किताबों के पन्नों में कविताएंजैसे दबा हो किताबों के बीच एक फूल,किसी के लिए नहीं उसकी सुगन्ध,उसके सौंदर्य का कोई अस्तित्व नहीं।चलो मैं तुम्हें दिखाऊं,यथार्थ की स्याही से, जीवन के पृष्ठ लिखीकुछ कविताएं,कुनबे के लिए सिकी रोटियों के ढेर के नीचे से,उचक-उचक कर झांक रही हैं कुछ कविताएं,कुछ कविताएं मैंने धान के साथ ओखली में

किताबों के पन्नों में कविताएं
जैसे दबा हो किताबों के बीच एक फूल,
किसी के लिए नहीं उसकी सुगन्ध,
उसके सौंदर्य का कोई अस्तित्व नहीं।
चलो मैं तुम्हें दिखाऊं,
यथार्थ की स्याही से, जीवन के पृष्ठ लिखी
कुछ कविताएं,
कुनबे के लिए सिकी रोटियों के ढेर के नीचे से,
उचक-उचक कर झांक रही हैं कुछ कविताएं,
कुछ कविताएं मैंने धान के साथ ओखली में कूट डाली हैं।
कुछ कविताएं,
साल भर के गेहूं और चावल की बोरियों के साथ संभाली हैं।
छोड़ आई हूं कुछ कविताएं खेतों में गिरी गेहूं की बालियों में।
खिली हैं कुछ कविताएं आंगन में रोपे गुलाब की डालियों में।
और कुछ कविताएं मेरे साथ चल रही हैं,
मेरे आंगन में बचपन से पल रही हैं,
जब आंगन बुहारती हूं तो पीछे-पीछे चली आती हैं।
तुम्हारी कविताओं ने तो दर्द दूर से देखे हैं,
मेरी कविताओं ने तो दर्द सहे हैं,
जो हर पल मेरे और तुम्हारे साथ रहे हैं।
मेरी कविता घास के गट्ठर में बंधकर पली,
बर्तनों के साथ रगड़-रगड़ कर मंजी,
कर्कश सींको वाली झाड़ू के साथ फर्श पर
कस-कस कर धुली,
चूल्हे की सुलगती आग में जली,
और निवाला बनकर मेरी कविताएं ही
तुम्हारे उदर में पहुंची,
फिर तुम्हारे प्राणों से कविता बनकर फूटी।
जहां देखो वहां मेरी कविताएं बिखरी पड़ी हैं।
और तुम्हारे छन्दों में जो भी स्पन्दन है,
जानते हो, वो मेरे ही प्राण हैं,
तुम्हारा कविता लिखना भी
मेरे ही कवि होने का प्रमाण हैं।
Leave a Comment
Your email address will not be published. Required fields are marked with *