अच्छी भली हंसती-खेलती गृहस्थी थी अनिल की। माँ, पत्नी, दो बच्चे- एक लड़की एक लड़का। माँ कभी उसके पास रहती, कभी बड़े बेटे के पास मुंबई और बीच-बीच में पहाड़ अपने गांव का चक्कर लगा जाती, वहाँ किसी को आधे पर खेत दिये थे, उनका हिसाब-हिताब देखने। स्वयं अनिल एवं प्राइवेट कम्पनी में नौकरी करता
अच्छी भली हंसती-खेलती गृहस्थी थी अनिल की। माँ, पत्नी, दो बच्चे- एक लड़की एक लड़का। माँ कभी उसके पास रहती, कभी बड़े बेटे के पास मुंबई और बीच-बीच में पहाड़ अपने गांव का चक्कर लगा जाती, वहाँ किसी को आधे पर खेत दिये थे, उनका हिसाब-हिताब देखने। स्वयं अनिल एवं प्राइवेट कम्पनी में नौकरी करता था। वेतन बहुत ज्यादा तो न था, पर गुजारा मजे में हो रहा था। सबसे बढ़कर यह कि उसका परिवार एक आदर्श परिवार था। किसी भी तरह के झगड़े से दूर एकदम शान्त और सुखी। यही वजह थी कि आस-पड़ोस के घरों में उनका घर एक मिसाल था। किन्तु एक रात अचानक उस घर को किसी की नजर लग गयी और रात का खाना खाते-खाते हृदयगति रुक जाने से अनिल का देहान्त हो गया। देखते ही देखते पूरे मोहल्ले में यह दुःख का समाचार फैल गया और लोगों की विक्षुब्ध भीड़ आकर जमा हो गयी।
माँ फूट-फूटकर रोये जा रही थी और पत्नी मालती प्रस्तर बनी एक कोने में बैठी न जाने कहां ताक रही थी। यह देखकर चिंतित स्त्रियों ने उसकी सास से कहा- ‘इस तरह मालती अपना दिमागी संतुलन खो बैठेगी, अतः उसे रुलाने की कोशिश कीजिये।’ लेकिन सास से कुछ करते नहीं बना। ईश्वर ने जिसका सब कुछ छीन लिया हो, उसे कोई रुलाये भी तो किस तरह। अंततः पति की अर्थी उठने के साथ मालती चीखकर रोई तो सास ने ठंडी सांस ली। बच्चों के सिर से पिता का साया उठना था, उठ गया, माँ का तो बरकरार रहे।
रिश्तेदारों के आने का सिलसिला शुरू हुआ और वे अपनी-अपनी दुश्चिंताएं प्रकट करने लगे। उनकी चिन्ताएं स्वाभाविक थीं, क्योंकि मालती इतनी पढ़ी-लिखी नहीं थी कि नौकरी कर सके। फिर वह इतनी सीधी थी कि दुनिया का कोई भी छल-कपट समझ नहीं पाती थी। वह तो कभी घर से अकेली निकली भी नहीं थी। इसके बावजूद अगर अनिल की सरकारी नौकरी होती तो मालती को कुछ न कुछ काम मिल ही जाता। काम नहीं तो पेंशन मिलती किन्तु यहां तो कोई उम्मीद नहीं। ज्यादा से ज्यादा दो लाख का फंड मिलेगा। इतने कम पैसे में इतनी सारी जिन्दगियां कैसे गुजरेंगी।
मालती को कुछ सुझाई नहीं दे रहा था। वह मूरत बनी सुनती रही लेकिन सास हर आने वाले रिश्तेदार से पूछती- ‘‘अब हम क्या करें ? कहां जायें ? मैं इन सबको गांव ले जाकर गुजर- बसर करती, पर इन कोमल बच्चों से वहां कैसे रहा रहा जायेगा और ब्वारी (बहू) पहाड़ के कठिन काम कैसे कर सकेगी ?’’
