आज के इस यान्त्रिकी युग में जहां मनुष्य श्रम से कतराने लगा है तथा नियम संयम की सीमाओं का अतिक्रमण करने लगा है एवं विलासिता के गर्त में काफी डूब चुका है वहीं उपरोक्त रोग मधुमेह, जिसे आधुनिक चिकित्सा शास्त्री क्पइमजमे डमससपजने नामक रोग से पुकारते है, अत्यधिक मात्रा में भारत में भी पाया जाने
आज के इस यान्त्रिकी युग में जहां मनुष्य श्रम से कतराने लगा है तथा नियम संयम की सीमाओं का अतिक्रमण करने लगा है एवं विलासिता के गर्त में काफी डूब चुका है वहीं उपरोक्त रोग मधुमेह, जिसे आधुनिक चिकित्सा शास्त्री क्पइमजमे डमससपजने नामक रोग से पुकारते है, अत्यधिक मात्रा में भारत में भी पाया जाने लगा है। आयुर्वेद इसे प्रमेह याने क्पइमजमे प्देपचपकने रोग की द्वितीय अवस्था मानते है।
संसार की आद्य पैथी आयुर्वेद के महान भिषग चरक ने अपने महान ग्रन्थ चरक संहिता के चिकित्सा सू0 7 में निम्न कारण प्रमेह के बताये हैं-
‘‘अस्या सुखं स्वप्न सुखं दधीनी ग्राम्यौदकानूपरसा पंयासी नवान्न पान गुडवे कृतं व प्रमेह हेतु कफ कृच्च सर्वम्’’
याने गुदगुदे बिस्तर पर आराम से पडे़ रहना, सुख पूर्वक अधिक सोना, दही का सेवन, बकरा मछली आदि के मांस का अधिक सेवन, नया अन्न, नये वर्षा जल का सेवन, गुड या शर्करा से बने पदार्थो का सेवन तथा अन्य सम्पूर्ण कफ बर्द्धक पदार्थो का सेवन प्रमेह के कारण होते है। अत्यधिक या बार-बार और प्रायः गंदले मूत्र का त्याग ही प्रमेह कहलाता है। बात, पित्त एवं कफ भेद से प्रमेह 20 (बीस) प्रकार का होता है। इन बीस प्रकार के प्रमेहांे में कफ जन्य दस प्रमेह, साध्य, पित्त जन्य छः प्रमेह याप्य तथा बात जन्य चार प्रमेह असाध्य होते हैं। इन्हीं चार प्रमेहां में वसामेह, मज्जामेह, हस्तिमेह व चौथा मधुमेह होता है। चरक ने मधुमेह, सुश्रुत ने क्षोद्रमेह, वाग्भट्ट ने मधुमेह तथा माधव ने भी प्रमेह की इस असाध्य चौथी अवस्था को मधुमेह ही माना है।
मधुमेह में रोगी के मूत्र के साथ ओज धातु का भी क्षरण होता है। इसी कारण कुछ लोंग इसे ;।सइनउपदनतपंद्ध भी मानते है इस रोग में निकलने वाला ओज मधुरस्वभाव का होता है इसी लोभ के कारण रोगी के मूत्र में चीटियां लगने लगती है। मूत्र की चमबपपिबहतंअपजलद्ध 1015 से 1025 तक होती है लेकिन मधुमेह में यह बढ़कर 1030 से भी अधिक हो जाती है। रक्त में शर्करा की मात्रा को उचित स्तर में रखने के लिये ब्ंतइवीलकतंजम डंजंइवसपेउद्ध की विकृति नहीं होनी चाहिये। शर्करा रक्त में गुर्दो द्वारा छनकर मूत्र में आती है। जब तक रक्त में 1.8 से कम शर्करा रहती है तब तक गुर्दे उसे नहीं छानतें। इसी अवस्था को बृकदेहली मर्यादा कहते है। जब शर्करा बकृ देहली मर्यादा का अतिक्रमण होने से जो शर्करा मूत्र में आती है उसे भोजन जन्य या सतंर्पण जन्य मधुमेह कहते है लेकिन यह अवस्था चिन्ताजनक नहीं होती है। कार्बोहाइडेंट बहुल पदार्थो का अत्यधिक सेवन करने से बृक देहली मर्यादा का अतिक्रमण होने से जो शर्करा मूत्र में आती है उसे भोजन जन्य या सतंर्पण जन्य मधुमेह कहते है लेकिन यह अवस्था चिन्ताजनक नहीं होती है। कार्बोहाइडेंट की मात्रा कम कर देने पर यह विकृति ठीक हो जाती है। मधुमेह का मुख्य कारण कुछ अन्तः स्रावी ग्रन्थियां के स्रावों की विकृति है। अग्न्याशय, चुल्लिकर ग्रन्थि, अधिवृक्क ग्रन्थि तथा पीयूष ग्रन्थि, ये चार कार्बोहाइडेंट मेटावौलिज्मं का नियन्त्रण करती हैं। अग्न्याशय से दो प्रकार के सा्रव