आज पंडित ब्रह्मानंद क चौक म तिरपाल छौ तड्यूं। द्वी चार कुर्सि अर कुछ चारपायूं म दरि बिछै कि बैठक सजई छै। बैठक म कुछ लोग, जौंमु मीं बि सामिल छौ, छ्वीयूंम मस्त छा। पंडित बह्म्रानंद क घर म आज देवि पाठ कु समापन छौ। पंडित सदानंद जी, पिछला पांच दिन बटी पाठ मा छा

आज पंडित ब्रह्मानंद क चौक म तिरपाल छौ तड्यूं। द्वी चार कुर्सि अर कुछ चारपायूं म दरि बिछै कि बैठक सजई छै। बैठक म कुछ लोग, जौंमु मीं बि सामिल छौ, छ्वीयूंम मस्त छा।
पंडित बह्म्रानंद क घर म आज देवि पाठ कु समापन छौ। पंडित सदानंद जी, पिछला पांच दिन बटी पाठ मा छा बठैय्ं । भितर पूजा हंणी छै अर चाकै मा छ्वीयु कि रंगत छै अईं। तबी भितर बटी पंडित सदानंद जी कू आदेश हवेगी, ‘लगुठ्या ल्हि आवा’।
लगुठ्या ‘शब्द मेरि समझ म नि ऐ। कोस-कोस पर पांणि अर वांणि म बदलाव ह्वे ही जाैंद। ये बदलाव क कारण मि पंडित जी कू मनतव्य नि समझि सैकु कि वूंन क्या मंगै? एक अध्यापक क नात मि कै तैं पूछि की अपंणी मूर्खता कू प्रमाण-पत्र बी नि दे सकदु छौ। चुपचाप रौ बैठ्यूं पंणि जिकुड़ि म उठा-पोड़ छै मचीं।
मेरि या उठा पोड़ तब शान्त होय जब एक आदिम, बुगठ्या की जूड़ि थांमि चौक म ऐगी अर फिर पंडित जी तैं पूछि, ‘पंडित जी, लगुठ्या ऐगी, कख बंधण वू? ‘अब मि समझि ग्यूं कि ‘बुगठ्या’ को ही नाम च ‘लगुठ्या’। अर पंडित जी की यी मांग छै। अब मन की उठा-पाडे़ शान्त हवेगी छै। पंडित जी क आदेशानसुार, एक खाश जगा पर ‘लगुठया’, बंधेगी अर भ्यंल कि द्वी हैरि फाैंगि, वेक समांणि वतेै बिळमाणा क डलगैी काल बि मनिखि तैं इनि बिळमै कि लिजाैंद।
भितर पूजा फिर शुरू ह्वेगी। पंडित जी को मंत्रोचारण भैर चौक म सुणेणू छौ। कुछ देर बाद वूंन ब्रह्मानंद तै भितर बुलै अर वूं तैं क्वी काम बतै कि फिर अपण काम पर लगिगीं। ब्रह्मानंद क परिवार कू सबी लोग एक क बाद एक चौक म जमां ह्वेगी। सदानंद जी पिठै की थालि अर जल पात्र ल्हेकि भैर ऐगी। सबतैं आचमन करैकि, रोलि कु तिलक करै, वूंतैं वी जगा मा बुलैगी जख देवि कू सुन्दर चक्र छा बण्यू। अलग-अलग रंगू म रंगी वा अल्पना सचमुच ही दिखण लैक छै। ‘लगुठ्या’ बी वखी लयेगी। अब सिर्फ गबरू की इंतजार छै। गबरू उर्फ गबर सिंह, ‘लगुठ्या’ की मौण उडांण म माहिर छौ। थमलि कि एक छपालक म लगुठ्या की मोंण दूर जैकि पड़दि छै।
गबरु कू बेसबरी से इंतजार छौ हूंणू। वेक बारा मा लोगु कु अलग-अलग बुलंणू छौ। कैन बोलि कि वु बाजार जौंद दिखे अर कैन वू गोरूम जाैंद देखि। ब्रह्मानंद










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