ये वैज्ञानिक युग म भलै क्वी भाग्य तैं नि मानों पंणि मनिखि ही न, धरती कू हर जीव, भाग्य क हाथ कू एक खिलौना च। ‘तिसलि नदी’ नामक यीं कहानि म मेरू यी प्रयास रै कि मि भाग्य अर दुर्भाग्य कु असर मनिखि समाज क सामंणि प्रस्तुत कै सैकु। कहानि दयाराम क परिवार से जुड़ी

ये वैज्ञानिक युग म भलै क्वी भाग्य तैं नि मानों पंणि मनिखि ही न, धरती कू हर जीव, भाग्य क हाथ कू एक खिलौना च।
‘तिसलि नदी’ नामक यीं कहानि म मेरू यी प्रयास रै कि मि भाग्य अर दुर्भाग्य कु असर मनिखि समाज क सामंणि प्रस्तुत कै सैकु। कहानि दयाराम क परिवार से जुड़ी च।
गौं म दयाराम को एक सुखी परिवार छौ। सीमित परिवार क कारण क्वी आर्थिक झंझट नि छै। कुन बी वू पैत्रिक धन कू धनी छौ। परिवार म सबसे बड़ी नौनी, ‘ममता’ कू ब्यौ ह्वेगी छौ। वा अपंण ससुरास छै। वींकि पीठि क सुरेश अर महेश द्वी भाई छा। बड़ु भाई सुरेश, दिल्ली की एक प्राइवेट कम्पनी म लग्यूं छौ। इण्टर पास कैकी महेश बी गढ़वाल राइफल म भर्ति ह्वे की रुड़कि चलिगे छौ। घर म दया राम, वेकि घरवलि गंगा अर सुरेश की ब्वारी पूजा, तीन ही प्रांणि छा।
कारगिल म दुश्मन जरा जरा कै अपुंणु दबाव बढ़ौणूं छौ। ये कारण वख गढ़वाल राइफल की एक कम्पनि तैनात ह्वेगी। महेश वी कम्पनि म ही छौ। अपण ब्यौ म वू वख बटि ही एक मैना की छुट्टि म घौर अयूं छौ। वेक ब्यौ हुयां अबि एक हप्ता बि नि ह्वे छौ कि कारगिल म लड़ै छिड़गी। छुट्टि पर जयां सबि सैनिक वापिस बुलये गींन। महेश बी, जैक हाथ की हल्दि बी नि मिटी छै, कारगिल पौंछिगी। नई-नई ब्योलि सरिता न त वेकी सूरत बी ढंग से नि देखी छै।
मनिखि न शास्त्र पुराण सबि पढिन पंणि भाग्य कैन नि पढ़ि सैकु। महेश क भाग्य म क्या लिख्यूं कैतैं पता नि छौ। वु खुद नि जणदु छौ कि वेकु भाग्य वेक दगड़ इनु खिलवाड़ कैरलू अर वख जौंद ही वु शहीद ह्वे जौलु। महेश त दुन्या छोड़ी ही चलिगे छौ, अब यु एक आम प्रश्न छौ कि सरिता कू क्या होलु। वा अपुणु बोझ सी जीवन कैक सार काटली? दयाराम क दुखी परिवार म हाहाकार मच्यूं छौ। गौं म बी भारि शोक छौ छयूं।
दीपा, सरिता तैं कुछ धैर्य दींदी, यां से पैलि ही सरिता न दीपा पूछि दे, ‘दीदी, आजकल दीपक क्या च करणू। कखि वे कि नौकरि लगि बि च?’
दीपक शब्द क उच्चारण मात्र से सरिता कू सुख्यूं मुख पर रौनक ऐगी छै। दीपा वींक भाव तै समझंणी छै। वीन सरिता म बोली, ‘दीपक तै सरकरि नौकरि पर लग्या चार मैना ह्वेगी, तनख्वा बि अच्छि च, पंणि ब्यो क नाम से भौत चिढ़णू। डेड मैना कि छुट्टि पर घौर ही च अयूं। बाबा जी बच्यां हूंद त जोर जबरदस्ति करद बी, चचा जी त अपुण फर्ज ही निभौणै छिन।’
दीपक क बारा म, इनुं निराशाजनक शब्द सूंणि की सरिता और दुखी ह्वेगी। अब वा इनुं बि सुचंणी छै कि मेर कारण ही त दीपक ब्यौ नि करंणू या कखि विधाता कू ही हम द्वियूं कु रिसता नि ह्वा मंजूर कर्यूं? निथर वेकु ब्यौ नि करण कू और क्या कारण ह्वे सकद?
