धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष इस पुरुषार्थ चतुष्ठय की सिद्धि के लिए सर्वप्रथम शरीर का स्वस्थ एवं निरोग रहना नितान्त आवश्यक है। रोगों से आक्रान्त शरीर के द्वारा कोई भी पुरुषार्थ सिद्ध नहीं किया जा सकता यह सर्वथा सत्य है। अभिप्राय यह है कि स्वस्थ शरीर के द्वारा ही धर्म-कर्मों का अनुष्ठान किया जा सकता है धर्मपूर्वक या न्यायपूर्वक धनोपार्जन किया जाता है धर्मपूर्वक ही अपनी विवाहित पत्नी से पुत्रोत्पन्न किया जाता है, और धर्मपूर्वक आचरण करने पर ही योग आदि आध्यात्मिक मोक्ष- साधनाओं के द्वारा अन्तिम मोक्ष प्राप्त किया जाता है। इसे ही अन्तिम पुरुषार्थ कहा जाता है। इसीलिए कहा गया है कि ‘शरीरमाध्यम् खलुधर्मसाधनम्’
परन्तु शास्त्रकारों ने हमारे इस शरीर को व्याधियों का एक बड़ा भण्डार कहा है- शरीर व्याधिमन्दिरम् यह बात सत्य भी है। कारण मानव शरीर के जन्म के साथ ही रोग एवं मृत्यु भी प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप में पैदा हो जाते हैं। हमारा शरीर पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश इन पांच महाभूतों से बना है एवं माता एवं पिता के रज एवं वीर्य से उत्पन्न हुआ है, इसलिए इन सभी तत्वों का गुणधर्म आदि शरीर में होना स्वाभाविक है। इनके कार्यों में व्यतिक्रम हो जाने पर शरीर में रोग उत्पन्न हो जाते हैं। ऐसा नहीं कि केवल मनुष्य शरीर ही रोगी होता है अपितु पशु एवं पक्षियों के शरीर भी रोगी होते हैं।
पशु पक्षी बीमार होने पर चिकित्सा नहीं करवाते हैं अपितु आहार करना छोड़ देते है, पूर्णतया उपवास करते हैं तथा सूर्य की धूप में पड़े रहते हैं इस प्रकार वे आरोग्य को प्राप्त करते हैं। ये अज्ञात रूप से प्राकृतिक चिकित्सा ही करते हैं जैसे-एलौपैथी, होम्योपैथी, साइकोपैथी, यूनानी चिकित्सा, नैचुरोपैथी तथा योग चिकित्सा आदि उपरोक्त चिकित्सा पद्धतियों द्वारा रोग ग्रसित असंख्य नर-नारी आरोग्य प्राप्त कर रहे हैं। भारतीय चिकित्सा पद्धति अपनी सर्वातिक्षमता, गुणवत्ता, महत्व तथा आरोग्य प्रदान करने वाली शक्ति से आज भी सारे विश्व को लाभान्वित कर रही है यह बात किसी से छिपी हुई नहीं है।
यह भारतीय चिकित्सा पद्धति भी प्राचीनतम् है तथा वेद के साथ सम्बन्धित है। आयुर्वेद अथर्ववेद का उपवेद है इस बात का प्रमाण भी है। आयु का ज्ञान ही आयुर्वेद है जैसे-
शरीरेन्द्रियसावात्मा संयोगोधारिजीवितम्।
नित्गश्चानुबन्धश्व पर्यायैरायुरुचयते।।
