होम्योपैथिक दवा के “साइड इफेक्ट”

मैं अक्सर सुनता हूं अपने Clinic में आये हुए रोगी से “डाक्टर साहब यह दवा यदि फायदा नहीं करती है तो नुकसान भी नहीं करेगी।” मैं तो समझा नहीं सकता इसलिए इस विषय पर लेख लिखने का निश्चय किया। यह साइड इफेक्ट नहीं करती, ऐसा कहकर कोई भी होम्योपैथिक Medicine नहीं दे सकता। पहले तो

मैं अक्सर सुनता हूं अपने Clinic में आये हुए रोगी से “डाक्टर साहब यह दवा यदि फायदा नहीं करती है तो नुकसान भी नहीं करेगी।” मैं तो समझा नहीं सकता इसलिए इस विषय पर लेख लिखने का निश्चय किया।

यह साइड इफेक्ट नहीं करती, ऐसा कहकर कोई भी होम्योपैथिक Medicine नहीं दे सकता। पहले तो यह मीठी दवा है, कहकर उपहास होता था। यह छोटी-छोटी गोलियां क्या करती होंगी, कुछ नहीं। मैं इसका उल्लेख पूर्व के लेख में कर चुका हूं। परन्तु अब लोगों को मालूम है इसमें भी Bitter Taste की दवा होती है। अब एक प्रचलन जैसा होता जा रहा है कि कुछ किताबें पढ़ी और दवा देनी शुरू हो गयी। यह शौक के तहत भी है और कुछ झांसा देकर। पढ़ाई नहीं की पर साहबजादे ने पुड़िया देना शुरू कर दिया। पहले शुरू में धर्मार्थ जैसा और फिर पैसों के लिए।

स्पष्ट बता देना चाहता हूं कि Homeopathic Medicine देने का अधिकार सिर्फ योग्य प्रशिक्षित होम्योपैथिक चिकित्सक को ही है। यह कैसे हो सकता है जो दवा फायदा करती है वह नुकसान नहीं करती? दवा नुकसान करती है यदि असैद्धान्तिक दी जाय। चिकित्सक का उद्देश्य Cure the Patient, क्योर कैसा होना चाहिए Rapid Gentle and Permanent। होम्योपैथिक दवा एक स्वस्थ व्यक्ति पर Prove की जाती है। फिर इसकी Reproving होती है। इसके पश्चात Clinical Test किया जाता है। एक होम्योपैथ M.B.B.S. की तरह सारे विषय पढ़ता है, अन्तर सिर्फ मेटेरिया मेडिका में होता है। होम्योपैथी कैसे आई। डॉ० हैनिमैन क्यूलेन मेटेरिया मेडिका का अनुवाद कर रहे थे तो पाया कि ‘सिनकोना’ को लेने पर सिनकोना के लक्षण उत्पन्न होते हैं। फिर हैनिमैन ने उसे अपने ऊपर सिद्ध किया। इस तरह से होम्योपैथी का जन्म हुआ। फिर आप कैसे कह सकते हैं कि इसके साइड इफेक्ट नहीं होते। जो कहता है वह वास्तव में होम्योपैथी को नहीं जानता। अक्सर हमारे पास अप्रशिक्षित से दवा लेकर, जटिलता को बढ़कर आयेंगे और योग्य प्रशिक्षित होम्योपैथ से चमत्कार चाहेंगे। आधुनिक चिकित्सा में साल-साल भर दवा खायेंगे और यहां आयेंगे तो चमत्कार की अपेक्षा से।

