उगदु सूरज

उगदु सूरज

औंसि कि कालि रात वितद ही सुबेर कु सूरज फिर उगि औंद। वैकि सुनहरि किरण, हर एक क मुख पर एक चमक अर नयु उत्साह दे जौंद। तबि सब जीव फिर अपंण-अपंण काम पर जुटि जदीं। गौंकि बिन्द्रा कू जीवन बि अब तक, कै कालि रात से कम नि रै। माँ बाबु की इकलौति संतान

औंसि कि कालि रात वितद ही सुबेर कु सूरज फिर उगि औंद। वैकि सुनहरि किरण, हर एक क मुख पर एक चमक अर नयु उत्साह दे जौंद। तबि सब जीव फिर अपंण-अपंण काम पर जुटि जदीं।

गौंकि बिन्द्रा कू जीवन बि अब तक, कै कालि रात से कम नि रै। माँ बाबु की इकलौति संतान हूंण पर वा सुखि नि रै। वींकि आशा अर उम्मेद की सबि कुंगुलि कुंपुलि, बचपन म ही गरीबि कू निष्ठुर पतझड़ न झाड़ि दे छा। सोलह साल कि उमर म ही, वींक ब्वे-बाबु वींक असमर्थ हाथ मथुरा क हाथ म थमैं की यीं दुन्या से विदा ह्वेगीं। बीस इक्कीस साल कु मथुरा बी गरीब घर कू इकलौतु ही छौ। बिन्द्रा तै ससुराल म बी सुख नि मीलु। गरीबी कू कालू भूत वींक दगड़ि हि छौ हिटणू।

मथुरा क ब्यौ क कुछ ही साल बाद, बूढ़-बुढ्या लड़िक ब्वारि तै गरीबी क घनघोर अंध्यंर म छोड़ि स्वर्गवासी ह्वेगी। भगवान की कृपा से वूंकि घर गृहस्थि की गाड़ी, ठंडु, मठु गति से प्रेम की पटड़ि पर चलणी रै अर एक दिन बिन्द्रा की कोख भरे गी। गौं क जननू म त यांकि चर्चा ह्वेगी छै पंणि मथुरा तैं यी बात कू जरा बी ज्ञान नि छौ। नारि सुलभ लाज क कारण बिन्द्रान मथुरा तैं बि नि बतै।

एक दिन ग्राम प्रधान की मुलाकात अचानक ही मथुरा से ह्वेगी। ग्राम प्रधान मायाराम एक दयालु अर सज्जन व्यक्ति छौ। वूंन मथुरा म बोलि, ‘अरे बेटा, तेरि बोड़ि बुनी छै कि तेरि ब्वारि ‘दुवस्था’ च। बेटा ध्यान राखि देख-रेख करणू रै अर वूंतै भारि बोझ न उठौंण दे।’

प्रधान जी से या खुश खबरि सूंणी मथुरा त खुशि म झुमण लगिगी। वेबरि वेकि हालत वे भूख भिखारि सि छै जैतैं अचानक सून कि डैलि मिलिगी ह्वा।

शाम क समैं खौंणु खांण क बाद, मौका देखिं मथुरा हंसद-हंसद बिंद्रा पूछि दे, अरे आजकल, सरिगौं क जननू म, यी चर्चा च कि बिंद्रा कू बाल-बच्चा हुंणु वलु च, क्या या बात सच च?’ प्रधान जी क घर पौंछिगे।

मथुरा द्वारा प्रधान जी से रामा-रूमी करण पर, प्रधान जी न मथुरा म बोलि, ‘मथुरा, भोल बटी, ग्रामीण विकास योजना क अनुसार, गौं क बाट बणौंण कु काम च शुरू हूंणू। गौं वळूं कुंणि द्वी पैसा कमौंण कू यु सुंदर मौका च। तेरि गौं होव त तू बी काम पर ऐजै। अरे हां, ब्वारिन त्वेमु कुछ हां ना बि बोलि?’

‘हां बोड़ा जी वा तैयार च। तुमरि दया ह्वे जालि त हम बि द्वी रोटि चैन से खै ल्यूला। प्रधान जी कू आभार जतौंद मथुरा न बोली। मथुरा जब घर पौंछ त वेकि मुखड़ि पर रंगत छै अई।

मुल्ल-मुल्ल मुलकद बिंद्रा न मथुरा पूछि दे, बड़ा खुश नजर औंणै छौ, इनुं क्या दे दे प्रधान जीन?

बिंद्रा कू हाथ अपंण हाथ म ल्हींद मथुरा न बोलि, बिंद्रा मितैं कुछ इनुं सि लगंणू कि हमरू मेहमान क्वी अवतार ल्हेकि औंणू।’

‘इनु क्या चमत्कार दिखे, जरा मीं बि त सूंणू।’ बिंद्रा कू यु प्रश्न छौ।

मथुरा न अपंणि खुशि झलकौंद बोलि, ‘अरे-भागवान? यु पूछ कि वूंन क्या चमत्कार नि दिखै। जु भिखारि एक-एक कौड़ि कू तरसुंणू छौ वे तै एक अशर्फि मिलण पर क्या दशा होलि? भोल बटि ही गौं म, गौंवळूं तैं रोजगार च मिलंणू जैंमु मजदूरि बि अच्छि खाशि च।

बिंद्रा न मुस्कौंद बोलि, ‘यु त भौत सुंदर ह्वेगी। घर म ही काम मिलिगी। भैर जौंण कि बी जरूरत नी च। हां, मेर बारा म क्या बोलि वूंन?’ ‘अरे, तेरु काम बि बंणिगी। हमरु औंणु वलु मेहमान न औंणु से पैलि ही अफु कू सबि सुविधा जुटै दीन।’ मथुरा न हंसद हंसद बोली।

दुसर दिन बटी द्वी अपंण-अपंण काम पर जुटि गीं। अब वूंतैं मनिखि जीवन कू अनुभव सि छौ हूंण। पेट कि समस्या हल हूंण क दगड़ी ही खुशी भविष्य कि झलक झलकिंणी छै।

नयु मेहमान क औंण कु दिन बि ऐगेत। रात कु तिसुरु पहर रै होलु तबि बिंद्रा तै प्रसव पीड़ा शुरू ह्वेगी मथुरा तै बिजालिक वीन बोलि, पेट म पीड़ा सि उठंणी।

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