विषम प्रसूती को भी बवासीर का कारण माना है क्योंकि इसमें भी गुदा की सिराओं पर दबाव पड़ता है। अधिक ठण्डे स्थान पर देर तक बैठे रहने से भी गुदा की सिराओं के संकुचित हो जाने से अर्श उत्पन्न हो जाता है। अत्यधिक शराब पीने से पित्त कुपित होकर अर्श की उत्पत्ति करता है।
बवासीर की साध्यता एवं असाध्यताः-
जो बवासीर अंतिम बाहरी वली (आवर्त) में होता है और एक वर्ष से अधिक समय का नहीं होता उसकी चिकित्सा साध्य होती है। दूसरे आवर्त में उत्पन्न मांसांकुर (अर्श) कष्ट साध्य होता है। जो बवासीर बहुत समय का हो, वात-पित्त एवं कफ तीनों दोषों के प्रकुपित होने से हो, एवं गुदा की भीतर की पहली प्रवाहणी वली में हो, वह प्रायः असाध्य होता है। अर्श की उचित चिकित्सा नहीं करने से निरंतर अहितकर आहार-विहार करते रहने से मलाशय (Rectum) शोथ (Inflamation) हो जाता है तथा फोड़ा, भगन्दर आदि महाकष्टकारी असाध्य रोग हो जाते हैं। अतः इसकी प्रारम्भ में ही उपेक्षा नहीं करनी चाहिये।
बवासीर की चिकित्साः-
इसकी चिकित्सा में विशेषकर यह ध्यान देना चाहिये कि रोगी को किसी भी प्रकार से कब्ज (Constipation) न हो। कब्ज दूर करने के लिये निम्न योगों का सेवन करना चाहिये।
- प्रातः सूखे आंवले का चूर्ण 2 ग्राम।
- दो प्रहर को ईसबगोल की भूसी 10 ग्राम की मात्रा में नींबू पानी के साथ।
- रात को सोते समय 10 ग्राम त्रिफला चूर्ण दूध के साथ लें। इसके अलावा 2 हरड़ भी पानी के साथ ले सकते हैं।
आयुर्वेदिक योगः-
- भोजन के बाद 2 चम्मच अभयारिष्ट समान जल से लें।
- काले तिल का चूर्ण व शुद्ध भिलावे का चूर्ण समान मात्रा में लेकर जल के साथ 2-3 बार पियें।
- बेल का मुरब्बा या कच्चे बेल को भून कर खायें।
- कोष्ठ शुद्धि के लिये एरण्ड का तेल (Caster Oil) पीना चाहिये। दर्द तथा जलन के स्थान पर भांग अथवा अफीम बांयनी चाहिये।
- करेले के रस में मिश्री मिलाकर पीने से बवासीर में लाभ होता है।
- चन्द्रशूर वटी सुबह-शाम एक-एक वटी दूध के साथ लें।
- कुमारी आसव दो चम्मच तथा दशमूलारिष्ट दो चम्मच मिलाकर समान जल से भोजन के बाद दिन में दो बार लें।
क्षार सूत्र चिकित्साः-
इस क्रिया में क्षार सूत्र द्वारा मस्सों को बांध देते हैं। सूत्र में लगे क्षार अपने औषधीय गुणों से मस्सों को काट देते हैं। मस्सों में अपामार्ग क्षार, उदुम्बर, स्नेहीक्षार नियमित रूप से लगाने पर मस्से सूख कर बाहर आ जाते हैं। बड़े मस्सों के लिये क्षार सूत्र का प्रयोग करते हैं। मजबूत धागे पर हल्दी, नीम एवं सूरई के दूध की क्रमशः 21 परतें चढ़ाकर सुखाने के बाद क्षार सूत्र तैयार होता है। क्षार सूत्र से मस्से को कसकर बांध दें जिससे बंधे स्थान पर मस्सा कट जाता है एवं घाव भी स्वतः ठीक हो जाता है। प्रत्येक सप्ताह क्षार सूत्र बदल दिया जाता है। क्षार सूत्र लगवाने के ढाई दो घन्टे बाद सामान्य रूप से कार्य किया जा सकता है। इस समय अशोभांजन वटी, शोभांजन वटी लें तथा मस्सों पर जात्यादि तेल लगाना चाहिये। हृदय रोग, मधुमेह, मोटापा, अल्सर और राजयक्ष्मा (T.B.) के रोगी को क्षार सूत्र नहीं लगाना चाहिये। सर्वप्रथम इन रोगों की चिकित्सा करनी चाहिये।
आधुनिक युग में कब्ज के लिये विरेचक (Purgative) औषधियों को देते हैं। शौच में कष्ट दूर करने के लिए कुछ मल्हम आदि का प्रयोग करते हैं। अगर रोग तीव्र हो तो मस्सों का Operation कर देने पर आरोग्य प्राप्त हो जाता है। पथ्य-परहेज भी पर्याप्त मात्रा में अपेक्षित है। एक बार Operation करने के बाद भी अगर रहन-सहन व खान-पान ठीक नहीं रखा गया तो इस कष्टकारी रोग से पुनः ग्रस्त होने की संभावना रहती है।
पथ्यः-
तुरई, लौकी, मूली, पपीता (कच्चा एवं पका), भिण्डी, पुराना चावल, मूंग की दाल, बथुवा, करैला, टमाटर, किशमिश, इलायची, मुनक्का, गोमूत्र, चोकरयुक्त आटे की रोटी अर्श रोग में हितकर होती है।
अपथ्यः-
खट्टा, मिर्च, मसाला, बासी एवं गरिष्ठ भोजन, उड़द, तले-भुने पदार्थ, बैंगन, अरबी, आलू, मल-मूत्र एवं अपान वायु को रोकना, दिन में सोना, अत्यधिक चलना-फिरना तथा कठोर परिश्रम करना वर्जित है।
















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