यह साइड इफेक्ट नहीं करती। यह कहकर धोखा देकर कोई भी यह दवा नहीं दे सकता। हैनिमैन के साथ-साथ डा० केन्ट, डा० बोरिक, किसी ने भी यह नहीं कहा कि इसके साइड इफेक्ट नहीं होते। यह कुछ लोगों द्वारा मनगढ़ंत प्रचारित किया गया है। विशेष रूप से उनका जो होम्योपैथ नहीं हैं, न ही कोई प्रशिक्षण लिया है पर होम्योपैथिक दवा दे रहे हैं। मैं आपको बता दूं यह चिकित्सा पद्धति यानी एक होम्योपैथ डाक्टर की पढ़ाई Regular होती है Private नहीं। उत्तर प्रदेश में 1982 से डिप्लोमा की शिक्षा बन्द कर डिग्री का कोर्स प्रारम्भ हुआ। यह C.P.M.T. (Combined Pre Medical Test) के तहत होता है। अब B.H.M.S. की डिग्री मिलती है। जिसका पूरा नाम है ‘बैचलर आफ होम्योपैथिक मेडिसिन एण्ड सर्जरी’। यह M.B.B.S. के बराबर साढ़े पांच साल का कोर्स है।

चूंकि यह मेडिसिन डायनेमिक है, इसलिए यह गहराई तक प्रवेश करती है जो समूल नष्ट करती है रोग का। तो क्या यह असैद्धान्तिक होने पर नुकसान नहीं करेगी। अवश्य करेगी यदि मैं यह कहूं कि इसका साइड इफेक्ट आधुनिक चिकित्सा पद्धति से कहीं ज्यादा है तो गलत नहीं है।

हम खुद अपेक्षा करते हैं कि कोई दूसरा हमसे अच्छा व्यवहार करे। इसके लिए हमको भी अच्छा व्यवहार करना होगा। अतः होम्योपैथिक क्यों नहीं चाहेगी। जिसको मेडिसिन देने का अधिकार नहीं था वह होम्योपैथिक मेडिसिन दे रहा है। ये भी बहुत बड़े पद पर हैं जो झोला छाप की छवि को जानते हैं जो पेपर, मैगजीन को पढ़ते हैं, जो प्रशासन का कार्य करते हैं, उनके मुख से भी मैंने सुना है। उन्हें डाक्टर कहते हुए जो योग्यता की वकालत में नगण्य हैं। क्या कहें उन्हें, क्या कहें नीतियों को, क्या कहें भ्रष्टाचारी व्यवस्था को। हंसी आती है खूब, पर यह प्रचलन जैसा है। हमारे देश की हालत पर दुःख नहीं होता हो तो क्यों? आधार क्या हो नैतिकता या भ्रष्टाचार।

सरकारी नौकरी में हैं पर साहब डाक्टर बन गये। स्कूटर या गाड़ी पर लाल प्लस का चिन्ह लगा है। वाह रे! यहां का समाज। जो सिद्धान्त का समर्थन करता है, यही झोलाछाप को आंखों पर बिठाता है। यह कैसी निर्जीव सभ्यता फल-फूल रही है। इस समाज में किससे क्या कहें? रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की यह कविता मुझे अक्सर याद आती है :-

बेचैन हैं हवाएं सब ओर बेकली है

कोई नहीं बताता किश्ती किधर चली है

मंझधार है भंवर है या पास है किनारा

यह नारा आ रहा था या सौभाग्य का सितारा

फिर उस पढ़ाई का क्या अर्थ जहां प्रशिक्षण होता, योग्यता को जांचा जाती है। अस्तित्वहीन विचारधारा न कभी जीता है न जीतेगी। मैं केवल अधिकार की बात कर सकता हूं अंकुश तो प्रशासन को लगाना है। उपेक्षा यदा-कदा नहीं हर पल होम्योपैथिक की होती है। अर्द्ध सरकारी तंत्र में Homeopathic Panel का न होना। यदि कहीं है भी तो योगदान सिर्फ 5 प्रतिशत का। यह समूल रोग को नष्ट करती है, रोगी को निर्णय नहीं दिया जाता। सब पैथी में Limitation है तो होम्योपैथी की फिर क्यों उपेक्षा की जाती है।

