गठिया

गठिया

मनुष्य की आयु बढ़ने के साथ-साथ शरीर के ऊतक कमजोर पड़ने लगते हैं, शरीर के विभिन्न जोड़ खिसने लगते हैं ऐसी स्थिति में जोड़ों में दर्द रहता है। भोजन के प्रति अरुचि हो जाती है। प्यास अधिक लगती है। घुटनों में सूजन हो जाती है। रोग बढ़ते जाने पर रोगी को चलते फिरते समय भयंकर

मनुष्य की आयु बढ़ने के साथ-साथ शरीर के ऊतक कमजोर पड़ने लगते हैं, शरीर के विभिन्न जोड़ खिसने लगते हैं ऐसी स्थिति में जोड़ों में दर्द रहता है। भोजन के प्रति अरुचि हो जाती है। प्यास अधिक लगती है। घुटनों में सूजन हो जाती है। रोग बढ़ते जाने पर रोगी को चलते फिरते समय भयंकर कष्ट होता है। बढ़ती उम्र के कारण जो गठिया होता है उसे आर्थिटीज अर्थराइटिस कहते हैं। जोड़ों में सूजन या जलन के कारण उत्पन्न गठिया को रियूमेटाइड अर्थराइटिस कहते हैं।

यह रोग प्यूरिन (Purin) नामक प्रोटीन के समवर्त (Metabolism) की विकृति का ही परिणाम है। इस अवस्था में रक्तगत यूरिक एसिड की वृद्धि हो जाती है और सन्धिशोथ तथा सन्धियों (Joints) में सोडियम बाइरेट के संचय के विशिष्ट लक्षण दृष्टिगोचर होते हैं। साधारणतया स्वस्थ मनुष्य में रक्तगत यूरिक एसिड की मात्रा 100 सीसीसी में 0.7 से 3.7 मिलीग्रा तक रहती है। स्वस्थावस्था में वह अपनी निश्चित मात्रा में रहता है और उसका अनावश्यक भाग मूत्र द्वारा बाहर निकल जाता है। इस प्रकार रक्तगत यूरिक एसिड की प्राकृत मात्रा का नियमन होता रहता है। किन्तु यदि मछली, भेड़ आदि का मांस अधिक खाया जाय तो इनमें प्यूरिन नामक प्रोटीन अधिक होती है। इसके अतिरिक्त मदिरा वियर का सेवन अधिक किया जाय तो रक्तगत यूरिक एसिड की मात्रा प्राकृत से बहुत अधिक 9 मिग्रा तक हो जाती है और किड्नी द्वारा अधिक भाग शरीर से अथवा आहार से उपलब्ध सोडियम के साथ मिलकर सन्धियों एवं तरुण सन्धियों (Cartilages) में सोडियम बाइरेट के रूप में संचित होने लगता है। स्नायु (Ligaments) तथा कण्डराओं (Tendons) में भी इसका संचय होता है। धमनियों में संचित होने के कारण धमनी काठिन्य (Arterio Sclerosis) तथा रक्तचाप में भी वृद्धि हो जाती है।

रात्रि को रोगी स्वस्थ सोता है किन्तु लगभग अर्द्धरात्रि के समय पैर के अंगूठे में अचानक अत्यधिक पीड़ा एवं जलन जैसे महसूस होती है। कभी-कभी यह रोग गुल्फसन्धि (Ankle Joint) तथा मणिबन्ध सन्धि (Wrist Joint) से प्रारम्भ होता है। रोगी का तापक्रम बढ़ जाता है। कन्धों को घेरनी वाली मांसपेशियों में भी सूजन का आ जाती है। कन्धे स्वाभाविक रूप से हिल डुल नहीं सकते।

अर्थराइटिस अधराइरिस लगभग 50-55 वर्ष के बाद शुरू होता है जिससे घुटने, कन्धे एवं रीढ़ की हड्डी में दर्द होता है। जोड़ों की कार्टिलेज घिसने के बाद हड्डी घिसने शुरू हो जाती है। हड्डी के किनारे बाहर से जुड़ने में उभरी की गति कम हो जाती है। धीरे-धीरे दर्द बढ़ता जाता है। ऐसी अवस्था में रोगी को खूब चलना चाहिये व हल्का सा व्यायाम करना चाहिये। घुटने के जोड़ों के कार्टिलेज में यूरिक एसिड के जमने के कारण यह अंगूर कर देने वाला रोग होता है। इसकी चिकित्सा में यूरिक एसिड के तेज कम से ही रोग उच्च रक्त दबाव आता है। खाद्य पदार्थ-प्रकार एवं मांशाहार इस रोग की उत्पत्ति में प्रमुख रूप से सहायक हैं। इन्हें रक्त बंद कर देना चाहिये तथा रोगी को शाकाहार लेना चाहिये व उसकी दिनचर्या तनाव रहित होनी चाहिए।

चिकित्सा-
1. प्रातः गाढ़े वाले लहसुन की एक कली आधा किलो दूध में डालकर उबालें। दूध के आधा पाव रह जाने पर उसे छानकर पी लें। इसी प्रकार दूसरे दिन तीन कली और चारहवें दिन ग्यारह कली एक गिलास वाले लहसुन के दूध में उबालकर उसे हल्का दूध पी लेना चाहिये। दिन से लहसुन की संख्या एक-एक कर कम करते जाये और उसे पुनः एक तक लाते।
2. पुनर्नवा की जड़ 10 ग्राम को 100 ग्राम पानी में उबालें 25 ग्राम शेष रहने पर छन कर पी लें।
3. गोरखरू मुलक 5 ग्राम दो-तीन गोली गरम पानी में लें।
4. जोड़ों पर अरंडी के पत्ते के पत्ते में लगाकर गर्म करके बाँधें।
5. रात्रि को सोते समय 10 ग्राम मेथी का चूर्ण गिलास पानी पी लें। महानारायण तेल की इसकी मालिश जोड़ो पर करें।

पथ्य: गेहूँ के रोटी, मेथी, चौलाई, करेला, भिण्डी, सेब, पपीता, अंगूर, खजूर, लहसुन इत्यादि अच्छी को सेवन हितकर है।
अपथ्य– चावल, आलू, गोभी, मूली, सेब, चना, उड़द की दाल, केला, संतरा, नींबू, अमरूद, टमाटर, दही, माछयुक्त पदार्थ, दिन में सोना व अधिक परिश्रम से परहेज करना चाहिये। मदिरा का सेवन बिल्कु

Posts Carousel

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked with *

Latest Posts

Top Authors

Most Commented

Featured Videos