भारत का स्विट्जरलैंड कहलाने वाली हमारी देवभूमि उत्तराखण्ड के आम जनमानस को आशा ही नहीं अपितु पूर्ण विश्वास था कि अपना राज्य बनने के पश्चात तो उसके दिन अवश्य बहुरेंगे। लेकिन अफसोस दो दशक पश्चात भी अपेक्षित विकास नहीं हुआ। उसने अपने ही कर्णधारों के द्वारा छोड़ी गई भावनाओं से आहत होकर भले ही राज्य

भारत का स्विट्जरलैंड कहलाने वाली हमारी देवभूमि उत्तराखण्ड के आम जनमानस को आशा ही नहीं अपितु पूर्ण विश्वास था कि अपना राज्य बनने के पश्चात तो उसके दिन अवश्य बहुरेंगे। लेकिन अफसोस दो दशक पश्चात भी अपेक्षित विकास नहीं हुआ। उसने अपने ही कर्णधारों के द्वारा छोड़ी गई भावनाओं से आहत होकर भले ही राज्य की बागडोर एक सरकार के बाद दूसरी सरकार के हाथों में भी सौंपी लेकिन परिणाम वही ‘ढाक के तीन पात’। यह प्रश्न यह है कि आखिर हमारे राज्य के हिस्से में छलना ही क्यों आया? इसके लिए हमें अपने उत्तराखण्ड राज्य के पहाड़ी क्षेत्रों की सांस्कृतिक विरासत की ओर लौटना होगा। पूर्व में यहाँ के पहाड़ी गाँवों के परिवेश की सामाजिक पृष्ठभूमि बड़ी ही सुदृढ़ थी। पशुपालन, खेती-बाड़ी यहाँ के निवासियों का मुख्य व्यवसाय था। परिवार की संपूर्ण गुजर-बसर खेती पर ही निर्भर होती थी, केवल नमक, गुड़, तेल की आवश्यकता के लिए ही मैदानी क्षेत्रों की ओर रुख करना पड़ता था।
परन्तु धीरे-धीरे कुछ लोग पहाड़ों से शहरी क्षेत्रों में धनार्जन हेतु जाने लगे, लेकिन आरम्भ में वे गाँव की खेती का पूर्ण कार्य कर दो-चार महीने के लिए ही मैदानी क्षेत्रों में नौकरी करने के लिए जाते थे और वहां से अपने आवश्यक सामग्री कपड़े इत्यादि लेकर वापस अपने गाँव आ जाते थे। परिवार का मुखिया आवश्यकतानुसार परिवार के सदस्यों में सामान का वितरण कर देता था। धीरे-धीरे मैदानी क्षेत्रों में गये लोगों में धनार्जन की लत ज्यादा ही बढ़ने लगी। वे गाँव से कम और मैदानी क्षेत्रों से ज्यादा जुड़ने लगे। अर्थात भौतिकवादी संस्कृति हमारे नवयुवकों में तेजी से घर करती गयी और निरंतर पलायन के चलते पहाड़ खाली होते चले गये। परिणाम अब गाँव में बचे हैं तो बस कुछ असहाय वृद्धजन या मजबूरी की मार से बौद्धिक बेरोजगार नवयुवक। पलायन और परिवार टूटने के कारण उत्तराखण्ड की खेती और पशुपालन व्यवसाय चौपट हो चुका है, पहाड़ों की मनमोहनी तिबारियाँ खण्डहरों में तब्दील हो चुकी हैं। बेहद अफसोस की बात तो यह है कि अनुलित भूमि के मालिक पहाड़ी युवकों को अब अपना भविष्य मैदानी क्षेत्रों के 15-20 गज के फ्लैटों में नजर आ रहा है। भरा-पूरा परिवार, भाई-बहिनों का प्रेम व स्नेह, माँ का लाड़, पिता का दुलार, सारे रिश्ते-नाते मात्र अब पत्नी और बच्चों में ही सिमटने लगे हैं। हमें पुनः गंभीरतापूर्वक विचार करना होगा, राज्य बनने के बाद भी हमारे गाँवों में खालीपन क्यों है? हमें अपनी जड़ों को हर हाल में मजबूत करना होगा अर्थात हमें अपनी सांस्कृतिक विरासत की ओर लौटना ही होगा तभी हम समृद्धशाली उत्तराखण्ड राज्य के स्वप्न को साकार कर पायेंगे।














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