रिश्तेदार उसे ढांढस बंधाते- ‘‘हमारे होते आप क्यों चिन्ता करती हैं ? हम मदद करेंगे इनकी, आखिर अपने होते ही किसलिये हैं। सही बात गांव जाने की तो ये वहां जायेंगे क्यों ? अगर ये वहां जाकर रहते हैं तो लानत है हम सब पर….।’’
यों सास को अपने बड़े बेटे से बहुत आस थी। वह भले ही रिटायर्ड था पर मुंबई में काफी बड़ा मकान था उसका। पैसे की कोई कमी नहीं थी। उसका इकलौता बेटा मद्रास में अच्छी नौकरी पर था और बहू भी। अवसर मिलते ही उसने बेटे से कहा- ‘‘बेटा! तुम्हारे छोटे भाई के बच्चों का यहां फजीता हो जायेगा। क्यों न तुम इन्हें अपने साथ मुंबई ले जाओ।’’
बेटे ने कहा- ‘‘ले जायेंगे मां…। इन्हें ही नहीं हम तुम्हें भी अपने साथ ले चलेंगे।’’
बहू ने भी दिलासा दिया- ‘‘मां जी! आप जरा भी चिन्ता मत कीजिये। हम वहां पहुंचते ही एक कमरा खाली कर देंगे और आप सबको बुला लेंगे।’’
‘‘कब ?’’ सास ने पूछा तो बहू ने जवाब दिया- ‘‘हम मुंबई पहुंचते ही एक-दो दिन में फोन करेंगे।’’
सास आश्वस्त हुई और मालती भी। उसे याद आया वह जब भी अपनी जेठानी के पास गई, उन्होंने उसे खूब प्यार दिया। वे हमेशा कहती थी कि अनिल की नौकरी यहां होती तो सब साथ रहकर घर को गुलजार करते वरना तो यह काटने को दौड़ता है। तब न सही पर विपत्ति की इस घड़ी में जेठ-जेठानी अवश्य उन्हें लिवा ले जायेंगे। मालती को पूरी उम्मीद थी।
दिल्ली से मालती का बड़ा भाई आया तो उसने भी उससे धैर्य रखने के लिए कहा। उसे याद दिलाया कि कैसे हम तीनों भाई-बहन हमेशा एक-दूसरे के नजदीक रहे हैं और हमने कभी एक दूसरे को गैर नहीं समझा। उसने तो दिलासा भी दी कि यदि मालती मुंबई नहीं जाना चाहती तो उसके साथ दिल्ली चले। वहां कोई काम भी ढूंढा जा सकता है। यह सुनकर सास ने कहा- ‘‘हां बेटा! यही ठीक रहेगा। तुम इन्हें अपने साथ दिल्ली ले जाओ और कोई काम दिला देना तो मैं भी बेफिकर होकर गांव चली जाऊंगी।’’
मालती के भाई ने कहा- ‘‘आप गांव में अकेली क्यों रहेंगी मां जी! आप भी साथ चलियेगा। मैं दिल्ली पहुंचते ही कुछ करूंगा और फोन से बताऊंगा।’’
मालती को संबल मिला। भाई का घर उसके लिये बेगाना नहीं है। फिर वहां अपने वृद्ध माता-पिता भी हैं। मुंबई के मुकाबले दिल्ली ठीक रहेगा। मालती की छोटी बहन आई तो सास ने उससे विनती की- ‘‘बेटी! तुम खुद ही टीचर हो। अगर इन दोनों में से किसी एक को घुघुती का घोंसलाहिन्दी कहानी अपने साथ रखकर पढ़ा लेती तो, बड़ी मेहरबानी होती।’’
बहन ने कहा- ‘‘मांजी! मैं खुद यही सोच रही थी कि शिवानी को अपने साथ ले जाऊं। मैं जाते ही अपने विद्यालय में बात करूंगी।’’
सास की चिन्ता कुछ कम हुई। इसी तरह सगे-रिश्तेदार मिल-बांट कर मदद कर दें तो इनका बेड़ा पार लग जायेगा। यही सोच कर उसने अपनी बेटी से भी किसी एक बच्चे को अपने साथ रखकर पढ़ाने की बात कही तो उधर से भी सकारात्मक जवाब मिला। तेरहवीं की रस्म के बाद आने वाले चले गये, तो सास ने कहा- ‘‘मेरी चिन्ता दूर हुई बहू! मैंने इसीलिये सभी सगे-रिश्तेदारों से बात की कि तू जहां चाहे जा कर रहने का फैसला कर ले। चाहे अपने भाई के घर या जेठानी के। चाहे छोटी बहन के पास शिवानी को पढ़ने भेज दे या ननद के पास अंकुश को। अब देखना जल्द ही सबके फोन आने शुरू हो जायेंगे।’