अर्थात शरीर इन्द्रिय सत्व एवं आत्मा के संयोग को आयु कहते हैं। जीवित नित्यग तथा अनुबन्ध ये आयु के पर्याय है। इस आयु सम्बन्धी प्रत्येक ज्ञेय विषयक ज्ञान को आयुर्वेद कहते हैं। आयुर्वेद मनुष्य को कैसे प्राप्त हुआ इस बात को चरक संहिता में कहा गया है। जिस प्रकार सम्पूर्ण आयुर्वेद का उपदेश ब्रह्मा जी ने दिया था उसको उसी रूप में सर्वप्रथम दक्ष प्रजापति ने ग्रहण किया, इसके बाद दक्ष प्रजापति से अश्वनीकुमारों ने, अश्वनीकुमारों से इन्द्र ने और इन्द्र से ऋषियों के कहने पर भारद्वाज मुनि ने सम्पूर्ण आयुर्वेद का ज्ञान प्राप्त किया, भारद्वाज मुनि से ही अन्य ऋषि मुनियों को आयुर्वेद का ज्ञान प्राप्त हुआ है। अतः आयुर्वेद की चिकित्सा प्रणाली लाखों वर्षों की अनूभूति पर आधारित है।
स्वस्थ एवं दीर्घजीवी होने के लिये आयुर्वेदिक औषधियां ही अनुकूल रहती है। ऐलौपैथिक औषधियों में एक दोष तो यह है कि यह मियाद खत्म होने पर खराब हो जाती है, दूसरा मुख्य दोष यह है कि इनका शरीर पर प्रतिकूल प्रभाव भी पड़ने की सम्भावना रहती है। परन्तु आयुर्वेदिक औषधियां इन दोषों से रहित होती हैं उचित आहार-विहार एवं पथ्य सेवन से आयुर्वेदिक औषधियां न केवल रोग को ठीक करती हैं अपितु उत्तम स्वास्थ्यवर्द्धक भी होती हैं तथा साथ ही मानसिक विकारों को भी शांत करती हैं। इन औषधियों का इतना प्रचुर भण्डार है कि इनके द्वारा सभी प्रकार के रोगों की चिकित्सा की जा सकती है। परन्तु जिस प्रकार इस चिकित्सा पद्धति का विकास होना चाहिए था वैसा नहीं हो पाया है। ऐलोपैथी चिकित्सा पद्धति आज विश्व व्यापी हो गयी है। इससेे शीघ्र लाभ होता देख अधिक मंहगी होने पर भी लोगों में अंग्रेजी औषधियों के प्रति अधिक आस्था देखी जाती है। लेकिन शीघ्र लाभ चाहने वालों को लिए
यह भले ही अनुकूल जान पड़ती है परन्तु भारत जैसे देश की जलवायु में रहने वालों के लिए आयुर्वेदिक औषधि ही अधिक अनुकूल रहती है।
बहुत पुरानी बात है कि एक दिन जैमिनि मुनि अपने आश्रम के एक वृक्ष के नीचे बैठे हुए थे उसी वृक्ष की शाखा पर बैठा एक पक्षी अचानक बोल पड़ा कोऽरूक अर्थात निरोग कौन है? मुनि पक्षी की भाषा समझते थे, इसलिए उन्होंने उत्तर दिया हितभुुक् जो हितकर पुष्टिकर तथा अनुकूल आहार ग्रहण करता है। पक्षी पुनः बोल पड़ा कि कोऽरुक तो मुनि ने पुनःउत्तर दिया कि जो हितभुक् और मितभुक है वही स्वस्थ शरीर का आनन्द प्राप्त करता है। अर्थात जो व्यक्ति अपनी प्रकृति के अनुकूल भोजन ग्रहण करता है और यथा समय परिमित भोजन ग्रहण करता है वहीं स्वस्थ रहकर आनंदमय एवं दीर्घ जीवन व्यतीत कर सकता है।
कुछ लोग यह कहते है कि आयुर्वेदिक चिकित्सा प्रणाली में उच्च रक्तचाप नाम का कोई रोग नहीें है। यह कथन सर्वथा असत्य है। माधवनिदान में इस रोग का वर्णन बात रोगों में किया गया है। इसे रक्तगत वात या शिरागत वात से इंगित किया गया है। यह दो प्रकार का है।
(1) उच्च रक्तचाप या शिरागत वात।
(2) न्यूनरक्त चाप।
उच्च रक्तचाप के लक्षण:-
