परपंच

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परपंच महिमा अपार च, परपंच एक खास किस्मौ भौत ही पुरणौ कला कौल च, परपंच अणप्पा मा एक शास्त्र च जैकू ज्ञान सरया दुनिया मा सबि जग्गा एक जन्न फूलौ फूलौ, कांक्डू क्वक्डू, कब्बि मी कुणी मा कब्बि बी पुंगड़ी मा, कब्बि ये छाल कब्बि वै छाल, कब्बि ये मुल्क ता कब्बि हैका मुल्क ता

परपंच महिमा अपार च, परपंच एक खास किस्मौ भौत ही पुरणौ कला कौल च, परपंच अणप्पा मा एक शास्त्र च जैकू ज्ञान सरया दुनिया मा सबि जग्गा एक जन्न फूलौ फूलौ, कांक्डू क्वक्डू, कब्बि मी कुणी मा कब्बि बी पुंगड़ी मा, कब्बि ये छाल कब्बि वै छाल, कब्बि ये मुल्क ता कब्बि हैका मुल्क ता कब्बि म्यार दवार मा ता कब्बि आफ़क चौंक-संगेड़ी मा। कुल मिलैकी परपंच विधा आदम सम्भ्यती विकासक जलम भट्टेय आज तलक लगातार फळीं फुळीं च अर परपंची आज बी ठाट कन्ना छिन्न। परपंच विधा जन्क याँनी जलम दाता कूँ छाई, यी कला कूँ जलम कब अर कक्कू भट्टेय काई ठीक-ठीक ता नी बुलौय जा सकदू पर हां या बात सोला अन्ना च अर यामा कूँई लुक्याण छुप्याण वैली बात भी नी च की बिना ‘परपंच महिमा’ का बखान अर वर्णन यी दुनीयाक कै बी कालखण्ड मा कै बी कुणी कुम्बीर कूँ सामाजिक-साहित्यिक अर राजनीतिक इतिहासक जात्रा पूरी नी व्हैय सकदी। यी कली वृत्तांत महाभारत से लेकि रामायण अवेस्ता-ए-जेंद अर कुरान सच्ची जग्गा मा कै ना कै रूप मा मिलै ही जालू अर आज त यी विधा का ज्ञाता और जगरूढ़ लोग घर-इस्कूल-दफ्तर, अस्पताल अर जिंदगी का हर कुणा मा अड़ौ यी कला कौशल कू प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप मा प्रदर्शन करद खिदे जा सकदी।

अन्जाळी जीवन मा परपंच ही ‘ब्रह्मास्त्र’ च पर वे ब्रह्मास्त्र थेय चलाणु हर कै आदिम या मनखी बैसे बात नी च, यांक वास्ता मनखी धैय बूत अर छल शास्त्र मा आचार्या हुंण जरूरी हूंद बिना शूद अर छल शास्त्र ब्यौत मनखी परपंच शास्त्र कू ज्ञाता कब्बी व्हैय ही नी सकदू। अगर परपंच कू ज्ञाता/जगणूरू अन्वेखी परपंचक कू इस्तेमाल करण जगडू का त भै रे परपंच थेय तुम ब्रह्मास्त्र से कम विनाशकारी-विध्वंसकारी अर अशांणुणी नि समझयाँ अर दुश्मनों जैड़ टक्क लैगैंक भौरयी समझयाँ।

परपंच थेय अलग-अलग किस्मी लोग अलग-अलग नी से जगद्दिन अर अपड़ी सुदिवौ हिसाब से वैकू इस्तेमाल करदीं। कुछ लोग परपंच थेय तेज दिमागे धांण बोलिद्न त कुछ लोग खाली शैतानी ख्याली उमाल। कुछ भला लोग परपंच थेय यी कला कौकु धैय परपंच बोलणु अप्डू अर अप्डा परिवार कि मर्यादौ घौर उलंघन अर अपमान समन्दी। उनका हिसाब से परपंच परपंच नि च माथा या लीला च।

ना भै या बात हज्मन नि हुंण च यत वी बात ख्वाई ‘तुम करिला ता रासलीला अर हम करला ता कामक्रीड़ा’।

अब द्वापर मा ही देखि ल्यावा परपंच का एक से एक ज्ञाता मिली जाला। लोग बोलिद्न सब गन्धार नरेश शकुनि यी विधा का अस्सल ज्ञाता जगणूरू छाई पर भै लगौ क्या व अर गिच्चा बुबा क्या जोड़ लोग ता इन् बी बोलिद्न कि यी विधा कू अस्सल सल्ली अर जलम दाता एक सुदर्शन चक्रवारी छाई। देखे जाव कम ता धृतराष्ट्र और वेका नीना दुर्योधन-दुशासन बी नि छाई। लोग त बोलिद्न कि साब् कीरव पैदौ ही परपंच से हुई और आख़िर समय तक छल-परपंची चाट पर ही हिटणा रैन। ख़ैर उन्कू क्या उनका ता नाम ही दुर्योधन अर दुशासन छाई उन्कूँ त परपंच फर जलम सिद्ध अधिकार छाई।

परपंचै डिमाण्ड महाभारत मा बरोबर बढ़णी राई और इना बढ़ ग्याइ कि एक दा ता भगवान जी धेय अप्डू पांचजन्य बजाण पोड़ी ग्याई वी भी ठीक वै टैम फर जब धर्मराज ‘अश्वत्थामा हतो हतः’ बोलिक ‘नरो वा कुञ्जरो वा’ बोलण वलु छाई। अब साब् आप बोलिला कि याँम क्या परपंच य ता प्रभु कि माथा छाई। अग्जी आब कैंकि माया अर कैंकि धाया? बजाण वला कु क्या गांई पर बिचारा आचार्य द्रोण जू सभी अस्त्र-शस्त्र अर शास्त्र का ज्ञाता छाई प्रभु कि यी ‘माया’ का एैंधिर धन्चू बाण चुलींक लम्परार ढेय गैं कि ना?

