मनमोहनी माया

मनमोहनी माया

अनपढ़ गंवार थे वो सन्त कबीराजो कहे माया बड़ी ठगनि हम जानीदौलत तेरी बस एक लंगोटी अरे फकीरा,देखा तूने बन्द कमरों में हीरे मोतियों का जखीरा,देखी तूने कभी बेशकीमती बी.एम.डब्लू गाड़ी,जिसमें शान से बैठे हों धनपति राजा कलमाड़ी,झूठ, फरेब, ठगी से इतनी माया जोड़ी,शपथ बद्धता हमने कब तोड़ी,शपथ तो हमनें यह थी खाई,वक्त मिला है

अनपढ़ गंवार थे वो सन्त कबीरा
जो कहे माया बड़ी ठगनि हम जानी
दौलत तेरी बस एक लंगोटी अरे फकीरा,
देखा तूने बन्द कमरों में हीरे मोतियों का जखीरा,
देखी तूने कभी बेशकीमती बी.एम.डब्लू गाड़ी,
जिसमें शान से बैठे हों धनपति राजा कलमाड़ी,
झूठ, फरेब, ठगी से इतनी माया जोड़ी,
शपथ बद्धता हमने कब तोड़ी,
शपथ तो हमनें यह थी खाई,
वक्त मिला है लूटो-लूटो-लूटो भाई,
कभी सुनी थी सुगाथा हमने दुष्ट दलन मनमोहन की,
जिसने कंस-जरासंघ जैसे दानवों का संहार किया,
अब सुनते हैं कुगाथा अपने दुष्ट रक्षितम् मनमोहन की
जिसने भ्रष्ट गद्दार, राजाओं का सम्मान किया,
आवागमन का द्वार ये प्यारों, कभी यहां से जावोगे,
अभी समय है सोचो समझो, साथ कुछ न ले जावोगे,
रावण के थे सहस्त्रों नाती, बचा नहीं कोई करने दीया-बाती,
राष्टं हित में है जो कोई मरता, भावी पीढ़ी उन्हीं के गुण गाती।।

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