केदारखण्ड के अंतर्गत बदरीनाथ मार्ग पर ‘‘पंच प्रयागों’’ का महत्व

केदारखण्ड के अंतर्गत बदरीनाथ मार्ग पर ‘‘पंच प्रयागों’’ का महत्व

महाभारत में देवलोक अथवा देवभूमि का क्षेत्र, वहां से बताया गया है, जहां से पतित पावनी गंगा प्रारम्भ में अलकनन्दा के नाम से प्रचलित हैं। केदारखण्ड के अंतर्गत गढ़वाल भू-भाग में “पंचबदरी” की भांति “पंचप्रयाग” आज भी धर्मपरायण एवं श्रद्धालु जनमानस के लिए सुप्रसिद्ध एवं सुपरिचित हैं। गढ़वाल के बदरीनाथ मार्ग पर ये पंचप्रयाग हैं

महाभारत में देवलोक अथवा देवभूमि का क्षेत्र, वहां से बताया गया है, जहां से पतित पावनी गंगा प्रारम्भ में अलकनन्दा के नाम से प्रचलित हैं। केदारखण्ड के अंतर्गत गढ़वाल भू-भाग में “पंचबदरी” की भांति “पंचप्रयाग” आज भी धर्मपरायण एवं श्रद्धालु जनमानस के लिए सुप्रसिद्ध एवं सुपरिचित हैं। गढ़वाल के बदरीनाथ मार्ग पर ये पंचप्रयाग हैं :- विष्णुप्रयाग, नन्दप्रयाग, कर्णप्रयाग, रुद्रप्रयाग तथा देवप्रयाग।

1. विष्णुप्रयाग : बदरीनाथ मार्ग पर जोशीमठ से लगभग 10 किमी० आगे अलकनन्दा व विष्णुगंगा (धवली) के संगम पर समुद्रतल से लगभग 4000 फीट पर स्थित विष्णुप्रयाग तीर्थ है। यहां से “सूक्ष्म-बदरीनाथ” क्षेत्र प्रारम्भ होता है। विष्णुप्रयाग संगम सूक्ष्म एवं दुर्गम है। मुख्य मार्ग पर विष्णु भगवान का मंदिर है। किंवदन्ती है कि यहां पर देवर्षि नारद ने अष्टाक्षरी-मंत्रों का जाप व विष्णु की आराधना कर उनके साक्षात दर्शन कर वर प्राप्त किया था। संगम के दोनों ओर जय-विजय पर्वत इस भांति खड़े हैं, जैसे भगवान विष्णु के द्वारपाल खड़े हों।

2. नन्दप्रयाग : बदरीनाथ मार्ग पर अलकनन्दा व मंदाकिनी के संगम पर समुद्र तल से लगभग 2500 फीट की ऊंचाई पर नन्दप्रयाग तीर्थ स्थित है। प्राचीनकाल में पौराणिक कथनानुसार, सत्यवादी महाराज नंद ने यहां पर तपस्या की थी। यहां से “स्थूल बदरीनाथ’ क्षेत्र प्रारम्भ होता है। यहां पर राजा दुष्यन्त एवं शकुन्तला का पाणिग्रहण-संस्कार हुआ था। अलकनन्दा के पार्श्व में शकुन्तला-बगड़ (शकनौली-बगड़) नाम की एक छोटी बस्ती है। सरकारी अभिलेखों में इस स्थान का नाम कण्डासू अंकित है, जो कण्वाश्रम (कण्वासू) का अपभ्रंश है। यहां पर लक्ष्मी-नारायण व भगवती चंडिका-मंदिर, गोपाल मंदिर व शिवगुफा-मंदिर हैं।

यहां पर राजकीय इंटर कालेज, लोक निर्माण-विभाग, वन-विभाग, दिल्ली पर्यटन विभाग तथा गढ़वाल विकास निगम के विश्राम गृह व कुछ सरकारी विभागों के कार्यालय हैं। यहां से एक मार्ग अल्मोड़ा को जाता है।

3. कर्णप्रयाग : बदरीनाथ मार्ग पर अलकनन्दा व पिंडर नदी के संगम पर लगभग 2600 फीट की ऊंचाई पर कर्णप्रयाग तीर्थ स्थित है। कहते हैं यहां पर महादानी कर्ण ने सूर्यदेव की आराधना कर अभेद्य कवच प्राप्त किया था।