कुछ देर तक बात करंण क बाद द्वी काम पर लगिगी अर रूम्क पड़न से पैलि घास ल्हे कि घर पौछि गैं। सरिता क मन म अब दीपक ही बस्यूं छौ। वींकी रातू की नींद उड़िगी छै। ‘वु ब्यौं किलै नि करणू, यु सवाल सौंण कि कुयेड़ि सि वींकि जिकुड़ि म छौ लौकुंणू।
कैक बारा म क्वी कतुकु दुखी रौंद, यी अपणत्व की एक पछ्यांण च। यूं कारणो से दुखी सरिता न दीपक से मिलंण कू अंतिम फैसला करिदे। वा वेकी मन की सुंणन अर अपंण मन की सुणौण चौंदी छै। या वींकी प्रवल इच्छा छै। सच्ची चाह तै राह बी मिलि ही जौंद। बाजार जईं सरिता तै एक दिन दीपक मिलि ही गे। यी आकस्मिक मुलाकात से द्वियूंक मुख पर एक हल्कि सि मुस्कराट छै।
दीपक न प्यार क अंदाज म सरिता कू हाथ थाम अर समंणि ही चाय की दुकान म ल्हीगे। चाय समोसा कू आदेश दे की वू सरिता क काख पर ही बैठिगी ताकि बार-बार वींकु मधुर स्पर्श हूंणू रौ। वे तैं सरिता क साथ हुई दुर्घटना कू पुरु ज्ञान छौ। पंणि अपंणि थीं सुखद मुलाकात की मीठी याद तैं वु खटास म नि बदलुंणू चौंणू छौ। दुकानदार, चाय-समोसा धैरिक चलिगी।
सरिता, ज्वा कुछ देर कू अपुंणु दुख भूलिगी छै। चुटकि ल्हींद बोली, ‘दीपक, सरिता, दीपक क दगड़ कर्यूं वादा तैं जल्दि ही पूरू करंण कि कोशिश म छै। भाग्य, परिस्थित्यूं तैं अपंण अनूकूल बंणै दीद। सरिता, एक दिन, अपंणि सासु, गंगा कू मुंडु छै बधंणी। तबि सरिता की रीति हथेल्यूं पर गंगा की नजर पड़िगी। माँ कि ममता उमिड़िगी। अब वींक आँसु म आँसु किगाड़ छै बगंणी। दुखी मन से सरिता न बोलि, ‘मांजी, तुम किलै छौ दुखी हूंणैं। तुमरु सारु त पक्कू च, एक छोड़ि द्वि द्वि सारू छिन। रूंणु त मेर भाग्य म च लिख्यूं, जैं तैं क्वी बि सारू नजर नि औंणू। न मैत न ससुरास। इनुं आंसु धोलिकि मेरि रईं सईं कमर तैं न तोड़ा।’
गंगा पढ़ी-लिखी त नि छै पंणि बात कि गैराई तै खूब समझदी छै। सरिता कु दुख वीन अपंुणु दुख बंणै दे छौ। सरिता क इनूं वचन सूंणि वीन बोलि, ‘बेटी मेर दिलक घाव म तु इनूं लूंण न लगौ। तेरू दुख हमरू ही दुख च। हम तेर तै भाग्य से लड़ि त निसकद पंणि इनु राय दे सकदौ जैसे तु अपुंणु भलु-बुरु सोचि कि सुखी जीवन बितै सैकि अर हम बि तेरि खुशि म शामिल ह्वे सकौं?’