अब साब् जब बात आचार्य द्रोण फ़र आ ही ग्याई त एकीख्यूं बुरु भी क्लिैं करण वे बिचर धेय जी किलै बिसराणा जैल सरया महाभारत मा कैकु बुरु नी कारु कैकु बुरु नि स्यचू। इतिहास मा एकलव्य आचार्य कि विशेष कुप/माया/लीला से एक गुढ़ भन्त् शिष्य त बणी ग्याई पर बड़ू धनुर्धारी नि बण सकूँ किलैकि गुरुजील गुरुदक्षिणा मा वैकु धैय हथुकू गूँठा मांगिक लछ्यी/लुछी याई। किलै भै? आख़िर क्या दोष छाई वै नौना कू? क्यी भील या जंगली कू नौनु हुंणू ही वेकु अपराध छाई? अग्जी नौनु समर्पित छाई वेमा भी लछ्य थेय धैरेणा कि और दुनियाँ सबसे बड़ू धनुर्धारी बणणौ तू सच्ची गुण छाई जु अर्जुन या कर्म मा छाई त फिर आखिर कमी क्क्कड़ रे यै होळी?

अग्जी साब् एकलव्य थेय परपंच शास्त्र कु ज्ञान नि छाई अगर हून्द त उतरी दा पढ़म बोलिद्—गुरु जी आपकी सौ-करार आप जप्यौ, मिल गुरु भक्त बणणा बाण बणणू बाण नि थामु छाई बल्कि एक श्रेष्ठ धनुर्धारी बणण बाण धाम छाई, मिथ्य माफ़ करयाँ म कैंकि सौ करार का वास्ता अप्डू ‘गूँठा’ भी ना दमूँ। पर निर्भगी एकलव्य का जोग मा सैद यी लिख्यूं राई। एकबार वेकू ‘गूँठा’ गाई ता सब कुछ गई?

आज कुई नि जणदू कि ‘गूँठा’ दिणा बाद एकलव्य क्या दशा व्हैय होळि, वै फ़र क्या बीती होळि?

महाभारत मा परपंची ब्रह्मास्त्र कू इस्तेमाल शुरू भर्टेय आखिर तक्लक हुंण ही राई, शकुनी का पासी की रगड़ अर सुदर्शन की छत्र छाया मा सरया कुरु वंश हलैय ग्याइ, फूँके ग्याई अर देखा चूल तक हिली ग्याई छाई। जू परपंच शास्त्र की जानकारी रखदा वला थू कुरू वंश का नाश मा परपंचै मेहरबानी थैय नी बिसिर सकदा।

अगर ठीक से देख्ये जाव ता परपंच कू ये खेल कौरवी अर पण्डणों का जलम से भौत पैळी महाराज शान्तनुक भरात्र, सत्यवती का बुढल शुरू कैर याल छाई, सत्यवती बुबा कूँ ता कुइ नी गाई पर भुगताण वाइ गंगा पुत्र भीष्म थैय। जैकु राजपाट त गाई गाई अर अपणौ रैण बाड़ अलग से अर वेका बाद भी आखिर मा क्या हस्त लग ‘सर सैया’ माने की बाणौ कूँ दीशाण। बिचारा देखता समान भीष्म पितामह बी परपंची पीड़ा से नी बच सका, सरया महाभारत मा पीड़ा थेय सद सब चुल्लै ज्याला उन्न ही ब्याइ। उन्न परपंचे पीड़ा एण्डौल बी कम नी भोगी, सरय महाभारत दुर्योधन अपडा भै-बंधो दगड़ियौ मदद से उथ्येष बणत-बणत परपंची झ्याल-फाँगो मा मला-दिश उन्दू-उन्बू चुल्यु-चुलाणु राई अर बिचारा पण्डौ थेय आखिर मा क्या मिल, परपंच पीड़ा भ्यान्द-भ्यान्त बिचारा आखिर मा स्वर्गवासी वै गई।

साब मांग ता परपंचै त्रेतायुग मा भी कम नी छाई परपंची लौंगैळ कैकयी जन्नी वीरांगना-पतिव्रता रानी थेय नी छवाडू, वा कैकयी ज्या देवासुर संग्राम से लैकी हर सुख-सुख मा राजा दशरथै दगड्या सैन्दूझ्या बणी राई मददगार बणी राई वा बी झट्ट परपंचै चपेट मा आ ग्याई, फिर क्या याई या बात जग जाहिर च बिचरा रामचंद्र जी अर सीता माता धैय लक्ष्मण दगड़ी चौदह बरस तक डांढौबूं-कांठौबूं मा भटकण पाई अर भुगताण पाड़ वैका बाद सीता हरण की पीड़ा अर फिर धरमयुद्ध लंकापति रावण दगड़ी। द्विचारा राम जी बी नी बस साका यी परपंची पीड़ा से, क्या दिन नी दाख्यूं यूँ परपंचकूँ का ख़्वार, छीर हम खैर भी क्या सकड़ौ, आखिर वत प्रभु की माया च।

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