यहां पर उमादेवी का विशाल प्राचीन मंदिर, कर्ण मंदिर, लोक निर्माण विभाग, वन विभाग, गढ़वाल विकास निगम, बदरीनाथ मंदिर समिति के विश्राम गृह तथा कालीकमली की धर्मशाला के अलावा राजकीय महाविद्यालय, राजकीय इंटर कालेज, राजकीय कन्या इंटर कालेज, आई०टी०आई० तथा तहसील व विकासखण्ड, सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र व राजकीय विभागों के प्रमुख कार्यालय है। यहां से एक मोटर मार्ग रानीखेत व दूसरा मोटर मार्ग अल्मोड़ा को जाता है। कर्णप्रयाग जनपद चमोली का एक प्रमुख केन्द्र स्थान है। यहां से एक मोटर मार्ग नंदादेवी सिद्धपीठ नौटी को जाता है। कहते है भारत में शायद अकेला है कर्णप्रयाग में स्थित प्राचीन उमादेवी मंदिर।


4. रुद्रप्रयाग : बदरीनाथ मार्ग पर अलकनंदा व मंदाकिनी के संगम पर लगभग 2200 फीट की ऊंचाई पर रुद्रप्रयाग तीर्थ स्थित है। संगम के पास रुद्रेश्वर भगवान, हनुमान जी आदि देवी-देवताओं के मंदिरों हैं। कहते हैं कि देवर्षि नारद ने यहां पर “ऊँ नमो शिवायः” मंत्र से शिवजी की आराधना करते हुए संगीत शास्त्र का ज्ञान प्राप्त किया था। रुद्रप्रयाग से केदारनाथ धाम का मुख्य मार्ग प्रारम्भ होता है। यहां से लगभग 3 किमी० की दूरी पर कोटेश्वर मंदिर व शिवगुफा स्थित है। रुद्रप्रयाग का पृथक जनपद के रूप में लगभग पांच वर्ष पूर्व गठन हो गया था।

यहां पर संस्कृत महाविद्यालय, राजकीय इंटर कालेज, राजकीय कन्या इंटर कालेज, लोक निर्माण विभाग, वन विभाग, गढ़वाल विकास निगम, कालीकमली आदि के विश्राम गृह के अलावा जिलाधिकारी, तहसील, जिला पंचायत तथा अनेक राजकीय विभागों के प्रमुख कार्यालय हैं।

5. देवप्रयाग : बदरीनाथ मार्ग पर अलकनन्दा व भागीरथी के संगम पर लगभग 1800 फीट की ऊंचाई पर देवप्रयाग तीर्थ स्थित है। यहां पर नौवीं शताब्दी का विशाल रघुनाथ मंदिर तथा अन्य मंदिर हैं। मंदिर के पृष्ठभाग में शंकराचार्य गुफा है। पौराणिक कथनानुसार भगवान राम ने रावण-वध के दोष-निवारणार्थ यहां पर तपस्या की थी। यहां पर अलकनन्दा गौमुख ग्लेशियर से प्रवाहित होकर भागीरथी नदी से मिलने के बाद पतित पावनी सुप्रसिद्ध ‘गंगा’ कहलाने लगती है, जो आगे ‘प्रयागराज’ (इलाहाबाद) में मिलती है। देवप्रयाग की चारों दिशाओं में चार शिवजी विराजमान हैं, जो क्षेत्रपाल माने जाते हैं।

देवप्रयाग :देवप्रयाग सर्वोत्तम तीर्थ माना जाता है। यहां पर एक राजकीय महाविद्यालय, संस्कृत महाविद्यालय, राजकीय इंटर कालेज, राजकीय कन्या इंटर कालेज, लोक निर्माण विभाग, गढ़वाल विकास निगम, काली कमली आदि के विश्राम गृह, तहसील कार्यालय तथा अनेक राजकीय कार्यालय हैं। यहां से एक मोटर मार्ग पौड़ी (गढ़वाल), एकमार्ग सिद्धपीठ चन्द्रबदनी मंदिर तथा एक मार्ग प्रसिद्ध गंगोत्री व यमुनोत्री धामों को जाता है।

देवप्रयागा तीर्थं तीर्थों में उत्तम तीर्थ है।
अयोध्याए मथुराए काशीए द्वारिका सेतु बन्धकः।
कांच गया कुरुक्षेत्र बद्र्याश्रम एव च।।
देवप्रयागा तीर्थं च तीर्थानि तीर्थमुत्तमम्।।

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