तिसाळि नदी
- कहानी मंच
- August 17, 2026
औंसि कि कालि रात वितद ही सुबेर कु सूरज फिर उगि औंद। वैकि सुनहरि किरण, हर एक क मुख पर एक चमक अर नयु उत्साह दे जौंद। तबि सब जीव फिर अपंण-अपंण काम पर जुटि जदीं। गौंकि बिन्द्रा कू जीवन बि अब तक, कै कालि रात से कम नि रै। माँ बाबु की इकलौति संतान
READ MOREअच्छी भली हंसती-खेलती गृहस्थी थी अनिल की। माँ, पत्नी, दो बच्चे- एक लड़की एक लड़का। माँ कभी उसके पास रहती, कभी बड़े बेटे के पास मुंबई और बीच-बीच में पहाड़ अपने गांव का चक्कर लगा जाती, वहाँ किसी को आधे पर खेत दिये थे, उनका हिसाब-हिताब देखने। स्वयं अनिल एवं प्राइवेट कम्पनी में नौकरी करता
READ MOREआज पंडित ब्रह्मानंद क चौक म तिरपाल छौ तड्यूं। द्वी चार कुर्सि अर कुछ चारपायूं म दरि बिछै कि बैठक सजई छै। बैठक म कुछ लोग, जौंमु मीं बि सामिल छौ, छ्वीयूंम मस्त छा। पंडित बह्म्रानंद क घर म आज देवि पाठ कु समापन छौ। पंडित सदानंद जी, पिछला पांच दिन बटी पाठ मा छा
READ MOREगौं कु हरि सिंह कति दिन से बीमार छौ। आज वेकि हालत कुछ जादा ही खराब छै। कुछ लोगु क नजर म त वू कुछ ही घड़ि कू मेहमान छौ। हरि सिंह वूं मनिख्यूं म गंणे जौद छौ, जौं से भाग्यविधाता सदनि कु रुठीं रै। द्वी ब्यौ करण पर बि वेतैं पारिवारिक सुख की प्राप्ति
READ MOREये वैज्ञानिक युग म भलै क्वी भाग्य तैं नि मानों पंणि मनिखि ही न, धरती कू हर जीव, भाग्य क हाथ कू एक खिलौना च। ‘तिसलि नदी’ नामक यीं कहानि म मेरू यी प्रयास रै कि मि भाग्य अर दुर्भाग्य कु असर मनिखि समाज क सामंणि प्रस्तुत कै सैकु। कहानि दयाराम क परिवार से जुड़ी
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