निकलते है। अग्न्याशय रस इसका प्रथम स्राव है जो पच्चमानाशय में पित्त के साथ मिलकर बसा तथा भोजन के अन्य भागों का पाचन करता है। दूसरे अन्तःस्राव, जो रक्त प्रवाह में मिलकर क्रिया में करता है, का क्रियाकारी तत्व मधुनिषूदनी है। यह पेशियों द्वारा शर्करा का संचय करती है। परिणामतया रक्तगत शर्करा बढ़कर वृक देहली मर्यादा का अतिक्रमण करके मूत्र द्वारा उत्कृष्ट होने लगती है यह चिन्ता जनक स्थिति होती है। इस अवस्था में बृक पूर्णतया स्वस्थ रहते हैं शेष तीन गं्रथियां इन्सुलीन की क्रिया को रोकती है। इस प्रकार इन चारों ग्रंथियों की अन्तः स्रावों की प्राकृत अवस्था शर्करा के परिवर्तनों का नियन्त्रण करती है। कभी-कभी इन्सुलिन की क्रिया बढ़ जाती है जिसे उपमधुमयता कहते हैं यह भी चिन्ताजनक स्थिति है। यदि तुरन्त शर्करायुक्त पदार्थों द्वारा रक्तगत शर्करा की वृद्धि न की जाय तो रोगी के प्राण संकट में पड़ जाते हैं। इस स्थिति उत्पन्न होने के बाद नट ग्लूकोज न लेने पर भी देखी जाती है। इससे यह स्पष्ट है कि मधुमेह का प्रधान कारण अग्न्याशय का विकृत होना है।
चरक ने प्रमेह एवं मधुमेह की असाध्यता को अपने चरक चिकित्सा में भी बताया है।
जैसे – जात प्रमेही मधुमेहिनो वा न साध्य उक्त ऋषि बीज दोषात्।
ये चापि कविचित् कुलजा विकारा भवन्तिसन्तान प्रवदन्यसाध्यान्।।
अर्थात प्रमेह को उत्पन्न करने वाले दोष से उत्पादक, (चरक चिकित्सा06) बीज (शुक्र या शुक्राणु) के क्रोमोसोम नामक अवयव के दुष्ट हो जाने से मधुमेही पिता की सन्तान यदि प्रमेही या मधुमेही होती है तो उसे विद्वान असाध्य मानते हैं। इसके अतिरिक्त अन्य कुलज प्रवृत्ति वाले रोग (Hereditary Diseases) भी गर्भारम्भक बीज दोष के कारण असाध्य होते हैं। चरक ने मधुमेह को कुलपरम्परागत रोगों में सबसे प्रबल माना है। यह निश्चित है कि मधुमेही की संतान मधुमेही हो होती है किन्तु यह नियम नहीं है कि जन्म से ही उसमें मधुमेह के लक्षण व्यक्त हो जाए। यदि पिता को 50 वर्ष की आयु में मधुमेह हुआ हो तो पुत्र को 40 या 60 वर्ष में मधुमेह हो सकता है।
चिकित्सा :
(1) गुडमार की पत्ती 30 ग्राम, नीम की पत्ती 30 ग्राम, तुलसी की पत्ती 30 ग्राम, सदाबहार की पत्ती 30 ग्राम, बेल की पत्ती 30 ग्राम, जामुन की गिरी 50 ग्राम, बेल की गिरी 50 ग्राम, वैशाखोपल अंसली 20 ग्राम, जायफल 10 ग्राम, जावित्री 10 ग्राम, इन्द्रजौ 10 ग्राम, बिनौले की गिरी 20 ग्राम, काली मिर्च, तेजपत्ता असली 30 ग्राम, करेला बीज 20 ग्राम, इन सबको सुखाकर बारीक चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को प्रातः सांय पानी से लें।
(2) वसन्त कुसुमाकर रस, त्रिवंगभस्म भी रोगी को कुशल वैद्य की देख रेख में देना चाहिये।
आसन एवं व्यायाम– मधुमेह के रोगी को प्रातः भ्रमण अत्यन्त लाभकारी है। रोगी को 5-7 किलोमीटर अवश्य घूमना चाहिये भस्रिकासन-हलासन एवं सर्वांगासन सीखकर करना चाहिये। भस्रिकासन (लोहार की धौंकनी के समान श्वास प्रवास) करने से यह लाभ होता है कि इससे इन्सुलिन का निर्माण होता है।
पथ्यापथ्य:– मधुमेह में जौ, चना, गेहूँ की रोटी, पुराना चावल, मूंग, मसूर, चना, अरहर की दाल, पत्तियों वाली सब्जी, परवल, बैंगन, करेला आदि लाभदायक है। किन्तु शाक, मीठे फल, चीनी, चाय कफकारक चीजें हानिप्रद होती हैं। स्थूल रोगियों को मधुपान कम करना चाहिये।
















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