कैंसर और होम्योपैथी
- स्वास्थ्य/चिकित्सा
- August 20, 2026

एक तुम,मेरे प्राणों में क्या जगी,टूट गए अवरोध सारे। बह गया भेद मजधार और किनारों का,डूब गया अन्तर रोशनी के सैलाब में,सूरज और तारों का। आभासित होती रही बस तुम, केवल तुम!देह की सीमाएँ सब खो गयी,तुम से क्या मिली असीम हो गयी। मन की व्यथाएँ आनंद के पारावार मेंडूबने उतराने लगी,चारों तरफ तुम्हारी छवि
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किताबों के पन्नों में कविताएंजैसे दबा हो किताबों के बीच एक फूल,किसी के लिए नहीं उसकी सुगन्ध,उसके सौंदर्य का कोई अस्तित्व नहीं। चलो मैं तुम्हें दिखाऊं,यथार्थ की स्याही से, जीवन के पृष्ठ लिखीकुछ कविताएं, कुनबे के लिए सिकी रोटियों के ढेर के नीचे से,उचक-उचक कर झांक रही हैं कुछ कविताएं,कुछ कविताएं मैंने धान के साथ
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