गौं कु हरि सिंह कति दिन से बीमार छौ। आज वेकि हालत कुछ जादा ही खराब छै। कुछ लोगु क नजर म त वू कुछ ही घड़ि कू मेहमान छौ। हरि सिंह वूं मनिख्यूं म गंणे जौद छौ, जौं से भाग्यविधाता सदनि कु रुठीं रै। द्वी ब्यौ करण पर बि वेतैं पारिवारिक सुख की प्राप्ति

गौं कु हरि सिंह कति दिन से बीमार छौ। आज वेकि हालत कुछ जादा ही खराब छै। कुछ लोगु क नजर म त वू कुछ ही घड़ि कू मेहमान छौ।
हरि सिंह वूं मनिख्यूं म गंणे जौद छौ, जौं से भाग्यविधाता सदनि कु रुठीं रै। द्वी ब्यौ करण पर बि वेतैं पारिवारिक सुख की प्राप्ति नि ह्वे सैकि। वेकि द्वी घरवळि, वेतैं निसंतान, इखुलि छोड़ी एक क बाद एक स्वर्गवासी ह्वेगीं। आज बि वू इखुलु ही मृत्यु से लड़नू छौ। मान सिंह वेकु कंणसु भाई छौ पंणि अपंणि घरवळि, दुर्गा क दबाव म औंण क कारण, वु हरि सिंह से बुल्दु, बच्यौंदु तक नि छौ। गौं क जनन, द्वी खाश जगा ही खुलि की बात चीत कै सकदी। अर वु द्वी जगा छीं, पंद्यर या फिर बूंण। आज पंद्यरम, हरि सिंह ही वूंकु चर्चा कू विषय छौ बंण्यूं। दीपा देवी, रूप सिंह की घरवाली न विशेष अंदाज म मुंड हलौंद बोलि, ‘कुजणि भै, आज ये गौ क भाग्य म क्या च लिख्यूं? वूं जिठा जी कि हालत ठीक नी। वू बुन बच्यौंणै बि नि छी। हमर वु बतौंणै छा कि आज वूंकि हालत भौत खराब च।’
पंद्यर अई मान सिंह की घरवळि दुर्गा तैं छोड़ि और सब दुखी छा। वींन दीपा की बात अंणसुंणी कै दै अर अपंणि गागर भरण लगिगी। घर पौंछद ही वीन मान सिंह कू बोलि, ‘यख क्या छौ करणै, अबि जैकि अपंण भाई तैं देखि आवा। भाई क नाता न सही त लोक लाज क नाता सही। भोल प्रभात क्वी इनुं त नि बुलंण कु कि दिखण तक नि आई। दीपा दीदि, पद्यंर म छै बुनी कि वूंकि हालत आज भौत बुरि च।’
दुर्गा कू आदेश शिरोधार्य कैकि मान सिंह सीद हरि सिंह क घर पौछिगी। वख कुछ लोगु की भीड़ छै लगीं। बिना अपंण भाई तैं मिल्या वू लोगुक बीच एक किनर पर खडु छौ। प्रधान दयाराम की नजर जब वेपर पोड़ त वूंन बोलि, ‘भुला मान सिंह, तु अपंण ही आंखुन, अपुंणु बड़ु भाई की बुरि हालत दिखंणु छै। तेरु सिवाय वेक और क्वी सारू नी। अरे, जब तक जान च तब तक आपसी मन मुटाव, झगड़ा-कलह चलद ही रदीं। फिर बि मनिखि तैं अपुंणु कर्त्तव्य नि भुलणु चैंद। मेरु बुल्यूं मनदी त तलि काटल जा, अर डॉक्टरनी प्रतिभा तै बुलैकि ला। सरकारि भीड़ कट्ठि ह्वेगे। ईश्वर कि या बड़ि प्रेरणा छै कि मान सिंह अर दुर्गा वेक नजदीक ही खड़ा छा। डॉ0 प्रतिभा न मरीज कि मांस पेस्यूं तैं झकोलि त हरि जरा होश म ऐगी। वेकि अधबुजि आंखि इनैं उनैं छै टपरौंणी। जनि वेकि नजर, समंणि खड़ु मान सिंह पर पोड़ तनि वेक सुख्यां ओंठू पर एक हल्कि मुस्कान छै अर आंखु बटि आंसु कि धार छै बगंणी।
