काम, क्रोध और लोभ को मनुष्य के विनाश का प्रमुख कारण माना जाता है और कहा जाता है कि जो व्यक्ति इन तीनों पर विजय प्राप्त कर लेता है वह देवताओं की श्रेणी में गिना जाता है। लेकिन आज के इस युग में तो इन तीनों का ही बोलबाला है। बड़े अचरज व दुःख की

काम, क्रोध और लोभ को मनुष्य के विनाश का प्रमुख कारण माना जाता है और कहा जाता है कि जो व्यक्ति इन तीनों पर विजय प्राप्त कर लेता है वह देवताओं की श्रेणी में गिना जाता है। लेकिन आज के इस युग में तो इन तीनों का ही बोलबाला है। बड़े अचरज व दुःख की बात है कि हमारे राज्य देवभूमि उत्तराखण्ड में भी भोगवाद की प्रवृत्ति तेजी से घर करती जा रही है, जिसके परिणामस्वरूप लोक संस्कृति का ह्रास हो रहा है।
करोड़ों वर्ष पूर्व जब यह संसार गहरे समुद्र के अन्दर छिपा था तो किसी अदृश्य शक्ति के कारण जो भाग समुद्र से ऊपर उभरकर आया वह हिमालय का नवीन ऊँचा भू-भाग था। इसका ऋग्वैदिक नाम हिमवन्त, आर्यावर्त, केदारखण्ड एवं वर्तमान नाम गढ़वाल है। इन्हीं पर्वत शिखरों पर आदि मानव, वनस्पति, चर-अचर, जीव-जन्तु उत्पन्न हुए। क्योंकि विश्व की सर्वाधिक ऊँची चोटियाँ 20 हजार फुट से 25 हजार फुट तक इसी उत्तराखण्ड हिमालय में फैली हैं। चारों वेदों की रचना यहीं पर हुई। अष्टादश पुराणों की रचना वेदव्यास ने यहीं पर की। लेकिन समाज में अचानक आई भोगवादी प्रवृत्ति ने यहाँ के जनजीवन को परम्परागत लोक संस्कृति से दूर करने का कार्य किया। यह प्रवृत्ति लगभग पिछले दो-तीन दशकों में आए पीढ़ियों के अन्तराल और लोक संस्कृतियों के प्रति यहाँ के समाज की उदासीनता का परिणाम कही जा सकती है।
इस दौरान एक ओर तो हमारा समाज आर्थिक सम्पन्नता की सीढ़ियों पर चढ़ता हुआ पहाड़ को पैरों की बेड़ी दिखाने लगा तो वहीं दूसरी ओर एक ऐसी पीढ़ी तैयार हुई, जो मैदानों में पलने-बढ़ने के कारण यहाँ की संस्कृति को सहज ग्राह्य नहीं कर पाई। हालाँकि इसके लिए पीढ़ी को ही दोषी ठहराना उचित नहीं होगा, परन्तु इतना अवश्य कहा जा सकता है कि समाज में जो परिवर्तन आया उसका प्रभाव नई पीढ़ी पर और कुमाऊँ संस्कृति पर पड़ा। शिक्षा के स्तर में सुधार से जहाँ जागृति आई तो वहीं खेती-बाड़ी को गौण समझकर पलायन में अप्रत्याशित बढ़ोत्तरी हुई। महिलाओं को कृषि संबंधित व्यवसायों से जोड़ने की योजनाओं के अभाव के कारण खेत-खलिहान शून्य ही रहे हैं।
अब जबकि उत्तराखण्ड को अस्तित्व में आये दो दशक का समय बीत चुका है, ऐसे में संस्कृति संरक्षण को मात्र सरकार के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता, और न ही कैसेट, स्टेज कार्यक्रमों और दूरदर्शन पर प्रसारित होते विकृत गीत-नृत्यों को ही लोक संस्कृति कहा जा सकता है। हम सभी को भोगवादी प्रवृत्ति को त्यागकर संयमित रूप से प्रयास करना होगा, क्योंकि समाज में दिन-प्रतिदिन बढ़ती भोगवादी प्रवृत्ति पर अंकुश लगाये बिना लोक संस्कृति को ह्रास से नहीं बचाया जा सकता।










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