सरकार की मोनोपोली ने कई पैथियों को कुचल दिया है। अक्सर मैंने देखा है कि कुछ लोग वास्तविकता में न जाकर एक ताना-बाना बुनते हैं क्योंकि उनकी चाटुकारिता संकीर्ण विचारधारा की पैरवी भी है। एक सज्जन मेरे पास आये और भ्रष्टाचार की वकालत में बोले कि जो लेता है उसकी आवश्यकता है और जो देता है भ्रष्टाचारी यह है। क्या उसने खुश होकर दिये। क्या धर्म में किसी को जीवन देना पाप है। क्या उसने कितनों के सपने नहीं यथार्थ भी छीने होंगे। फिर गलत कौन है। वास्तविकता यह है कि भ्रष्ट दोनों हैं,जो ले रहा है और जो दे रहा है।

अक्सर सुनता हूँ कि जिनके पास योग्यता नहीं है पर दवा दे रहे हैं। Management पता नहीं पर सलाह बता रहे हैं। Disease पता नहीं Cure का दावा कर रहे हैं। मैं ऐसे लोगों को जानता हूँ जिन्हें झोलाछाप कहूँ तो कोई बुराई नहीं होगी। यदि आप जागरूक कहलाना उचित समझते हैं तो सरकार से पूछिये उन लोगों की गाड़ियों पर लाल प्लस का चिन्ह क्यों होता है जो डाक्टर नहीं हैं। वह दवा क्यों देता है जो डाक्टर नहीं है। वह है तो किसी पैथी का, पर दवा देता है दूसरी पैथी की।

हमेशा Unqualified Medicine को Aggregate करता है। पैदा करता है जटिलता को जो Chormic को और भी Chronic करता है। Physoilogical Action पता नहीं उस दवा का, पर दे रहे हैं यह कहकर कि इसके साइड इफेक्ट नहीं होते हैं। मैं उन्हें चेतावनी देता हूँ। वह ऐसा न करें, नहीं तो वह भी कटघरे में खड़े किये जा सकते हैं। जो चाहते हैं मैं दिखाऊँ कि इसमें साइड इफेक्ट होता है तो दोस्तों में सिद्ध कर सकता हूँ।

B.H.H.M.S. मात्र अब होम्योपैथिक की डिग्री है और होम्योपैथी की दवा प्रशिक्षित चिकित्सक के अलावा किसी को भी नहीं। वैसे मैं कुछ सुझाव दे रहा हूँ। कक्षा दस पास कर, Homeopathic Doctor बना दे क्योंकि मेडिकल कॉलेज में पढ़ाना बेकार है। क्योंकि होम्योपैथिक मेडिसिन से जब झोलाछाप छेड़छाड़ करेगा, उसका चक्कर खत्म। साहब जनतंत्र है, आजाद कर दे। निगरानी का चक्कर खत्म।

हम चाहते हैं हमारा अधिकार, सहभागिता, समानता एवं योग्यता, जो होम्योपैथी को सशक्त बना सके। होम्योपैथी सस्ती होकर भी उपेक्षित है, सक्षम होकर भी दिशाहीन है। न प्रोत्साहन, न संदर्भ है। होम्योपैथी का भविष्य कैसा होगा आने वाला वक्त बतायेगा। परन्तु आज इसकी दशा देखकर रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की यह पंक्तियां मुझे याद आती हैं।

धुंधली हुई दिशायें छाने लगा कुहासा

कुचली हुई शिखा से आने लगा धुआं सा

कोई मुझे बता दे क्या आज हो रहा है

मुंह को छिपा तिमिर में क्यों तेज रो रहा है

मैं जानता हूँ कि होम्योपैथी कहाँ खड़ी है। इस विश्वास के साथ जीतना हूँ। कल यह अवश्य जीतेगी जब सभी की जुबान पर होगी। यह परिवर्तन नहीं वास्तविकता की आहट है। इस कल में होम्योपैथी सज रही है। आज से, अभी से—इस संदर्भ में मैंने इस पंक्ति में अपने द्वारा कुछ कहना चाहा है—

तड़बर की तरह अभिलाषा है

पीले पत्ते मायूस जिन्दगी के पल

टूटी टहनियाँ, टूटी आकांक्षायें नहीं

छोटी-छोटी कोपलें, नये आशा के कल।

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