हम नहीं सुधरेंगे

सरकार नई नेता नये, उनके सचिव सहयोगी सब नये। काम के तरीके और सिद्धान्त भी नये। पर हम तो वही हैं। हाथ पर हाथ रख अलसाने वाले, हर तमाशे को उचक-उचक कर देखने वाले, इधर- उधर भरपूर गपियाने और अपनी हर समस्या पर सरकार को कोसने वाले। हम वो हैं जो रात के अंधरे में

सरकार नई नेता नये, उनके सचिव सहयोगी सब नये। काम के तरीके और सिद्धान्त भी नये। पर हम तो वही हैं। हाथ पर हाथ रख अलसाने वाले, हर तमाशे को उचक-उचक कर देखने वाले, इधर- उधर भरपूर गपियाने और अपनी हर समस्या पर सरकार को कोसने वाले।

हम वो हैं जो रात के अंधरे में अपने घर का कूड़ा पड़ोसी के प्रवेश द्वार पर फेंकना अपना परम धर्म मानते हों, जो सफाई का अर्थ अपने घर की सफाई ही जानते हों और जो सार्वजनिक सम्पत्ति को अपनी बपौती के रूप में पहचानते हों। वरना सोचिये तो ऐसा क्यों होता कि हम सड़क चलते कहीं भी खंखार कर थूक दें, किसी भी दीवार को स्वयं या बच्चों से तर करा दें और कुत्ता पालने का लुत्फ उसे कहीं भी हगने-मुताने में उठायें।

विदेशियों के विषय में सुनकर हमें सुखद आश्चर्य होता है कि वे कहीं भी गन्दगी नहीं फैलाते, कुत्ते को बाहर ले जाते समय अपने थैले में पॉलीथीन, नैपकिन व फब्वारा अवश्य रखते हैं और छोटे-छोटे बच्चें भी टॉफी चॉकलेट का छिलका डस्टबिना में डालते हैं। किंतु हमारी भी तो विवशता है। हमारे यहां सरकार के रखे डस्टबिन कहीं होते नहीं, कहीं दिखते भी हैं तो वे पहले से ओवरलोडेड रहते हैं। मजबूरन हमें पूरे देश को डस्टबिन बनाना पड़ता है। कभी किसी अंग्रेज ने कहा था- ‘इंडिया इज ए बिग लैट्रीन’। आंकड़ों के मुताबिक आज भी यहां की पचास प्रशित जनता (इन्सानों वाली) खुले में शौच करती है। तो फिर ऐसे में नदी, पार्क कुछ भी हों, हम उसका जो हाल करते आये हैं वह करते रहेंगे। जो आदत खून में संस्कार बन कर शामिल हो चुकी हो उससे पीछा कैसे छुड़ा सकते हैं। हां यदि अंग्रेज सफाई के कठोर नियम लदवा कर हमें उनके पालन का आदी बनवा गये होते तो और बात थी। तब हममें सफाई की आदत उसी तरह रच बस गई होती जिस तरह अब गन्दगी की।

हो सकता है किसी स्वच्छता अभियान के प्रति अति उत्साह में भरी सरकार सड़क या नदी गंदी करने पर जुर्माना लगाये! पर इससे काम नहीं चलेगा। जुर्माने के कई तोड़ निकल आएंगे पर गन्दगी फैलाने की सुविधाजनक आदतें नहीं बदलेगी। तोड़ बहुत निकलेंगे। पकड़े जाने पर हम भाग सकते हैं। कान पकड़ कर भविष्य में गलती न दुहराने की झूठी प्रतिज्ञा कर सकते हैं और सबसे कारगर यह कि जुर्माने से कम (जो जितने में पट जाये) में मामला रफा दफा कर सकते हैं। तो फिर जब इतनी सारी सहूलियतें हों तो सफाई की हर समय चौकन्ना रखने वाली कष्टदायक आदतें कौन अपनाये! कौन अपना अमन चैन बरबाद करे।

इन दिनों गंगा की सफाई की बातें तो बहुत हो रही हैं। संभवतः सरकार कुछ पुख्ता प्रबन्ध और कुछ कठोर नियम बना दे पर इतना तय है कि हम नहीं बदलने वाले। सरकार को जो करना है करे पर हम वही करेंगे जो करते आये हैं। नदी हो या समुद्र, सड़क हो या राजमार्ग, पार्क हो या सरकारी दफ्तर। मतलब चाहे कोई भी सार्वजनिक सम्पत्ति हो हम उसका एक समान उपयोग करेंगे। इस दृष्टि से हम यानी जनता जनार्दन पक्की समाजवादी है।

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