शनिदेव – देवाधिदेव आदित्य व उनकी प्रेमिका छाया देवी के पुत्र हैं। पितृवर सूर्य ने अपने दुष्पाप कर्म को आवृत करने के लिए शनि को तीन गहन प्रगाढ़ आवरणों में आवृत करके क्रूरतापूर्वक दूरस्थ जल प्लावित निर्जन प्रदेश में प्रचालित कर दिया था। विधाता के भरोसे शनि जीवित तो रह गया लेकिन एक पैर से
शनिदेव – देवाधिदेव आदित्य व उनकी प्रेमिका छाया देवी के पुत्र हैं। पितृवर सूर्य ने अपने दुष्पाप कर्म को आवृत करने के लिए शनि को तीन गहन प्रगाढ़ आवरणों में आवृत करके क्रूरतापूर्वक दूरस्थ जल प्लावित निर्जन प्रदेश में प्रचालित कर दिया था। विधाता के भरोसे शनि जीवित तो रह गया लेकिन एक पैर से लंगड़ा हो गया और पंगु की तरह चलने-फिरने में असमर्थ हो गया, कुरूप तथा काला हो गया। तीन प्रगाढ़ आवरण शनि को आज तक ढके हुए हैं। जिन्हें लोग ‘वलय’ कहते हैं। इनकी मोटाई 40 मील, चौड़ाई बीस हजार मील बतायी जाती है। इन्हीं वलयों के कारण शनि उदास, निस्तेज व सुस्त दिखाई देते हैं।
पितृवर सूर्य का निर्मम व्यवहार देखकर शनि अतिशय क्रोधाग्नि में प्रज्वलित होकर विधर्मी हो गया। दूरस्थ प्रदेश से शनि की क्रूरदृष्टि जब सूर्य पर पड़ी तो पितृवर कोढ़ी हो गए और उनका सारथि अरुण पंगु हो गया। घोड़े अंधे हो गये। इस स्थिति को सांयकाल के समय देखा जा सकता है जब सूर्यदेव शनि की पश्चिम में अस्त होते हैं। यह सब पिता के प्रति शनि की प्रतिशोधवृत्ति के फलस्वरूप हुआ।

शनि के जन्म पर ग्रह स्थिति –
सौरराष्ट्रदेशाद्भव काश्यप गोत्रीय शनि ने कुम्भ लग्न में जन्म लिया था। वृषारूढ़ केतु और मंगल की संगति शनि के सर्वांग सुखों का अंत कर रहा था। मूढ़ेश शुक्र सूर्य के क्षेत्र में पूर्ण रूप से अस्त था। बुध, कर्क क्षेत्र में होकर शनि को सर्वदोषी व सर्व विरोधी बना रहा था। सूर्य व शुक्र भी सिंहस्थ होकर शनि के तन को कुरूप बनाने का कारण बने। सूर्य सप्तम भावस्थ होने के कारण शनि आजन्म निर्यली रहा और नपुंसक कहलाया। चन्द्र व्यय भाव में होने से और षष्ठ भाव पर पूर्ण दृष्टि होने से शनि शत्रुहंता कहलाया। बुध भी इसमें सहयोगी बना। बृहस्पति लग्न में होने से गुरु-चाण्डाल योग बना। इसी योग के कारण शनि को पिता द्वारा निर्वासन मिला। शनि का मातृभावेश शुक्र, सूर्य के प्रभाव से ग्रस्त होने के कारण माता जी भी शनि का पालन-पोषण न कर सकी और शनि के जन्म लेते ही उसे निर्जन निर्वासन मिला।
शनि की गति अतिमन्द है इसलिए उसे शनैश्चर नाम दिया गया। शनै: = धीरे-धीरे, चर = चलने वाला। शनि के कई अन्य नाम हैं- रविसुत, अर्कपुत्र, यम, अगू, सौरि, छायात्मज, असित, मंद, दैन्य, काल, कोण, नील, पंगु आदि। शनि के पिताश्री सूर्यदेव जितना मार्ग एक माह में चलते हैं शनि उतना मार्ग ढाई वर्ष में चल पाता है। जो मार्ग सूर्य एक वर्ष में पूरा करता है शनि उसे 30 वर्ष में पूरा करता है।
शनि का दूरस्थ निर्जन प्रदेश हमारी पृथ्वी से लगभग 1,272,400,000 कि०मी० दूर है तथा सूर्य से 90 करोड़ किमी० दूर है। शनि की आकृति का क्षेत्र 71,500 मील है। भचक्र में, शनि ग्रह को जिन राशियों का आधिपत्य मिला है वह 270 अंश से 330 अंश तक मकर और कुम्भ राशि का क्षेत्र है। यह क्षेत्र विषुवत रेखा से दक्षिण में 24 अंश से 20 अंश तक पृथ्वी तत्व का चर क्षेत्र मकर और 20 अंश से 12 अंश तक वायुतत्व का स्थिर क्षेत्र कुम्भ राशि में पड़ता है।
