कहीं पहाड़ जैसे इरादे वाले व्यक्ति के अन्दरनकारेपन ने प्रवेश तो नही कर लिया है!

कहीं पहाड़ जैसे इरादे वाले व्यक्ति के अन्दरनकारेपन ने प्रवेश तो नही कर लिया है!

‘पलायन’ विषय पर सदैव चर्चा होती रही है और होती रहेगी, परन्तु इसका सार्थक परिणाम कब निकलेगा यह एक आज तक यक्ष प्रश्न है। क्योंकि कटु सत्य यह है कि जिस प्रकार से पलायन रोकने के लिए विकास जरुरी है उसी प्रकार विकास के लिए पलायन भी जरुरी है। फिर भौतिकवाद युग का एक कड़वा

‘पलायन’ विषय पर सदैव चर्चा होती रही है और होती रहेगी, परन्तु इसका सार्थक परिणाम कब निकलेगा यह एक आज तक यक्ष प्रश्न है। क्योंकि कटु सत्य यह है कि जिस प्रकार से पलायन रोकने के लिए विकास जरुरी है उसी प्रकार विकास के लिए पलायन भी जरुरी है। फिर भौतिकवाद युग का एक कड़वा सत्य यह भी है कि मनुष्य को अधिक से
अधिक कमाने की चाह ने गांव से शहर, शहर से नगर और नगर से महानगरों व महानगरों से विदेशों की ओर पलायन करने को विवश किया। तेजी से बदलते इस दौर में वह ‘रुपये’ को ही अपना सर्वस्व समझ बैठा है। क्या यह कभी न खत्म होने वाली अन्धी दौड़ नहीं है? क्या हम भावी पीड़ी के लिए भी इसी मार्ग पर चलने का मार्ग प्रशस्त नहीं कर रहे हैं?
क्या समस्त भौतिक संसाधन जुटाकर अपने लिए ही जीना, जीवन है? अगर ऐसा नहीं है तो महानगरों में प्रतिष्ठत मुकाम पर पहुंचा सर्वसम्पन्न व्यक्ति जीवन के अन्तिम पड़ाव में अकेला होने का अहसास क्यों करता है? गांवों में अपनों जड़ों को क्यों ढूढ़ता है? इसकी प्रमुख वजह यह है कि जिस प्रकार वह मैं और मेरी पत्नी तथा मेरे बच्चों को ही संपूर्ण परिवार व दुनिया मानकर प्रगति दर प्रगति के लिए अधिक से अधिक कमाने की अंधी दौड़ में दौड़ता रहा उसी प्रकार उसके बच्चे भी बड़े होकर उसी के पद चिन्हों का अनुशरण करते हुए इस कभी न समाप्त होने वाली अन्धी दौड़ में दौड़ने लगते हैं।

पलायन के दंश से अगर सबसे अधिक कोई प्रभावित है तो वह है हमारे उत्तराखण्ड का पर्वतीय क्षेत्र, पर्वतीय क्षेत्रों में जीवन-यापन करना पहाड़ जैसा ही जटिल कार्य है। परन्तु फिर भी कुछ ऐसी बातें हैं जो हमें यह भी सोचने पर विवश करती है कि आखिर पहले ऐसा क्या था कि उसी जमीन पर बड़े-बड़े संयुक्त परिवारों का पेट पलता था और आज चार भाइयों में से एक भाई का छोटा परिवार भी वहां जीवन-यापन में कठनाई का रोना-रोते हुए पलायन कर रहा है या करने की सोच रहा है। कहीं यह भौतिकवाद की चंकाचौंध का परिणाम तो नहीं है? या पहाड़ में पथरीली जमीन का सीना चीरकर जीवन-यापन करने वाले पहाड़ जैसे इरादे वाले व्यक्ति के अन्दर नकारेपन ने प्रवेश कर लिया है। कारण चाहे जो भी हांे परन्तु हमें शीघ्र गम्भीरता पूर्वक चिन्तन कर इसका समाध्ाा न खोजना होगा। इसलिए जरुरी है कि भौतिकवाद की चकाचौंध से बाहर निकलकर हम ईमानदारी से विचार मंथन कर पलायन के स्थाई समाधान की सोचंे, क्योंकि अधिक से अधिक कमाने की अन्धी दौड़ से न क्षेत्र का भला होगा और न स्वयं का।

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