उसने सिर हिलाकर हामी भरी।
एक शाम के समय मालती ने देखा कि शिवानी रिमोट हाथ में लिये दूरदर्शन के चैनल बदल-बदल कर देख रही है। अचानक जाने क्या देखकर वह जोर से हंसी तो मालती के तन-बदन में आग लग गयी। उसने उसी समय केबल का तार हटाकर काट दिया और गुस्से से बोली- ‘‘इस तरह क्या खिलखिला रही हो? तुम्हें पता होना चाहिये कि अब पहले वाला समय नहीं रहा, बहुत बदल गया है और इस बात को तुम्हें अभी इसी वक्त से समझना होगा…..।’’
पहली बार मां का यह रूप देखर शिवानी सन्न रह गई और वहां से हट गयी। थोड़ी देर बाद मालती ने शिवानी को रोते हुए देखा तो उसे चुप कराने लगी। शिवानी सिसकते हुए कहा- ‘‘मां! पापा की बहुत याद आ रही है।’’ ‘‘आ रही है ना..!’’ मालती ने दुःख से कहा- ‘‘यही तो मैं चाहती हूं कि तुम्हें पापा की याद आये और तुम देखी होओ। तभी तो जानोगी कि हमारा समय किस तरह बदल गया है। अब हम वह नहीं रहे जो पहले थे- निश्चिंत, सुखी और भाग्यशाली…।’’ कहते-कहते वह रोने लगी। यह देख कर शिवानी मां के आंसू पोंछते हुए बोली- ‘‘रोइ मत मां… मैं खूब मन लगा कर पढ़ूंगी और बड़ी होकर नौकरी करूंगी। फिर हमें कोई दुःख नहीं होगा मां….!’’
मालती ने शिवानी को सीने से लगा लिया। उसने महसूस किया कि बारह वर्षीया शिवानी के रूप में अनिल उसके समीप है।
एक माह बीत गया। सास ने मालती से कहा- ‘‘ब्वारी! अभी तक किसी का फोन नहीं आया। न हो तुम्हें बात कर लो ताकि उस हिसाब से तैयारी की जाये।’’
वह कुछ कहती उससे पहले ही शिवानी बोल पड़ी- ‘‘दादी! अब किसी का फोन नहीं आयेगा। जिसे सचमुच हमारी देखभाल करनी होती वह अब तक खुद आ जाता।’’
दादी ने आश्चर्य से कहा- ‘‘ब्वारी! यह क्या कह रही है। मैं समझ नहीं पाई।’’
मालती बोली- मांजी! यह कह रही है कि हम पर कोई हाथ नहीं रखेगा। हमें अपनी मदद खुद करनी होगी।’’
सास ने कहा- ‘‘यह कैसे मुमकिन है। मुसीबत में नाक लम्बी नहीं रखते बेटा……..! तुम्हें किसी न किसी से आसरे की भीख मांगनी ही पड़ेगी।’’
मालती ने जवाब दिया- ‘‘मुझे भीख मांगने की जरूरत नहीं है मांजी! मैंने अपने घर जाने का फैसला कर लिया है।’’
‘‘अपने घर ? कौन सा घर ?’’ सास ने पूछा।
‘‘वही जो आपका है। हम सब आपके साथ गांव चलेंगे। अपने खेत खुद संभालेंगे। गाय पालेंगे और दोनों बच्चों को वहीं पढ़ायेंगे।’’
मालती की बात सुनकर सास ने हैरानी से पूछा- ‘‘तुम सब वहां इतनी तकलीफों में रह सकोगे ?’’
‘‘दादी! जैसा भी होगा वह घर हमारा होगा। किसी ताई, मामी, बुआ या मौसी का नहीं……।’’ शिवानी ने कहा तो वृद्धा ने उसे गले से लगाकर बोली- ‘‘मेरे बेटे ने घुघुती का घोंसला (घुघुती चिड़िया सिर्फ दो-तीन डंडियों को जोड़कर कच्चा-सा कामचलाऊ घोंसला बनाने के लिए प्रसिद्ध है) बनाया था पर मेरी बहू ने अपनी समझदारी से उसे पुख्ता बनाने का इंतजाम कर लिया है।









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