(1) रोगी के सिर में विशेष कर पीछे की ओर दर्द होता है। यह दर्द कभी-कभी कम एवं कभी अधिक होता है।
(2) रोगी को सुबह एवं शाम को चक्कर आने लगता है।
(3) हृदय गति अधिक हो जाती है। हृदय प्रदेश में दर्द होने लगता है उसका स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है।
(4) रोगी की स्मरण शक्ति क्षीण होने लगती है।
(5) रेोगी को नींद कम एवं टूट-टूटकर आती है।
(6) मंदाग्नि हो जाती है तथा भूख कम लगती है।
(7) पेशाब की मात्रा कम होने लगती है। पेशाब में शक्कर, एल्यूमिन एवं यूरिक ऐसिड बढ़ जाता है। ये कारण आधुनिक चिकित्सा पद्धति में गिनाये गये हैं।
आयुर्वेद की दृष्टि से उच्च रक्तचाप के कारण:-
(1) इसका मूल कारण शरीर में वात की अधिकता मानी गई है जिस कारण रोगी की धमनियां कठोर हो जाती हैं।
(2) यह मनुष्य की अनियमित दिनचर्या के कारण हो सकता है जैसे- समय पर न उठना, समय पर मल त्याग न करना, व्यायाम न करना, मांसाहारी भोजन का अधिकतर सेवन करना, अनावश्यक परिश्रम एवं समय पर न सोना।
(3) स्त्रियों में मासिक धर्म का बन्द होने के समय अनियमित होना।
(4) अधिक शोक, मानसिक आघात, चिन्ता एवं क्रोध होने से भी रक्तचाप बढ़ सकता है।
उच्च रक्तचाप का निर्णयः-
आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति के अनुसार नाडी के विषय में विशेष ज्ञान होना
अनिवार्य है। इसमें निम्नलिखित तीन बातों का समावेश है।
(1) नाड़ी स्पन्दन की संख्या का माप।
(2) स्पन्दन की तालबद्धता का ज्ञान।
(3) नाड़ी की संकोचन क्षमता का ज्ञान। आज तो अधिकांश परिवारों में स्त्री एवं पुरुषों में उच्च रक्तचाप रोग देखा जाता है। यदि एक बार यह शरीर में प्रवेश कर जाता है तो इससे स्थायी रूप से पीछा छुड़ाना कठिन हो जाता है। इसलिये आधुनिक चिकित्सा पद्धति में यह असाध्य रोग की श्रेणी में आता है। इसके निवारण के मूल उपाय हैं-
(1) धमनियों की कठोरता को दूर करना एवं उनमें पुनः संकुचनशीलता लाना।
(2) हृदय की गति एवं स्पन्दन की ताल में एकबद्धता लाना। यह केवल आयुर्वेद द्वारा ही सम्भव है। यदि आयुर्वेद में वर्णित स्वास्थ्यवृत का पालन किया जाय तो रोगी को अधिक लाभ औषधि के बिना ही हो सकता है।
आयुर्वेद चिकित्सा: –
इस चिकित्सा शास्त्र के अनुसार वात-पित्त एवं कफ का समभाव में होना ही स्वस्थ शरीर का लक्षण बताया गया है सदा स्वस्थ एवं निरोग रहने के लिये स्वास्थ्यवृत के निम्न नियमों का पालन करना आवश्यक है-
(1) कायिक, वाचिक एवं मानसिक रूप में ब्रहमचर्य का पालन करना आवश्यक है।
(2) शारीरिक एवं मानसिक कार्य उतना ही करें जिससे अधिक श्रम न पड़े।
(3) हमेशा प्रातः सघन छाया वाले वृक्षों के स्थान पर, जहां प्रकाश एवं स्वच्छ हवा हो, घूमने जायें।
(4) नित्य तिल के तेल से मालिस कर गुनगुने पानी से स्नान करें।
