राष्टंपिता महात्मा गांधी कहा करते थे कि भारत एक कृषि प्रधान देश है और बिना ग्राम्य विकास के समृद्ध भारत की कल्पना नहीं की जा सकती। इसीलिए उन्होंने पंचायती राज के माध्यम से ग्राम्य विकास की परिकल्पना की थी और उनके विचारों का सम्मान करते हुए हमारे संविधान-निर्माताओं ने पंचायती राज का प्रावधान किया। ग्रामीण क्षेत्रों में त्रिस्तरीय पंचायती राज की व्यवस्था की गयी है लेकिन जिस उद्देश्य के लिए यह व्यवस्था की गई है क्या वह उद्देश्य पूरा हो रहा है ? यह एक गम्भीर विचारणीय प्रश्न है। जबकि कटु सत्य यह है कि ग्रामीण क्षेत्रों में त्रिस्तरीय पंचायती राज की व्यवस्था होने के बावजूद भी इन क्षेत्रों का अपेक्षित विकास नहीं हो पाया।
हालांकि स्थानीय निकाय या पंचायती चुनावों के माध्यम से जनता को अपने-अपने क्षेत्रों का विकास स्वयं करने का अवसर दिया गया है, मगर पंचायती चुनावों में भी राजनैतिक दलों ने घुसपैठ कर उनका पूरी तरह से राजनीतिकरण कर दिया है। राष्टंय दलों द्वारा इन चुनावों को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाये जाने के फलस्वरूप इन चुनाव में अथाह धन का दुरुपयोग होता है। राष्टंय दलों के माध्यम से सुयोग्य प्रत्याशियों की अपेक्षा माफिया अपने धन-बल के माध्यम से चुनाव लड़ते हैं और जीतने के पश्चात ठेकेदारी, दलाली और भ्रष्टाचार के द्वारा पंचायती व्यवस्था को दूषित करते हैं। इसीलिए जब तक सुयोग्य जन प्रतिनिधियां के हाथों में ग्रामीण क्षेत्रों के विकास की बागडोर नहीं आएगी तब तक राष्टंपिता महात्मा गांधी के पंचायती राज के माध्यम से ग्राम्य विकास की परिकल्पना करना बेमानी होगा।
फिर आज के हिंसा के दौर में हिंसा का अंत हिंसा से कदापि संभव नहीं है, हमें नई तकनीकी के युग में गांधीवाद दशर्न से सभी धर्माें के मर्मों एवं विचार धारा को जोड़ते हुए 21वीं सदी के भारत का नव निर्माण करना होगा गांधी जयन्ती पर यह संकल्प लेना होगा कि गांधी जी के ग्राम्य विकास की परिकल्पना को साकार करने हेतु धन-बल के दम पर चुनाव जीतने वाले माफिया प्रत्याशियों को करारी शिकस्त देकर ऐसा वातावरण तयैार करेंगे जिससे कर्मठ, ईमानदार और सुयोग्य प्रत्याशी चुनावों मे विजय प्राप्त कर क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर सके। तभी गांधी जी की कल्पनाओं के अनुरूप पंचायती राज की स्थापना हो सकती है।