‘खून, पांणि से बकलु हूंद’ या एक पुरणि मिसाल च। अपंण बड़ा भाई की इनु हालत देखि की मानसिंह क आंसु छा बगणै। मन कु मैल धुलिगी छौ। आंसु फुंजद अर गगलौंद वेन डॉक्टरनी म बोलि, ‘डॉक्टरनी जी खून की जतना बि जरूरत होली, मि द्यूलु पंणि तुम मेर भाई तै बचै द्या। आज दिन तक मेरि अकल पर पत्थर रैन पड्यां जु मीन अपंण पिता समान बड़ा भाई की देख-रेख नि कैरी। मि आप तै एक खाश बात या बि बतै दींदू कि हम द्वी भयूंक् खून ही एक नी बल्कि ‘गु्रप’ बि एक ही च। मितै खूब याद च कि एक बार मेरि सिर पर चोट लगंण से भौत खून निकिळिगे छौ। मेरू यी भाई मितैं सरकारि अस्पताल कोटद्वार ल्हीगे। खून की मांग हूंण पर, भाई न अपुंणु ही खून दे छौ। डॉक्टर न तब बतै छौ कि हमरु खून ‘गु्रप’ एक ही च। आप बिना संकोच क मेर खून दे की यूं तै बचै द्या।’
डॉक्टरनी प्रतिभा उनैं, मान सिंह कू खून ल्हींणी छै, इनैं अपंण खून कू असर देखि की कति लोगु कि आंख्लि आंसुर तर छै।
फौज कि सरकारि नौकरी का कारण, सुरेन्द्र दा कू ब्यौ घूम-घाम से ह्वेगी। ‘सुंदरा’ नाम कि नौनी सुरेन्द्र दाकि ब्योलि बंणि कि वेका घर ऐगी।
‘सुंदरा बौ’ न अपंण नाम कू मान रखी की जरा-जरा कै अपंण सुंदर आचार-विचारून गौंवलु कू दिल जीत दे। हर क्वी वूं की तारीफ ही करदु छौ। मिं इनुं दिखण चौंणू छौ कि ‘सुंदरा बौ’ म इनु क्या खूबि च जू सरि गौंक लोग वूंकि तारीफ करद थकद नि छीं।
एक दिन भगवान न मेरी सूणि ही दे। गर्म्यूं क दिन छा, गौं क हम सब नौन, धार क पांणि म नहेंण कु जयां छा। धार कू पांणि गौं का एक किनर पर सुनसान जगा पर छौ। वख नहेंण-घुयेंण की बड़ि सुविधा छै, हम सब नहेण कि सुचणै ही छा कि ‘सुंदरा बौ’ धूंणक कपड़ौ ल्हेकि वख ऐगी। हम पर नजर पड़द ही वू झिझिकि सी गी अर कुछ दूर ही बैठिगी।
मेरा हाथ बात करण कू मौका लगिगे। मिन बोलि, ‘बौजी, तुम अपंणु काम करि ल्या, तुम कुंणि देर ह्वे जौंण हम फिर फुरसत से नहें ल्यूला।’ बिना कुछ बुल्या ही वू अपंण काम पर लगिगी। अगनै बात बढ़ौंद मिन फिर बोलि, ‘सुरेन्द्र दा कि राजि खुशी त औंणी ही होली, भौत दूर चलिगे बिचरु।’ बौ कि दळिम क फूल सि उठण्यूं म जरा सि मुस्कान झलकिगी छै। वूंन मुंड ह्लै
कि ‘हां’ कि पुष्टि कैदे। मेर मन की त मन म ही रैगी छै। मित वूं क शब्दु कि मिठास ल्हीण चौंणू छौ।
मोर्चा समांलद मिन एक शब्द बांण छोड़द बोलि, ‘दादा क बगैर त तुमरु मन बि क्या होलु लगणू है- बौजी’।
