• एक तुम

    एक तुम0

    एक तुम,मेरे प्राणों में क्या जगी,टूट गए अवरोध सारे। बह गया भेद मजधार और किनारों का,डूब गया अन्तर रोशनी के सैलाब में,सूरज और तारों का। आभासित होती रही बस तुम, केवल तुम!देह की सीमाएँ सब खो गयी,तुम से क्या मिली असीम हो गयी। मन की व्यथाएँ आनंद के पारावार मेंडूबने उतराने लगी,चारों तरफ तुम्हारी छवि

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