(5) रात्रि में सूर्यास्त से पूर्व भोजन कर लें तथा निश्चित समय पर सोयें।
(6) ऐसा कार्य करें जिससे मानसिक थकान न हो जैसे अच्छे साहित्य का अध्ययन।
(7) प्रातः शौच शुद्धि पर विशेष ध्यान दें।
औषधियों द्वारा चिकित्साः-
सर्वप्रथम इस रोग में वनस्पति सर्पगन्धा अर्थात् ‘सरपिना’ गोलियां या इसके अन्य कम्पाउण्ड का प्रयोग करें। सरपिना उष्ण प्रकृति की होने से पित्त प्रकृति वाले व्यक्ति, जो उच्च रक्तचाप का रोगी होता है, इसका प्रयोग करने पर घबराहट एवं बैचेनी का अनुभव करते हैं और इस प्रकार की औषधि का पुनः प्रयोग करने के लिए इन्कार करते हैं। महर्षि चरक ने धमनियों में संकोचनशीलता पैदान करने के लिये ‘चरकजा’ का उपदेश दिया है। उन्होंने बताया है कि सूखी हुई लकड़ी भी जब स्नेहन एवं स्वेदन द्वारा मन के अनुसार मोड़ी जा सकती है तो जीवित मनुष्य स्नेहन एवं स्वेदन के द्वारा इच्छानुसार परिवर्तित क्यों नहीं किया जा सकता है। इससे रोगी को स्थायी लाभ अवश्य मिलता है यह चिकित्सा आयुर्वेद के पंचकर्म के अधीन आती है। इसमें पहले रोगी को वाहय एवं आभ्यन्तर स्नेहन करवाना चाहिए। स्नेहन के पश्चात रोगी को स्वेदन कराना चाहिए। इस रोग में अनुभवी वैद्य की देख-रेख में चिकित्सा में स्वर्णभस्म-रौप्यभस्य, लौहभस्म, अभ्रक भस्म, रस सिंदूर, योगेन्द्र रस, अर्जुन त्वक् चूर्ण, सर्पगन्धा चूर्ण, जटामासी चूर्ण, शंखपुष्पी आदि प्रयोग करवाना चाहिए।
रोग की विशेष व्यवस्था में:-
(1) यदि सिरदर्द अधिक हो तो कर्पदमस्य एवं अभ्रकभस्म आंवले के मुरब्बे के साथ देवें।
(2) यदि रोगी को नींद न आती हो तो सर्पगन्धा चूर्ण एवं वृहद्वात चिन्तामणि रस मिलाकर दूध के साथ देेवें, पित्त प्रकृति वाले रोगी को सर्पगन्धा चूर्ण को प्रवालपिस्टी या मिश्री मिलाकर देवें इससे अच्छा लाभ होता है। रक्तचाप की बढ़ी हुई अवस्था में पक्षाघात रोग होने की सम्भावना रहती है इसलिये उच्च रक्तचाप वृद्धि को पक्षाघात का सचेतक मान लेना चाहिए। पक्षाघात होने से पूर्व उच्च रक्तचाप वृद्धि में धमनियों का कठोर होना आवश्यक है।
कोई भी औषधि कम मात्रा में लेना रोगी के लिये कोई लाभदायक नहीं होगी। औषधियों का प्रभाव शीघ्र हो इसकेे लिए मात्रा से अधिक औषधि भी नहीं लेनी चाहिए। अधिक लेने से हानि हो सकती है। इसलिए प्रत्येक आयुर्वेदिक औषधि को अनुभवी, शिक्षित वैद्य के मार्गदर्शन में लेना ही श्रेयस्कर होता है। किसी नीम हकीम से कभी भी औषधि नहीं लेनी चाहिए।
आजकल प्रत्येक गली एवं मोहल्लों में बैठे झोलाझाप, डॉ0 का बोर्ड लगाये छदम्चरों से सदैव सावधान रहना चाहिए, ये साक्षात मौत के सौदागरों से कम नहीं होते हैं। आयुर्वेद में इन्हें छद्मचर वैद्यों की श्रेणी में रखा गया है।
से.नि. जिला आयुर्वेदिक/यूनानी अधिकारी