अपंणि उंठण्यूं दबौंद बूंन बोलि, ‘तुमरू ये प्रश्न कू उत्तर तुमतैं तब खुद ही मिल जौलू, जब तुम हमरि उमर म ऐ जैल्या। ‘वूंक ये उत्तर से मि दंग रैग्यूं। अब मेरु विश्वास पक्कु ह्वेगी कि ‘सुंदरा बौ’ क प्रति गौवलु की सोच सही च।
गंगा बोड़ा कू अब तक कू जीवन त दुख क अंध्यर म बीति छौ पंणि अब सुंदरा बौक औंण पर सुख कि एक किरण झलकदि दिखेंणी छै। ग्राम प्रधान कु चुनाव औंण वलू छौ। गौं म मर्दू की संख्या भैर जौंण से कम पुष्पा तैं सचेत करद बोलि, ‘भुली मेरि बात भूलि न ह्वां। काम पूरु हूंण पर मितै जरूर बतै दे। इनु बोलि द्वी अपंण घर का बाट लगिगी।
सुंदरा बौ कि अपणि योजनानुसार आज ग्राम सभा की मासिक बैठक छै। पंचुक अलावा गांव क सबि दान सयण सभा म बैठ्यां छा। कई प्रस्तावू पर विचार विमर्श ह्वेन। एक पंच की हैसियत से, शारदा देवी ने विधवा पुष्पा से संबंधित प्रस्ताव रखि दे। प्रधानी न प्रस्ताव कू समर्थन करद, सभा म बैठ्यां सबि सदस्यों अर बुजुर्गों से निवेदन करद बोलि, ‘मितैं शारदा देवी द्वारा प्रस्तुत प्रस्ताव मंजूर च। यु एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव च। मेरि सबि लोगु से या विनती च कि आप लोग अपणी राय जरूर दियन।’
ग्राम प्रधानी क आदेश सुंणद ही, गौं कु छगटराम खड़ु ह्वे अर ऊँची आवाज म वेन बोलि, ‘प्रधानी जी, मिं ये प्रस्ताव कु विरोध करदू। हमर हिन्दू धरम म जननु तैं दुसुरु ब्यौं करण कू क्वी अधिकार नी च। ये प्रस्ताव तैं धर्म विरोधी मानिकी वापस लिये जाव।’
सुंदरा बौ अपंण स्थान पर खड़ि ह्वे अर वंून बोलि, ‘जिठाजी, अबि आपन बोलि कि हमर धरम म जननू तैं दुसुरु ब्यौ कु अधिकार नीच। आप सभा तै इनुं बतौंण कि वी कृपा कर्यां कि मर्दूं तैं यु अधिकार कैकु अर कखम च दियूं। कखि यु विचार कै स्वार्थी मर्द कू ही त नीच। यी पुरणि सोच क कारण आज कु महिला समाज दुख च भोगणू। आप मितै बताव कि भुलि पुष्पा अबि उन्नीस साल की ही च। वींक मैत अर सासुर द्वी घरू की आर्थिक हालत बी अच्छि नी च। बींन अपंुणु यू पहाड़ सि नीरस जीवन कनि कै अर कैक सार कटण?
प्रधानी जी क यू सार पूर्ण बचनूं सूंणिक छगटराम न हैंणि सैकु न कंणै सैकु अर गूंग बंणी बैठिगी।
प्रधानी जी कू दुसुरु सवाल छौ आशाराम याने पुष्पा क ससुर जी से, ‘ससुर जी अपंणि बेटी समान ब्वारि क बारा म आपकी क्या राय च। आप वीं तै भूखन मरद दिखण चंदौ या वीं कि खुशि म खुश छा।’
आशाराम लाठि क सारु खड़ु ह्वे फिर वेन बोलि ‘प्रधानि ब्वारि, मि अनपढ़














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