दो राजधानियों का ऐश्वर्य

दो राजधानियों का ऐश्वर्य

कितने भाग्यशाली हैं हम कि हमारे नये-नये राज्य में दो राजधानियां झेलने की सामर्थ्य है। अंग्रेजों ने हमें इतनी सारी अच्छी-अच्छी बातें सिखाई तो दो अलग-अलग राजधानियों का प्रशिक्षण भी हमें लेना ही चाहिये था। सो हमारे माई बापों ने उनका अनुसरण कर ही लिया। परिणाम स्वरूप हम सब दो राजधानियों का सुख लेने वाले

कितने भाग्यशाली हैं हम कि हमारे नये-नये राज्य में दो राजधानियां झेलने की सामर्थ्य है। अंग्रेजों ने हमें इतनी सारी अच्छी-अच्छी बातें सिखाई तो दो अलग-अलग राजधानियों का प्रशिक्षण भी हमें लेना ही चाहिये था। सो हमारे माई बापों ने उनका अनुसरण कर ही लिया। परिणाम स्वरूप हम सब दो राजधानियों का सुख लेने वाले हैं। इसे चाहे ग्रीष्म-शीतकालीन राजधानी के वर्गीकरण में बांट लीजिये या मैदानी-पहाड़ी। इस बहाने अंततः विकास दोनों का ही होना है।


जो विद्रोही विरोध में चहक रहे हैं कि एक संसाधनहीन राज्य पर इतना व्यय बोझ लादना अनुचित है, वे यह भूल जाते हैं शायद कि इस राज्य के समान संसाधान पूर्ण तो कोई राज्य है ही नहीं। क्या नहीं है यहां। पर्यटन, तीर्थाटन व देशाटन सभी कुछ तो है।वानिकी की तो बात ही निराली। इतने पेड़ कटने के बाद भी क्षेत्रफल का दो तिहाई भाग वनों से ढका है। वन हों तो बहुमूल्य वन संपदा भी है। इतना सब होते हुये जो इस राज्य को साधनहीन कहे वह कोई मतिमंद ही हो सकता है।


आप ही सोचिये दोस्तो कि एक राजधानी मैदान में है जोकि पहले से विकसित है तो एक राजधानी पहाड़ में क्यों न हो जोकि पहले से अविकसित है। अनुमान लगाइये, पहाड़ में राजधानी बनेगी तो सम्पूर्ण पहाड़ी क्षेत्र का कितना विकास होगा! वहां शिक्षालय, चिकित्सालय, बाजार आदि स्वयंमेव पंख पसारते दिखेंगे। इस बहाने प्रत्यक्ष परोक्ष सारे रोजगारों के रास्ते खुलेंगे। फिर देखियेगा पलायन उल्टी दिशा में होगा और हम हिमाचल प्रदेशवासियों की तरह गर्व से कह सकेंगे कि हमारे पहाड़ों में पलायन की समस्या नहीं है।

पहाड़ी क्षेत्र में राजधानी बनेगी तो नेताओं-अफसरों के (बीच-बीच में कुछ समय के लिये ही सही) वहां जाकर रहना होगा। वे रहेंगे तो उनकी कोमल देह को आराम पहुंचाने वाले सभी साधन उत्पन्न करने पड़ेंगे। चाहे वह पांच सितारा होटल हो या उसकी सुख सुविधाओं से युक्त उनके नये-नये आवास। उनके पत्नी बच्चों के लिये ब्रेंडेड सामानों से सजे थियटेरमय मॉल भी चाहिये (आज के माल वालों के लिये मॉल एक अनिवार्य आवश्यकता जो है)। इन सबके बहाने पहाड़ों में अच्छी सड़कों और चकाचक रोशनियों का प्रबन्ध तो हो ही जायेगा। इतना ही नहीं पहाड़ में रहने वालों को अपना कौशल दिखाने का अवसर मिलेगा और वे नये-नये प्रशिक्षण ले दे सकेंगे।


अतः यह सब देखते हुये मेरा आपसे करबद्ध निवेदन है दोस्तो कि दो राजधानियों के विरोध का आलाप छोड़िये। समय के साथ कदम मिला कर चलिये और खुश रहने के लिये सकारात्मक सोचिये कि दो राजधानियों के होने से हमें और हमारे राज्यको हर तरह का लाभ मिलेगा। आप कमी निकालना ही चाहें तो बात पृथक है किंतु सच यही है कि पहाड़ में राजधानी का सपना पूरा होगा तो कइयों के सपने सच होंगे और कई जोड़ी आंखों में नये-नये सपने सजेंगे।


असली समस्या सरकार की है। यदि राज्य में दो राजधानियां अस्तित्व में आयेेंगी तो मोहम्मद तुगलक की तरह आवागमन का कष्ट उसे ही झेलना है। तो जब सरकार अपना तन-मन-धन लगा कर इतनी तकलीफ उठाने को तैयार है तो फिर हम आपको क्या एतराज…।

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