अपणि सासू क यूं बचनूं तै सूंणि की सरिता क दुखि मन तै थोड़ा भौत चैन कू आभास ह्वे। वीन अपंणि योजना तैं सफल हूंद देखिकी तुरंत ही दीपक तक खबर देदे अर तय दिन पर देवी क मंदिर म बुलै दे।
शाम कू समै छौ। भोजन करण क बाद, दयाराम तिवरि म हुक्का, गुड़गुड़ौंणू छौ, सुरेश कि ब्वारि ‘पूजा’ सींण कि तैयरि करणी छै। तबि सरिता न, दीपक क बार म सब कुछ बतै दे। गंगा दीपक क पूर परिवार से परिचित छै। ये कारण वींतै सरिता की योजना पसंद ऐगी, दयाराम न बी विरोध नि कै। तय दिन पर सरिता, गंगा अर दयाराम मंदिर पौंछिगी। कुछ देर म दीपक बी अपंणि माँ ल्हेकि ऐगी। द्वी पक्षु म रामारूमी क बाद, दीपक अर सरिता तैं अपंणि आशीर्वाद दे की, सरिता कू हाथ दीपक तै थमैं दे।
सुख-दुःख क जाल म पोड़िक मनिखि उनिं ढले जौंद जनुं वेकु रौंणु-सैंणु रौंद। शंकुर बोडा तैं भूखु रौंण कि आदत सि पड़िगी छै ये कारण भूख रौंणु वूं कुंणि क्वी खाश परेशनि नि छै। कबि कबार क्वी काम मिल जौंदु छौ त, द्वी-चार पेसौं क दर्शन ह्वे जौंद छा अर बोडा क चुल्लु तैं आग की गर्मी कू बी अनुभव ह्वे जौंद छौ।
आज शंकुर बोडा तैं मेहनत मजदूरि की पगार मिली छै। ये कारण बाप- बेटा द्वी खैपी की सींण कि तैयारि म छा। पेट म द्वी रोटि जौंण से कुछ शान्ति छै मिली। ना समझ शनि तै अपंण बाबु कि दुख तखलीफ कु कुछ ज्ञान नि छौ। जैकू पेट भर्यूं रौंद वु भूख से अपरिचित ही रौंद। बाप-बेटा टुटीं सि खटोलि म पडिकी नींद की इंतजार छा करणै। एकाएक शनि न शंकुर बोडा पूछि दे, ‘बाबा जी, गुर्ख्यणि कि कथा तुमतैं बि च याद?’ परसि सदा ददा, न कथा सुणौंण कु वादा कै छौ पणि कै काम से वू कखि भैर चलिगी। बाबा जी, तुमी सुंणै द्या वी कथा तैं।
शंकुरु बोड़ा कु आज पेट भर्यू छौ, उकताहट क कारण नींद बि नि छै औंणी। गुरुख्यों पर रोष दिखौंद वूंन बोलि, ‘अरे नाम न ले तौंकु। वूंक अत्याचार सूंणिकि आज बि डौर लगद। तेरु सदा ददा व सुंणी सुणैंई कथा ही सुणौंदु पंणि मेर ददा न त वु अत्याचार अपंण समंणि च दिख्यूं। जब कबि वू यी कथा सुणौंद छा त कति जननु क आंखु ऐ जौंद छा। कति मर्द गुस्सा म अंपण दांत खूट बुखौंण लगद छा। तेरि जिद च त सूंणि ले कथा, पंणि बीच म ही से नि जै।
बोडा न कथा शुरू करद बोलि, ‘तेर बूढ़ ददा बतौंद छा कि द्वी सौ साल पैली, नैपाल राजा कू सेनापति अमर सिंह थापा न गढ़वाल पर चढ़ाई कै छै। बेबरि नेपाल म गोरखा जाति कू राज छौ। अमर सिंह थापा न अपुंणु दगड्या चौतरिया की मदद से गढ़वाल म जु अत्याचार अर मारकाट मचै, वा आज बि हर एक गढ़वलि क मुख पर ‘गुरख्यणि’ नाम से लिहे जौंद। मेरु दादा बतौंदु छौ कि गुरख्यों न नादान बच्चा काटि दीं। पकीं खड़ि फसल उजाड़ दे। जननू क दगड़ बी बुरु व्यवहार करैगे। जौं लोगुम रुप्या पैंसा छा वूंन वू सुरक्षित भांडुद धैरि की खडारि दीं वूंकि या सोच छई कि अगर बच्यां रै जौला त फिर काम आल। कति घर बौड़ नि ह्वे सैक वूंक खडर्यूं धन तनि रैगी या कै दुसर क हाथ लगिगी।’
अपंण बाबा तैं बीच म रोकि की शनि न पूछ,- ‘बाबा जी, हमर गौं म बि रै होला कैमु इतना रुप्या?’ ‘हां बेटा हां, मेर ददा जी वूंकु नाम ल्हेकि बुलद छा कि,









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