राज्य निर्माण के दो दशक पश्चात भी राज्य मे सरकार द्वारा सरं क्षित किये गये क्षेत्र में रहने वाले नागरिकाे की पीड़ा का कहीं अन्त नहीं दिखाई दे रहा है। ससाधनों के विकास के नाम पर पहाड़ के ताबडत़ोड़ दोहन सेे राष्टीय एवं विश्व-स्तर पर इस चिन्तन के लिए एक मंच तैयार होता नजर आ
राज्य निर्माण के दो दशक पश्चात भी राज्य मे सरकार द्वारा सरं क्षित किये गये क्षेत्र में रहने वाले नागरिकाे की पीड़ा का कहीं अन्त नहीं दिखाई दे रहा है। ससाधनों के विकास के नाम पर पहाड़ के ताबडत़ोड़ दोहन सेे राष्टीय एवं विश्व-स्तर पर इस चिन्तन के लिए एक मंच तैयार होता नजर आ रहा है किन्तु जैव विविधता सरं क्षण के नाम पर थोपी जा रही सरकारी नीतियाे के प्रति स्वयं उत्तराखण्ड वासियाे की उदासीनता घातक सिद्ध हो रही है इसलिए हमारे कर्णधारों का यह भी फर्ज है कि दशेा को मजबूती प्रदान करने मे साधन व साध्य का बेहतर तालमेल हो एवं विकास की धारा जनोन्मुखी हाे।
उत्तराखण्ड में यहां के प्राकृतिक संसाधन सामूहिक रूप मे गुजर-बसर के महत्वपूर्ण स्रोत हैं। उदाहरण के लिए चारागाहों, पंचायती वनाे, तालाबाे, जलधाराे, झीलों आदि से पर्वतांचल के लोगों की काफी आय है जो उन्हें पलायन से रोकने के लिए प्रेरणा का काम करती है, लेकिन इनकी अंधी लूट ने लोगों के सामने उनके मजबूत भविष्य व सुरक्षित पर्यावरण के लिए कई संदेह उत्पन्न कर दिये हैं। भूमि के नजरिये से देखें तो कुल भूमि के 64 प्रतिशत क्षेत्र में वन व मात्र 13 प्रतिशत के इर्द-गिर्द कृषि भूमि हैं। बकेार पड़ी भूमि 6 प्रतिशत, नवीन परती 0.22 प्रतिशत है। बेकार तथा ऊसर 6 प्रतिशत एवं 5 प्रतिशत चारागाह के लिए है। खेती के लिए जो 13 प्रतिशत भूमि है उसका अधिकांश भाग तराई व भाबर में हैं जहां रोज-रोर्ज इंट व कंकरीट की कॉलोनियों का ही साम्राज्य बढ़ता जा रहा है। तो सवाल खड़ा होता है कि क्या राज्य के लोगों की कीमत पर ही पूरे देश का विकास किया जाना उचित और इस राज्य के हित में है? यदि ऐसा है तो पहाड़ के लोगों की आर्थिक व सामाजिक वृद्धि व सुरक्षा के लिए सरकार के पास क्या पर्याप्त प्रोत्साहन योजनाये हैं? क्या केन्द्र व राज्य सरकार यहां के संरक्षित क्षेत्र के लिए अन्य सीमान्त व पर्वतीय राज्याे की तर्ज पर सस्ता व सुलभ बाजार एवं रोजगार की व्यवस्था कर रही है?
विस्थापन की समस्या का क्या यह उचित समाधान है? छोटी सी बात है कि इन लोगों के लिए जंगली स्रोतों पर आधारित कृषियन्त्र, प्राकृतिक दवाइयां, घास, चारापत्ती, यातायात व अन्य निर्माण के प्रति संरक्षण के नाम पर ऐसा शोषित काला अधिनियम क्यों? क्या सरकार इन क्षेत्रों के निवासियों की पीड़ा को वास्तविक रूप में देख व समझ रही है, कब तक इनकी देश भक्ति व सहन शीलता की परीक्षा लेती रहेगी? क्योकि कटु सत्य तो यह है कि साधन व साध्य के बेहतर तालमेल से ही विकास की धारा जनोन्मुखी होगी।
















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