शनि भी पूर्व में उदय होकर पश्चिम में अस्त होता है। शनि अस्त होने के 38 दिन बाद उदय होता है। उदय 105 दिन बाद वक्री, वक्री के 135 दिन बाद मार्गी, मार्गी के 105 दिन बाद पश्चिम में अस्त होता है। यही शनि की गति और उदय अस्त का रहस्यात्मक तथ्य है। शनि की दैनिक गति 8 कला 5 विकला है अर्थात शनि अपनी धुरी पर एक चक्कर 10 घंटे 16 मिनट में पूरा करता है।
वणिक (शुक्र) की तुला राशि पर शनि को उच्च स्थान मिला है। सेनापति (मं०) की मेष राशि पर उसे नीचतम स्थान मिला है। शनि का मूल त्रिकोण कुंभ का 20 अंश है दीपांश 9 है। बुध व शुक्र, शनि के मित्र हैं, गुरु सम है, सूर्य, चन्द्र व मंगल, शनि के शत्रु हैं। शनि के नक्षत्र पुष्य, अनुराधा, उत्तराभाद्र प्रदा हैं। विंशोत्तरी महादशा में शनि के दशवर्ष 19 हैं। यह लगभग 30 वर्ष से 46 वर्ष तक की उम्र में अपना पूर्ण प्रभाव देता है। 8 की संख्यापर पूर्ण आधिपत्य रखता है। कुंडली में अपनी स्थिति से तीसरे-सातवे तथा दसवें स्थान पर पूर्ण दृष्टि डालता है। शनि की दृष्टि सदा निम्न होती है।
शनि ग्रह, शिशिर ऋतु, कृष्णपक्ष, संध्याकाल, शनिवार वक्रगति में पूर्ण बलवान रहता है। लोहा, शनि की धातु, कोयला, खनिज है। उड़द व तिल अन्न है। नीलमणि रत्न है। तेल द्रव्य है। भैंस, हाथी, कुत्ते पशु हैं। कौआ, कोयल पक्षी है। तिक्त (कषाय) रस है। प्रकृति गंभीर, वृत्ति कठोर, एकान्तप्रिय, व्यसनी, सेवक, संकोची स्वभाव का है।
शनि उच्चस्थ (तुला 20 अंश) होने पर जातक के भावानुसार उसे आकस्मिक लाभ दिलाता है। नीचस्थ (मेष 20 अंश) होने पर अपव्यय, मद्यपान, दुराचारी बनाकर उसी भाव का बिगाड़ हो जाता है। स्वगृही (मकर तथा कुंभ) होने पर पराक्रमी, क्रोधी एवं उग्र स्वाभावी बनाकर लाभान्वित करता है। मित्र क्षेत्री होने पर व्यय, पराक्रमी, कुटिल व दूरचरित्री बनाता है। शत्रुक्षेत्री होने पर अपव्यय निरर्थक, भ्रमी, दुःखी, दरिद्र, आलसी, घोर संकट देता है। शनि, वृष, तुला लग्न के जातकों को सदैव प्रश्रय देता है।
शनि की वृहत्कल्याणी (साढ़े साती) तथा लघु कल्याणी (ढैय्या) से सभी परिचित हैं। इसमें शनि की कृपा हो तो स्वगृहो के शुभफल अकेला ही देकर व्यक्ति को विश्ववन्द्य बना सकता है। कोपदृष्टि हो तो दुर्दिन दिखा सकता है। क्षय, शनि द्वारा प्रदत्त रोग है।
शनि मुक्ति मार्ग का प्रवर्तक है। वायु प्रधान शीतग्रह है। कष्ट निवारण के लिए शनि स्तोत्र, मंत्र, जप, दान आदि का विधान है। पंच धातु की मूर्ति मूरत बनवाकर गुग्गुल धूप, शुद्ध तिल का तेल का दीपक जलाकर शनिवार का व्रत रखकर तेल में तले पदार्थ वितरण करें। नीले वस्त्र दान, काले उड़द, लोहा दान करें। नीलम धारण करें। नीलम, तुला, कुम्भ राशि वालों का अत्यंत लाभप्रद, मकर, वृष को साधारण लाभप्रद किंतु कर्क, सिंह, वृश्चिक राशि वालों को कभी भी अच्छा नहीं होता। शनिमंत्र-
नीलांजनसमाभासं रविपुत्रंयमाग्रजं। छायामार्तण्ड सम्भूतं तन्नमामि शनैश्चरम्।।
क्रं ऐं ह्रीं श्रीं शनैश्चराय नमः। ऊं प्रां प्रीं प्रौं सः शनये नमः।।
















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