नेताजी
- कविता/ग़ज़ल
- August 14, 2026
किताबों के पन्नों में कविताएंजैसे दबा हो किताबों के बीच एक फूल,किसी के लिए नहीं उसकी सुगन्ध,उसके सौंदर्य का कोई अस्तित्व नहीं। चलो मैं तुम्हें दिखाऊं,यथार्थ की स्याही से, जीवन के पृष्ठ लिखीकुछ कविताएं, कुनबे के लिए सिकी रोटियों के ढेर के नीचे से,उचक-उचक कर झांक रही हैं कुछ कविताएं,कुछ कविताएं मैंने धान के साथ
READ MOREकहीं थू-थू की रैली है, कहीं धिक्कार की रैली,कहीं त्रिशूल दिखाते हैं, कहीं तलवार की रैली।सियासत में प्रदूषण है, विचार गंगा ही मैली है,चलो पटना में पिटने को वहां लाठी की रैली है। क्या पता क्या रूप देते हैं वे इस रैली की शैली को,कोई जूतामार रैली हो या खुली कीचड़ की थैली हो।कब सुधरेंगे
READ MOREकिताबों के पन्नों में कविताएंजैसे दबा हो किताबों के बीच एक फूल,किसी के लिए नहीं उसकी सुगन्ध,उसके सौंदर्य का कोई अस्तित्व नहीं।चलो मैं तुम्हें दिखाऊं,यथार्थ की स्याही से, जीवन के पृष्ठ लिखीकुछ कविताएं,कुनबे के लिए सिकी रोटियों के ढेर के नीचे से,उचक-उचक कर झांक रही हैं कुछ कविताएं,कुछ कविताएं मैंने धान के साथ ओखली में
READ MOREलक्ष्मीदत्त नौटियाल , भिवाड़ी (राजस्थान)जात-पात में मत पड़ो, वर्ण भेद भेद दो,मनुष्य मात्र एक हो, न किसी में कोई भेद हो।जाति-धर्म भिन्न-भिन्न खान-पान भिन्न-भिन्न।भिन्नता में एकता, हो कर्म में भारतीयता।राम-रहीम एक हैं, स्वरूप उनका एक हैधर्म भले ही भिन्न हो, हो कर्म में भारतीयता।चाहे राम को भजो, या रहीम से करो दुआ,इबादत का तौर भिन्न,
READ MOREअनपढ़ गंवार थे वो सन्त कबीराजो कहे माया बड़ी ठगनि हम जानीदौलत तेरी बस एक लंगोटी अरे फकीरा,देखा तूने बन्द कमरों में हीरे मोतियों का जखीरा,देखी तूने कभी बेशकीमती बी.एम.डब्लू गाड़ी,जिसमें शान से बैठे हों धनपति राजा कलमाड़ी,झूठ, फरेब, ठगी से इतनी माया जोड़ी,शपथ बद्धता हमने कब तोड़ी,शपथ तो हमनें यह थी खाई,वक्त मिला है
READ MOREजब चुनाव की हूण बैठी ग्ये बात,फुलण बैठी सब्बी पार्टि्यूं क खुला हाथ।सब्बी भाग-भागिक नि थकणा छन,अपण-अपण दांव लगाणा छन। छ्वीट जात्यिूं कु त वो ह्वे गै भगवान,अर गरीब थै भी अपण बताणा छन।पोरु साल ‘जल प्रलय’ माँ जो ह्वे छौ उजाड़-बिजाड़,बौगिगी छुट्टिगीं गांव, गुठ्यार, सब्यूं मां टूटी दुख कु पहाड़। नेतोंन हैलीकॉप्टर मां रेस
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